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क्या मध्य प्रदेश में कमलनाथ ही कांग्रेस की कमज़ोर कड़ी हैं

मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व में इस साल मार्च से लेकर जुलाई के बीच पार्टी के कुल 25 विधायक भाजपा में जा चुके हैं, पार्टी की अंदरूनी उठापटक के बीच कई पदाधिकारियों ने इस्तीफ़े दिए. अब उपचुनावों के ठीक पहले पार्टी के अंदर से उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे.

कमलनाथ. (फोटो: पीटीआई)

कमलनाथ. (फोटो: पीटीआई)

‘पार्टी छोड़कर जाने वाले विधायकों की मुझे कोई चिंता नहीं है.’

यह शब्द मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ के हैं जो उन्होंने तब कहे थे जब जुलाई माह में दो हफ्तों के भीतर एक-एक करके तीन कांग्रेसी विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए.

इससे पहले जब मार्च माह में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी थी, तब भी कमलनाथ के वे शब्द सुर्खियों में रहे थे जब सिंधिया के सड़कों पर उतरने वाले बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था, ‘उतरते हैं तो उतर जाएं सड़क पर.’

हालांकि, जितना तूल सिंधिया के लिए कहे गए उन शब्दों ने पकड़ा था, उतना तूल तीन विधायकों के पार्टी छोड़कर जाने के बाद कमलनाथ द्वारा कहे ऊपर कहे शब्दों ने नहीं पकड़ा.

बहरहाल, यह घटना और कमलनाथ का बयान अब रात गई और बात गई की तर्ज पर भुला दिया गया है और पिछले ही दिनों कमलनाथ विधानसभा में आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी नियुक्त हो चुके हैं.

यह नियुक्ति तब हुई है जब राज्य में मार्च से जुलाई के बीच कांग्रेस के कुल 25 विधायक दल बदलकर भाजपा में चले गए हैं. यह कवायद चार टुकड़ों में हुई है.

सबसे पहले मार्च में सिंधिया समर्थक छह मंत्रियों व 19 विधायकों समेत कांग्रेस के कुल 22 विधायक भाजपा में शामिल हुए थे. फिर 12, 17 और 23 जुलाई को क्रमश: प्रद्युम्न सिंह पटेल, सुमित्रा कास्डेकर और नारायण पटेल ने भी भाजपा का दामन थाम लिया.

इस दौरान प्रदेश में कांग्रेस की कमान कमलनाथ के पास ही थी. जब पहली बार 22 विधायक पार्टी छोड़कर गए तब कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष थे. फिर जब एक-एक करके तीन विधायक और पार्टी से टूटे, तब भी वे प्रदेशाध्यक्ष और सदन में नेता प्रतिपक्ष थे.

यानी कि राज्य में कांग्रेस को एकजुट रखने और निर्णायक फैसले लेने वाले पद कमलनाथ के ही पास थे. लेकिन, पार्टी टूटती रही पर कमलनाथ अपने पदों पर बने रहे जबकि सिंधिया की बगावत के बाद प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया को इस्तीफा देना पड़ा.

इसके उलट कमलनाथ को उपकृत होकर नेता प्रतिपक्ष का भी पद मिल गया. कटघरे में कमलनाथ को होना चाहिए था क्योंकि मुखिया वही थे. सिंधिया से मतभेद की वजह वही थे.

ऊपर से जितने भी विधायक या मंत्री पार्टी छोड़कर गए, सभी ने समान आरोप लगाए कि कमलनाथ मिलने तक भी समय नहीं देते थे, कमलनाथ के दरबार में उनकी सुनवाई नहीं होती थी. बावजूद इसके सजा मिली तब अकेले दीपक बाबरिया को.

पार्टी छोड़ने वाले विधायकों के आरोपों को यह कहकर दबा दिया गया कि वे पैसे और पद के लालच में भाजपा में गए हैं, इसलिए अंगूर खट्टे हैं कि तर्ज पर कमलनाथ पर आरोप लगा रहे हैं.

लेकिन, हकीकत यह है कि कांग्रेस की प्रदेश इकाई में अंदरखाने कमलनाथ की कार्यशैली अन्य नेताओं को खटकने लगी है.

राज्य के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गोपनीयता की शर्त पर द वायर को बताते हैं, ‘पार्टी में टूट के बाद भी जो विधायक हमारे साथ बने रहे, कमलनाथ को उनके प्रति उत्साह दिखाकर उनमें जोश भरने के लिए प्रयास करना चाहिए थे. पार्टी के मुखिया का ऐसा बर्ताव तो कभी नहीं होना चाहिए कि वे कहें कि पार्टी छोड़कर जाने वाले विधायकों की मुझे कोई चिंता नहीं है. ऐसा बर्ताव करने पर तो बचे हुए विधायक भी छिटक जाएंगे.’

प्रदेश कांग्रेस संगठन के एक पदाधिकारी गोपनीयता की शर्त पर बताते हैं, ‘अगर कमलनाथ ने अपने विधायक, मंत्रियों व पार्टी नेताओं को पर्याप्त समय और सम्मान दिया होता तो सत्ता जाती ही नहीं.’

वे आगे कहते हैं, ‘हमारी सरकार गिरी ही इसलिए क्योंकि कमलनाथ सभी पदों पर कुंडली मारकर बैठ गए थे. प्रदेशाध्यक्ष और मुख्यमंत्री के पद को छोड़ भी दें तो संगठन, विभिन्न निगम, मंडलों आदि में करीब दो सैकड़े से अधिक पद ऐसे थे कि अगर तब उन्हें पार्टी के पहली पंक्ति के नेताओं और असंतुष्ट विधायकों में बांट दिया गया होता, तो शायद पार्टी के लिए हालात इतने नहीं बिगड़ते.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘कमलनाथ का घमंड सातवें आसमान पर था. विधायक की तो बात ही छोड़ दो, प्रदेश में पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं, यहां तक कि मंत्रियों के साथ जो व्यवहार किया जा रहा था, उसी के चलते असंतोष पनपा.’

हालांकि, भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित कहते हैं, ‘जब कोई पार्टी हारती है तो उसमें बहुत गुण-दोष दिखने लगते हैं. आज जो लोग कमलनाथ पर उंगुलियां उठा रहे हैं, एक वक्त जब सरकार थी तो वही कमलनाथ के सामने दासों की तरह झुके रहते थे.’

यह बात सही है कि विपरीत परिस्थितियों में विरोधी स्वर मुखर हो जाते हैं, लेकिन जब परिस्थितियां प्रदेश में कांग्रेस के अनुकूल थीं और कमलनाथ मुख्यमंत्री थे, तब भी अनेक मौकों पर उनके नेतृत्व पर सवाल उठे थे.

पार्टी से विधायकों का जाना तो अब शुरू हुआ है, लेकिन पार्टी से जुड़े अन्य लोगों का मोहभंग कांग्रेसी सरकार के गठन के साथ ही शुरू हो गया था.

जिस वचन-पत्र और आरोप-पत्र को आधार बनाकर कांग्रेस सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी थी, उनके निर्माण में अजय दुबे और व्हिसल ब्लोअर आनंद राय जैसे एक्टिविस्ट्स का बड़ा योगदान था. लेकिन, कमलनाथ सरकार का गठन होते ही इन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया.

अजय दुबे बताते हैं, ‘सरकार बनने के बाद कमलनाथ ने ‘एंटी ट्रांसपेरेंसी’ रुख अपना लिया था. जैसे कि सूचना आयोग में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को ठेंगा दिखाकर सूचना आयुक्त की कुर्सी पर अपना आदमी बैठा दिया. वाइल्ड लाइफ बोर्ड में पूंजीपतियों को प्रवेश दिया. आरटीआई का आवेदन दस गुना महंगा कर दिया (यानी किसी को दूसरी अपील करनी हो तो 1,000 रुपये चुकाए). सर्विस कमीशन को सही रिफॉर्म नहीं किया. भाजपा के भ्रष्टाचार की जांच के लिए जनायोग का वादा पूरा नहीं किया.’

वे आगे कहते हैं, ‘पूर्व सरकार के घोटालों पर उनका नर्म रुख था जबकि भाजपा आक्रामक रही और मौका देखकर सरकार गिरा दी. अगर कमलनाथ भी शुरू से आक्रामक रहते तो भाजपा हावी नहीं हो पाती. कमलनाथ मैनेजमेंट करके चल रहे थे, भाजपा को नाराज करना नहीं चाहते थे और गुड गवर्नेंस उनकी प्राथमिकता नहीं थी. उन्हें आरोप-पत्र के बारे में बात करना तक पसंद नहीं था, मतलब कि वे भाजपा से डरते थे या उसके खिलाफ कोई जांच नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने कांग्रेस से किनारा कर लिया.’

बता दें कि विधानसभा चुनाव 2018 के पहले कांग्रेस द्वारा जारी किया आरोप-पत्र वह दस्तावेज था जिसमें भाजपा के 15 सालों के भ्रष्टाचार, घोटालों और असफलताओं का जिक्र था एवं सरकार बनने पर भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई थी.

बहरहाल अजय दुबे के आरोपों की पुष्टि आनंद राय भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘मैंने कांग्रेस सरकार बनने के दो महीने बाद ही नरोत्तम मिश्रा पर स्टिंग किया था जहां वे खुलकर विधायकों की खरीद-फरोख्त का सौदा कर रहे थे. इसका वीडियो कमलनाथ को सौंप दिया. वे एक साल तक उस पर कुंडली मारे बैठे रहे. शायद उन्होंने नरोत्तम से हाथ मिला लिया था लेकिन जब साल भर बाद उन्हीं नरोत्तम के कारण सरकार गिरने लगी, तब वे वीडियो दिखाने लगे.’

आनंद आगे कहते हैं, ‘क्यों कमलनाथ ने तब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरह सरकार गिराने की साजिश रचने वालों पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं किया? गहलोत ने तो अपनी ही पार्टी के उपमुख्यमंत्री पर मुकदमा कर दिया, उन्हें तो भाजपा विधायक पर करना था. और गहलोत के पास तो ऑडियो टेप थे, मैंने तो कमलनाथ को वीडियो दिया था. अगर समय रहते कमलनाथ ने कार्रवाई की होती और भाजपा के खिलाफ आक्रामक होकर शिवराज को व्यापमं जैसे घोटालों में घेर लिया होता तो सरकार गिरने की नौबत नहीं आती.’

इसलिए इन सभी आरोपों और दावों के बीच प्रश्न उठता है कि क्या कमलनाथ मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमजोर कड़ी हैं?

जुलाई में तीन विधायकों के कांग्रेस छोड़ने से अब तक के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कमलनाथ के अनेक फैसलों पर प्रश्न उठ सकते हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मध्य प्रदेश में 15 वर्षों बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी कमलनाथ के नेतृत्व यानी उनके प्रदेशाध्यक्ष रहते ही संभव हुई थी.

इसलिए मध्य प्रदेश में कांग्रेसी नेतृत्वकर्ता के तौर पर कमलनाथ का आकलन करना हो तो शुरुआत अप्रैल 2018 से करनी होगी जब वे प्रदेशाध्यक्ष बने थे.

तब कमलनाथ को केंद्रीय कांग्रेसी संगठन में चाणक्य माना जाता था. इसलिए उनकी नियुक्ति ने तब मध्य प्रदेश ही नहीं, समूचे देश में सुर्खियां बटोरीं. उनकी नियुक्ति का फैसला आसान नहीं था. सिंधिया से उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा मिली.

2013 विधानसभा चुनावों में सिंधिया राज्य में कांग्रेस का चेहरा थे, इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि प्रदेशाध्यक्ष वे ही बनाए जाएंगे लेकिन पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के चलते कमलनाथ को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का साथ मिला और उनकी ताजपोशी हो गई.

कमलनाथ की नियुक्ति का आधार उनकी वरिष्ठता के सहारे राज्य में अनेक गुटों में विभाजित कांग्रेस की गुटबाजी खत्म करना था, लेकिन अब तक वे इस काम को अंजाम नहीं दे पाए हैं.

इसी के चलते राज्य में कांग्रेस की सरकार 15 महीनों में ही गिर गई. अब कमलनाथ स्वयं अपने पुराने सहयोगी दिग्विजिय सिंह के साथ गुटबाजी में उलझ गए हैं.

कांग्रेस का समर्थन करने वाले भोपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘कमलनाथ मध्य प्रदेश में कभी सक्रिय नहीं रहे थे जबकि दिग्विजय समर्थक कार्यकर्ता पूरे राज्य में है. सिंधिया पार्टी से जा चुके हैं. दिग्विजय ही राज्य में सबसे अधिक जमीनी पकड़ वाले कांग्रेसी नेता बचे हैं. इसी कारण कमलनाथ प्रदेशाध्यक्ष बनने से लेकर सरकार चलाने तक दिग्विजय के कंधे पर सवार रहे.’

वे आगे कहते हैं, ‘लेकिन अब वे दिग्विजय के साये से मुक्त होने के लिए हर जिले में अपना नेटवर्क खड़ा कर रहे हैं. उपचुनावों में सिर्फ अपने समर्थकों को टिकट बांट रहे हैं ताकि राज्य में उनके समर्थक बढ़ें और पार्टी पर दिग्विजय की पकड़ ढीली हो.’

इसकी पुष्टि आनंद राय भी करते हैं. वे बताते हैं, ‘कमलनाथ, दिग्विजय की काट के लिए अपने समर्थकों को इस तरह जिम्मेदारी बांट रहे हैं कि उन्होंने पूर्व मंत्री विजयलक्ष्मी साधो और हिना कावरे को उपचुनाव की तैयारियों के लिए ग्वालियर-चंबल भेज दिया. बालाघाट की हिना चंबल में चौराहे पर भी सभा लें, तो चार लोग उन्हें नहीं पहचानते. यही हाल विजयलक्ष्मी का है.’

वे आगे कहते हैं, ‘लेकिन स्थानीय नेता गोविंद सिंह और देवाशीष झररिया दिग्गी गुट के हैं, इसलिए कमलनाथ को उन पर भरोसा नहीं है. विवेक तन्खा तक को उन्होंने साइडलाइन किया जबकि वे हमेशा आड़े वक्त पर पार्टी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते हैं. उन्हें कमलनाथ ने सरकारी बंगला तक आवंटित नहीं किया था.’

कमलनाथ का बढ़ता प्रभाव अब दिग्विजय सिंह को भी खटकने लगा है. पिछले दिनों उपचुनाव का टिकट न मिलने पर उनके समर्थक पूर्व गृहमंत्री महेंद्र बौद्ध ने कांग्रेस के खिलाफ बगावती तेवर दिखाए तो दिग्विजय का दर्द भी उभर उठा.

वे भरे मंच से बोले, ‘अन्याय तो हुआ है लेकिन क्या कर सकते हैं? मैं टिकट वितरण में हस्तक्षेप नहीं कर रहा हूं.’

गौरतलब है कि उक्त विधानसभा सीट पर कमलनाथ ने एक दलबदलू को उतारा है जिसके विरोध में अब बौद्ध बगावती होकर बसपा से चुनाव लड़ने वाले हैं.

बहरहाल, 2018 मे कांग्रेस की सरकार बनी तो कहा गया कि कमलनाथ संगठन मजबूत करने में सफल रहे लेकिन हकीकत यह थी कि तब भी पार्टी की गुटबाजी को खत्म करने का काम समन्वय समिति के अध्यक्ष के तौर पर दिग्विजय सिंह ने किया था.

कमलनाथ के फैसलों से तो उल्टा पार्टी बंटती नजर आई थी. सबसे पहले कमलनाथ के खिलाफ बगावत का बिगुल पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव ने फूंका. अरुण को मनाने का काम दिग्विजय सिंह ने किया.

उसके बाद कमलनाथ द्वारा की गई नियुक्तियों के चलते पूर्व केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी नटराजन नाराज हुईं तो उन्हें भी दिग्विजय ने ही मनाया. विधानसभा चुनावों से पहले जब-जब पार्टी में बगावत फूटी, उसे दिग्विजय सिंह ने ही दबाया.

Bhopal: AICC General Secretary Digvijay Singh and Congress state President Kamal Nath at a joint press conference in Bhopal, on Thursday. (PTI Photo) (PTI5_24_2018_000101B)

दिग्विजय सिंह के साथ कमलनाथ. (फाइल फोटो: पीटीआई)

उन्होंने अपनी समन्वय यात्रा में सिंधिया के ग्वालियर-चंबल को छोड़कर पूरे प्रदेश में दौरे करके पार्टी की गुटबाजी समाप्त की, तो दूसरी ओर कमलनाथ बतौर प्रदेशाध्यक्ष सिंधिया और दिग्विजय के आपसी मतभेद तक नहीं सुलझा पाए जिसके चलते दिग्विजय की समन्वय यात्रा ग्वालियर-चंबल की सीमा पर ही थम गई.

टिकट वितरण के समय राहुल गांधी के सामने ही सिंधिया-दिग्विजय भिड़ गए. पार्टी पर कमलनाथ के नियंत्रण की बात करें तो प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया के साथ अनेक मौकों पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने मारपीट और झूमाझटकी की.

ऐसी घटनाएं बार-बार हुईं. कमलनाथ की पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ गोपनीय बैठकों के अनेक वीडियो लीक हुए, जिनमें कभी वे अपराधियों को चुनाव लड़ाने का समर्थन करते दिखे तो कभी महिला विरोधी बयान देते.

ऐसी घटनाओं के चलते पार्टी की तो छवि खराब हुई ही, कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठे लेकिन तब कोई उनके खिलाफ बोलने वाला नहीं था.

यहां तक कि अनेक फैसले उन्होंने ऐसे लिए जिन्हें बाद में बदलना तक पड़ा. अजय दुबे कहते हैं, ‘प्रदेशाध्यक्ष बनकर आने से पहले पांच साल तक वे भोपाल तक नहीं आए थे. उन्हें क्षेत्रीय राजनीति का अनुभव ही नहीं है. यही अनुभवहीनता उनके फैसलों में झलकती है. बस गांधी परिवार से नजदीकियों के चलते वे हमेशा पावर में रहे. उनका बड़ा नेता होने का गुबार केवल गांधी परिवार का खास होने के चलते था जो मध्य प्रदेश में फूट गया.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसलिए ही उन्हें सरकार चलाने के लिए उन दिग्विजय का सहारा लेना पड़ा जिन्हें चुनाव प्रचार के दौरान उनकी बंटाधार वाली छवि के चलते पर्दे के पीछे रखा गया था. सरकार बनते ही दिग्विजय ‘एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी’ बन गए. नियुक्ति से लेकर तबादले उनकी मर्जी से होने लगे. उनके बेटे को मलाईदार मंत्रालय मिल गया.’

शायद गांधी परिवार से नजदीकी ही वह कारण है कि कमलनाथ के खिलाफ विरोध के स्वर बाहर नहीं निकल पाते, इसलिए दो सालों से उनका बड़बोलापन भी जारी है, जिसके चलते विधानसभा चुनावों के दौरान वे 150 से अधिक सीटें जीतने और 30 भाजपा विधायकों के कांग्रेस से टिकट मांगने की बातें करते रहे, लेकिन अंत में केवल दो ही भाजपा विधायकों ने कांग्रेस का दामन थामा.

कमलनाथ का बड़बोलापन सरकार बनने के बाद भी देखा गया. बतौर मुख्यमंत्री वे हर मंच पर कहते थे कि भाजपा के 20 विधायक मेरे संपर्क में हैं, लेकिन हुआ उल्टा कि कांग्रेस के ही 25 विधायक भाजपा में चले गए और सरकार गिर गई.

इसका सारा दोष कमलनाथ ने दिग्गी पर डालते हुए कहा कि उन्होंने मुझे 20 विधायक संपर्क में होने का बताकर अंधेरे में रखा.

सत्तासीन रहते कमलनाथ पर भाजपा और कई मौकों पर कांग्रेसी नेताओं द्वारा भी यह आरोप लगे कि उनकी सरकार में दिग्विजय सुपर सीएम हैं, फैसले वही लेते हैं, कमलनाथ बस उनके बताए रास्ते पर चलते हैं.

कमलनाथ के दिग्विजय के संबंध में किए उक्त खुलासे ने उन आरोपों को पुष्ट कर दिया. ऐसा ही बड़बोलापन उनका अब भी जारी है.

वे आगामी उपचुनाव की सभी 28 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं, जबकि बाकी कांग्रेसी 15-16 सीटों पर ही जीत की संभावना बता रहे हैं.

इसी तरह कमलनाथ सितंबर मध्य में कहते नजर आए कि 35 दिनों बाद उनकी सरकार में वापसी होगी जबकि उस समय तक चुनावों की तारीख की घोषणा तक नहीं हुई थी.

दल-बदलुओं पर अधिक भरोसा करते हैं कमलनाथ

विधानसभा चुनावों के दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पैराशूट उम्मीदवारों को न उतारने की घोषणा की थी लेकिन कमलनाथ ने 12 ऐसे नेताओं को चुनाव लड़ाया, जो कुछ दिन पहले ही कांग्रेस का हिस्सा बने थे. उनमें से 10 हार गए.

कमलनाथ ने एक वायरल वीडियो में कहा था कि कितने भी आपराधिक मामले बने रहें, उम्मीदवार जीतने वाला हो. यहां उम्मीदवार भी नहीं जीते और कांग्रेसी विचारधारा से भी उन्होंने समझौते किए.

कमलनाथ ने उससे सीख न लेकर उपचुनावों के लिए घोषित 24 उम्मीदवारों में भी 10 दल-बदलुओं को टिकट दिया है.

उपचुनावों में कांग्रेस उम्मीद कर रही थी कि भाजपा में गए कांग्रेसी विधायकों को टिकट मिलने के चलते भाजपा के अंदर रोष पनपेगा जिसका लाभ कांग्रेस उठाएगी.

कमलनाथ द्वारा दल-बदलुओं को टिकट देने से कांग्रेस के अंदर भी अब वैसा ही रोष पनप गया है. इससे कांग्रेस को ही नुकसान हो सकता है.

क्योंकि 2018 की बात करें तो जो चार निर्दलीय विधायक जीते थे, वे सभी कांग्रेस के ही बागी थे लेकिन कमलनाथ ने उन पर भरोसा नहीं दिखाया था.

इस संबंध में एक वरिष्ठ कांग्रेसी कहते हैं, ‘दल-बदलुओं को पार्टी की विचारधारा से मतलब नहीं होता. उनका जहां बिजनेस चलेगा, सत्ता बदलने के बाद दल बदल लेंगे. ऐसे लोगों को टिकट देने से बचना चाहिए.’

बहरहाल, एक ओर कांग्रेस व्यापमं घोटाले पर भाजपा और शिवराज को घेरती है तो दूसरी ओर कमलनाथ व्यापमं के आरोपियों को चुनाव लड़ाते हैं या प्रदेश संगठन में पदाधिकारी बनाते हैं. ऐसी विवादित नियुक्तियां अब भी जारी हैं.

जैसे कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साले संजय मसानी जो 2018 विधानसभा चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस में आए और सिवनी सीट से चुनाव लड़कर अपनी जमानत जब्त करा बैठे थे, उन्हें पिछले दिनों कमलनाथ ने प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है जबकि उन्हें पार्टी में महज डेढ़ साल हुए हैं.

ये वही मसानी हैं जिन पर कांग्रेस शिवराज के सभी घोटालों को मैनेज करने का आरोप लगाती थी. वहीं, पिछले दिनों जिन मनोज त्रिवेदी को छतरपुर का जिलाध्यक्ष बनाया है, उनका एक वीडियो मध्य प्रदेश के चर्चित ‘हनीट्रैप’ कांड में वायरल हुआ था.

कमलनाथ पर यह भी आरोप है कि जुलाई में एक के बाद एक विधायक कांग्रेस छोड़ने लगे तो उन्हें रोकने के लिए जो समिति बनाई, उसमें भी केवल अपने समर्थकों को जगह दी जिससे पार्टी को नुकसान हुआ.

वैसे, कमलनाथ के नेतृत्व पर उठती उंगुलियां और उन पर लगते आरोपों की सूची तो बहुत लंबी है. जैसे मीडिया के साथ उनके सुरक्षाकर्मियों की बदसलूकी, क्षेत्रीय मीडिया को तवज्जो न देना, दिग्विजय के इशारे पर फैसले लेना, उनकी सरकार में उपजे अंदरूनी विवादों (उमंग सिंघार बनाम दिग्विजय सिंह और गोविंद सिंह बनाम रणवीर जाटव) को संभाल न पाना, उनके ही मंत्रियों द्वारा उन पर भेदभाव का आरोप लगाने पर मंत्रियों से उनका मुंहवाद हो जाना आदि.

लेकिन, कमलनाथ की कार्यशैली का पता इससे चल जाता है कि लोकसभा चुनावों के बाद जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ा, तो कमलनाथ पर आरोप लगाए कि उन्होंने पार्टी से ज्यादा ध्यान अपने बेटे की जीत पर लगाया.

मध्य प्रदेश में भी यही प्रचलित है कि कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के सभी पदों पर कुंडली जमाए ही इसलिए हैं ताकि अपने सांसद बेटे नकुलनाथ के लिए मजबूत जमीन तैयार कर सकें.

विशेषज्ञ मानते हैं कि कमलनाथ और दिग्विजय के बीच प्रतिस्पर्धा वास्तव में अपने-अपने बेटों को आगे बढ़ाने का द्वंद है.

नतीजतन, पिछले दिनों पहले दिग्विजय के बेटे जयवर्द्धन सिंह के ‘भावी मुख्यमंत्री’ वाले पोस्टर राजधानी में लगे, तो कुछ दिनों बाद नकुलनाथ को ‘भावी मुख्यमंत्री’ बताने वाले पोस्टर्स से राजधानी गुलजार थी.

एक मौके पर तो नकुलनाथ ने ही स्वयं को प्रदेश में युवाओं का नेतृत्व बता दिया. इस पर आनंद राय कहते हैं, ‘सारे पद कमलनाथ खुद ही रखना चाहते हैं. नेता प्रतिपक्ष बनेंगे, प्रदेशाध्यक्ष भी बनना है, सीएम भी बनना है. अब अपने बेटे को भी यूथ आइकॉन साबित करना चाहते हैं जबकि उसे पार्टी में आए साल भर हुआ है. अनेक युवा नेता दशकों से पार्टी की सेवा कर रहे हैं, उसने किया क्या है?’

बता दें कि लोकसभा चुनावों में एक ओर कमलनाथ को पुत्र मोह सता रहा था तो दूसरी ओर उन्होंने सिंधिया और दिग्विजय को क्रमश: गुना और भोपाल से चुनाव लड़ने विवश किया जबकि दोनों ही अन्य सीटों (ग्वालियर और राजगढ़) से लड़ना चाहते थे.

माना जाता है कि तब कमलनाथ ने अपने रुतबे से दोनों को ठिकाने लगा दिया था. वहीं, पार्टी छोड़ने वाले विधायकों के आरोप कि कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते केवल छिंदवाड़ा पर ध्यान दिया भी तथ्यात्मक हैं क्योंकि 15 महीने के कार्यकाल में कमलनाथ छिंदवाड़ा तो अनेक बार गए लेकिन राज्य के दूसरे हिस्सों से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी.

किसान मुद्दे पर सरकार बनाने वाले कमलनाथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में न तो स्वयं जमीनी दौरे पर गए और न ही उनका कोई प्रतिनिधि पहुंचा.

इसके उलट पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते शिवराज सिंह ने तब बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया. आज शिवराज मुख्यमंत्री हैं. बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाकर किसानों से मिल रहे हैं जबकि कमलनाथ के कार्यकाल में ऐसा नहीं देखा गया.

अजय दुबे बताते हैं, ‘प्रदेश के क्षेत्रों में तो छोड़िए, वे ढाई सालों से प्रदेशाध्यक्ष हैं लेकिन पीसीसी कार्यालय में ही एक-दो बार गए हैं. वे बस ट्विटर की राजनीति करते हैं, लेकिन ये दिल्ली नहीं है कि ट्वीट से जनता आंदोलित हो जाए. इसी गलतफहमी में छिंदवाड़ा में भी उनका जनाधार खिसक गया. नकुलनाथ ने लोकसभा चुनाव महज 37,000 मतों से जीता जबकि कमलनाथ लाखों मतों से जीतते थे. हकीकत यह है कि छिंदवाड़ा की 8 विधानसभाओं में से 5 नकुलनाथ हारे.’

आनंद राय कहते हैं, ‘ये कैसे प्रदेशाध्याक्ष हैं कि दस निजी विमान होते हुए भी जिलों का दौरा नहीं करते? सच यह है कि 73 साल की वृद्धावस्था में वे घूम नहीं पाते, लेकिन पद का मोह नहीं छोड़ रहे हैं जबकि उनकी कार्यशैली ऐसी है कि डेढ़-दो सालों से प्रदेश में एनएसयूआई, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस का एक बड़ा आयोजन तक नहीं हुआ. उपचुनावों की 28 में से ये 8 सीटें जीत जाएं तो बड़ी बात होगी.’

वे आगे कहते हैं, ‘जो विधायक पहले सिंधिया के साथ पार्टी छोड़कर नहीं गए, वे अब जा रहे हैं. मतलब कि कमलनाथ की ही नेतृत्व क्षमता में कमी है. कमलनाथ में उन्हें विश्वास नहीं है, इसलिए गए.’

कांग्रेस संगठन के ही एक नेता कहते हैं, ‘इनसे पहले प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव थे. छोटे से छोटा कार्यकर्ता भी उनका हाथ पकड़कर बात कर सकता था. अब तो हाथ पकड़ना छोड़ो, बात ही नहीं कर सकते. कमलनाथ फाइव स्टार नेता हैं. जनता भाजपा से परेशान है लेकिन कांग्रेस विकल्प बनकर उभर नहीं पा रही है.’

बहरहाल, राज्य की उपचुनाव वाली 28 सीटों में से 16 ग्वालियर-चंबल अंचल से हैं. कांग्रेस की सत्ता वापसी पूरी तरह इन पर निर्भर है.

चुनावों की घोषणा कभी भी हो सकती थी, लेकिन आधा सितंबर बीत जाने तक कमलनाथ ने इस क्षेत्र का एक भी दौरा नहीं किया था जबकि तब तक शिवराज और सिंधिया दोनों ही करीब आधा दर्जन दौरे कर चुके थे, जो कहीं न कहीं कमलनाथ की नीतियों में कमी की ओर इशारा करता है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)