भारत

हाथरस: यह सिर्फ़ बेटी का मामला नहीं है…

हाथरस में जो हुआ वह जातीय श्रेष्ठता और उसके अधिकार के अहंकार का ही नतीजा है. इसका एक प्रमाण गांव के उच्चजातीय समूह की प्रतिक्रिया है.

हाथरस गैंगरेप पीड़िता का अंतिम संस्कार करते पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

हाथरस गैंगरेप पीड़िता का अंतिम संस्कार करते पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

अपराध हो सकते हैं. अपराधी को पहले से ताड़कर अपराध रोक लेना प्रशासन और सरकार के बस में हमेशा नहीं होता. इसलिए हर अपराध के लिए इन्हें जिम्मेदार ठहराने को लेकर अगर ये दुखी हों, तो उचित ही है.

लेकिन समाज और सरकार की परीक्षा अपराध हो जाने के बाद के उनके आचरण से होती है. अपराध को लेकर उनकी प्रतिक्रिया और उनके रवैये से यह तय होता है कि वे अपराधी के साथ खड़े हैं, या जो अपराध का निशाना था, उसके साथ!

दूसरे शब्दों में, वे न्याय के पक्ष में हैं और उसे सुनिश्चित करने के लिए अपनी भूमिका निभा रहे हैं या उसे हर तरह से असंभव कर देने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं.

इसके साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि प्रत्येक अपराध की प्रकृति और गंभीरता एक तरह की नहीं होती. हत्या हत्या है, लेकिन प्रत्येक हत्या एक जैसी नहीं है.

गाली-गलौज, किसी को बेइज्जत करना भी एक तरह का नहीं होता. इनका परिणाम या प्रभाव भी एक प्रकार का नहीं है.

एक हत्या वह होती है जिसमें उस मारे गए व्यक्ति की पहचान- वह जाति आधारित हो, धर्म आधारित हो, जेंडर आधारित हो- ही हत्या का कारण होती है. इसलिए उसका निशाना सिर्फ वह नहीं जिसकी हत्या हुई है, बल्कि उसका पूरा समाज है, उसका अस्तित्व है.

यह अधिक गंभीर और जघन्य माना जाता है. इसका एक कारण यह है कि यह सभ्य समाज की बुनियाद पर ही आघात है.

यही बात बलात्कार जैसे अपराध पर लागू होती है. हर बलात्कार को सिर्फ स्त्री विरोधी हिंसा या बहू-बेटी के अपमान की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता. इस देश में औरतें सुरक्षित नहीं हैं, यह वक्तव्य आम तौर पर ठीक है, लेकिन यह पूरा सच फिर भी नहीं बताता.

बलात्कार सिर्फ पुरुष की यौन लिप्सा या विकृति का नतीजा नहीं. युद्ध में या सामुदायिक हिंसा में बलात्कार यौन विकृति के कारण नहीं, समुदाय भर को सबक सिखाने के लिए और उस पर पूरी तरह मनोवैज्ञानिक कब्जा कर लेने के लिए ही किया जाता है, यह बात बार-बार अब भी दोहराने की ज़रूरत है.

भारत के संदर्भ में यह कहने की ज़रूरत है कि विशेषकर दलित लड़कियां या स्त्रियां यौन हिंसा के खतरे में रहती हैं.

बलात्कार के हिंसा के आंकड़े यह साफ करते हैं, लेकिन इस बात को समझने के लिए अरसा पहले लिखी गई प्रेमचंद की कहानी ‘घासवाली’ को याद कर लेना ही काफी है.

घासवाली एक दलित स्त्री मुलिया के साथ हुई एक ठाकुर चैन सिंह द्वारा बलात्कार के प्रसंग से शुरू होती है. चैन सिंह असफल रहता है.

बाद में वह मुलिया को समझाने की कोशिश करता है कि वह दरअसल उसके रूप पर आसक्त हो गया था और उसका विवाह तो हो गया है, लेकिन वैवाहिक जीवन नाममात्र का है.

मुलिया उसे जो उत्तर देती है, वह दलित स्त्रियों के साथ ‘सवर्ण’ व्यवहार का सच है:

‘मुलिया के होठों पर अवहेलना की मुस्कराहट झलक पड़ी. बोली- फिर भी अगर मेरा आदमी तुम्हारी औरत से इसी तरह बातें करता, तो तुम्हें कैसा लगता? तुम उसकी गर्दन काटने पर तैयार हो जाते कि नहीं? बोलो! क्या समझते हो कि महावीर चमार है तो उसकी देह में लहू नहीं है, उसे लज्जा नहीं है, अपनी मर्यादा का विचार नहीं है? मेरा रूप-रंग तुम्हें भाता है, क्या घाट के किनारे मुझसे कहीं सुंदर औरतें नहीं घूमा करतीं? मैं उनके तलवों की बराबरी भी नहीं कर सकती. तुम उसमें से किसी से क्यों नहीं दया मांगते! क्या उनके पास दया नहीं है? मगर वहां तुम न जाओगे; क्योंकि वहां जाते तुम्हारी छाती दहलती है. मुझसे दया मांगते हो, इसलिए न कि मैं चमारिन हूं, नीच जाति हूं और नीच जाति की औरत जरा-सी घुड़की-धमकी व जरा-से लालच से तुम्हारी मुट्ठी में आ जाएगी. कितना सस्ता सौदा है. ठाकुर हो न, ऐसा सस्ता सौदा क्यों छोड़ने लगे?

चैन सिंह लज्जित होकर बोला- मूला, यह बात नहीं. मैं सच कहता हूं, इसमें ऊंच-नीच की बात नहीं है. सब आदमी बराबर हैं. मैं तो तेरे चरणों पर सिर रखने को तैयार हूं.

मुलिया – इसीलिए न कि जानते हो, मैं कुछ कर नहीं सकती. जाकर किसी खतरानी के चरणों पर सिर रक्खो तो मालूम हो कि चरणों पर सिर रखने का क्या फल मिलता है. फिर यह सिर तुम्हारी गर्दन पर न रहेगा.’

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि हाथरस में जिस लड़की के साथ यौन हिंसा की गई वह भी घास छीलकर अपने परिवार की मदद करती थी.

वह भी मुलिया की तरह दलित थी. उसके साथ बलात्कार करनेवाले भी ‘ऊंची जाति’ के थे. कहानी आखिरकार सच के पक्ष में सबसे प्रामाणिक साक्ष्य होती है.

हाथरस में जो हुआ वह जातीय श्रेष्ठता और उसके अधिकार के अहंकार का ही नतीजा है. इसका एक प्रमाण गांव के उच्चजातीय समूह की प्रतिक्रिया है.

आखिर क्यों उन सबने मिलकर प्रदर्शन करके इस अपराध को ही झुठलाने की कोशिश की? क्यों वे अभियुक्तों पर आरोप को अपने जातीय समुदाय को बदनाम करने की साजिश मानकर प्रदर्शन कर रहे हैं?

क्यों वे यह कह रहे हैं कि हिंसा में मारी गई लड़की का परिवार अभियुक्तों पर झूठा आरोप लगा रहा है?

अभियुक्तों के परिवार में एक ने दैनिक भास्कर की पत्रकार पूनम कौशल को जो जवाब दिया, उससे ही मालूम होता है कि क्यों यह हिंसा जातीय हिंसा है.

‘ये नीची जाति के लोग हम ठाकुरों से मुआवजा लेने के लिए हमें झूठे मुकदमों में फंसा देते हैं. हमें भगवान की अदालत पर भरोसा है, हमारा बंसी वाला न्याय करेगा.’

उसके पहले जब पूनम आरोपियों के परिवार की औरतों से बातचीत का ब्योरा देती हैं,

‘पीड़ित और आरोपियों के घरों के बीच ज्यादा फासला नहीं है. आरोपियों के घर बस औरतें और छोटे बच्चे ही नजर आते हैं. अपने घर के लड़कों का बचाव करते हुए वो बार-बार यही कहती हैं कि इन छोटी जाति के लोगों से उनके परिवार का कोई संबंध नहीं था. पुरानी रंजिश में हमारे बेटों को फंसाया गया है. अपने बेटों का बचाव करते हुए वो पीड़ित के चरित्र हनन का भी कोई मौका नहीं छोड़तीं.’

क्या इस हिंसा का जातिभेद से कोई रिश्ता नहीं? पूनम की पूरी रिपोर्ट पढ़ने पर इसका उत्तर मिल जाता है:

‘गिरफ्तार आरोपियों के परिवार के लोगों से मिली तो बड़े रुबाब से कहते मिले, ‘हम इनके साथ बैठना-बोलना तक पसंद नहीं करते, हमारे बच्चे इनकी बेटी को छुएंगे?’

‘इस ठाकुर और ब्राह्मण आबादी गांव में दलितों के गिने-चुने घर हैं और उनकी दुनिया अलग है. यहां जातिवाद की जड़ें बेहद भीतर तक धंसी हुई हैं. लोग बात-बात में जाति की बात करते हैं. बावजूद इसके तथाकथित उच्च जाति के लोगों का यही कहना था कि ये दलित परिवार बहुत सज्जन है, किसी से कोई मतलब या बैर नहीं रखता.

गांव की एक ठाकुर महिला कहती हैं, ‘इस परिवार के लोग बुजुर्ग ठाकुरों को देखकर अपनी साइकिल से उतर जाते हैं और पैदल चलते हैं ताकि किसी ठाकुर को ये न लगे कि उनके सामने ये लोग साइकिल से चल रहे हैं, उनकी बराबरी कर रहे हैं.’

जिस गांव में दलित उच्च जाति के लोगों का इतना अदब करते रहे हों, जिसके चलते गांव में सौहार्द बना रहा करता था, अगर वे अब मुंह खोलने लगें तो शांति कैसे बनी रहेगी?

न्याय मांगने से समरसता भंग होती है. यह अपराध करने वाला अधिक दोषी है या जिससे गलती से बलात्कार या हत्या हो गई है?

गांव के रिश्ते एक दूसरे का दर्द बांटने पर भी टिके होने चाहिए. एक जवान लड़की की जब इतनी यातना के बाद मृत्यु हुई हो तो क्या उसके परिजनों के साथ उच्च जातिवालों ने सहानुभूति व्यक्त किया? क्या वे मातमपुर्सी के लिए उन तक चलकर आए?

‘ब्राह्मण और ठाकुर पड़ोसियों ने पीड़ित परिवार का हालचाल तक नहीं पूछा, उनके घर शोक जताने जाना तो दूर की बात है. जब मैंने पीड़ित के भाई से पूछा कि क्या इस घटना के बाद उन्हें गांव के लोगों का साथ मिला है तो बोले, ‘किसी ने हाल तक तो पूछा नहीं, साथ की बात दूर की है. यहां हमसे ही कौन बात करता है?’ ‘

पूनम की इस रिपोर्ट से साफ हो जाना चाहिए कि मारी गई लड़की के परिवार के इंसाफ के संघर्ष में वह अकेला ही रहेगा और गांव का प्रभुत्वशाली तबका उसके खिलाफ रहेगा.

तंत्र किसके साथ होगा? इसका उत्तर देने के लिए यह पूछना होगा कि क्यों प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार सबसे पहले बलात्कार के आरोप को ही झूठा साबित करने में जुट गई है?

क्या इसलिए कि इस समाज में हत्या से अधिक बुरा बलात्कार माना जाता है? क्यों उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री विश्वासपूर्वक कह रहे हैं कि बलात्कार हुआ ही नहीं?

क्यों पुलिस और प्रशासन हिंसा की तीव्रता को भी कम करने में जुट गए हैं? क्यों वे कह रहे हैं कि यह सामान्य हत्या है या शायद वह भी नहीं हैय़

क्यों मारी गई लड़की के परिजनों के बयानों को ही गलत साबित करने में ताकत लगा रहे हैं? यह कि यह मामूली हिंसा थी, शायद लड़की के परिजन झूठ बोल रहे हैं?

यह भी कि क्यों प्रशासन हिंसा की शिकार लड़की के परिजनों का नार्को टेस्ट करवाना चाहते हैं? लड़की ने अपने होशोहवास में जो बयान दिया उसे जांच के लिए प्रस्थान बिंदु क्यों नहीं माना जा रहा है?

गांव में साफ तौर पर दो पक्ष हैं और कोई साझेदारी नहीं है? दलित परिवार के लिए न्याय का संघर्ष सिर्फ उसका है. सरकार के रुख से स्पष्ट है कि वह किस तरफ है.

बाकी जो हो रहा है, वह जनतंत्र और न्याय के अधिक व्यापक प्रश्न से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश की सरकार ने राज्य को अपनी जागीर समझ लिया है और जनता को यह साफ हो गया है कि यह वह किसके बल पर कर पा रही है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)