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असम: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से ज़िला जेलों में बने डिटेंशन सेंटर को कहीं और बनाने को कहा

गौहाटी उच्च न्यायालय ने जेलों में डिटेंशन सेंटर चलाने के लिए असम सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे केंद्र बनाने के बारे में दिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों में भी कहा गया है कि इन्हें जेल परिसर के बाहर बनाया जाना चाहिए.

असम की 10 जिला जेलों में डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं. गोआलपाड़ा जिला जेल. (फोटो: अब्दुल गनी)

असम की कुछ जिला जेलों में डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं. गोआलपाड़ा जिला जेल. (फोटो: अब्दुल गनी)

गुवाहाटी: गौहाटी उच्च न्यायालय ने जेल परिसर के भीतर ‘अवैध’ विदेशियों के लिए छह डिटेंशन सेंटरों के संचालन के लिए असम सरकार की आलोचना की है और कहा कि इन केंद्रों को जेल परिसर से हटाकर कहीं बाहर बनाया जाए.

साल 2009 से राज्य की तीन जेलों- गोआलपाड़ा, कोकराझार और सिलचर की जेलों के एक हिस्से में डिटेंशन सेंटर काम कर रहे हैं. बीते पांच वर्षों में जोरहाट, डिब्रूगढ़ और तेजपुर जेलों में भी यह केंद्र बनाये गए थे.

8 अक्टूबर को तीन याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अचिंत्या मल्ला बुजोर बरुआ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि जेल परिसर से ऐसे केंद्र हटाए जाएं.

साथ ही अदालत ने यह भी कहा है कि यह तरीका साल 2012 में भीम सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों और इसके बाद सितंबर 2014 में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के विपरीत है.

याचिकाकर्ताओं ने इस मुद्दे पर सवाल उठाया था कि विदेशियों/ बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों और अन्य लोग, जो अपने मूल देशों में डिपोर्ट किए जाने या इस बारे में उनके दावे को लेकर कोई निर्णय लिए जाने का इंतजार कर रहे हैं, के लिए किस तरह से डिटेंशन केंद्रों को अधिकारियों द्वारा संचालित किए जाने की आवश्यकता है.

हाईकोर्ट ने इस बारे केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि इनमें स्पष्ट कहा गया है कि सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को फॉरेनर्स एक्ट 1946 की धारा 3 (2) (ई ) के प्रावधानों के तहत अवैध प्रवासियों/नागरिकता को लेकर पुष्टि न होने का दंड भुगत चुके और डिपोर्ट होने का इंतजार कर रहे विदेशियों की आवाजाही को सीमित करने के लिए पर्याप्त संख्या में डिटेंशन सेंटर/होल्डिंग सेंटर/कैंप बनाने की बात कही गई है.

मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार संबंधित राज्य सरकारें ऐसे केंद्रों/कैम्पों की संख्या के बारे में निर्णय ले सकती हैं.

इन दिशानिर्देशों के क्लॉज़ 2 में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे केंद्र ‘जेल परिसरों से बाहर बनाए जाने चाहिए और यहां रहने वालों को बुनियादी सुविधाएं दी जानी चाहिए.

अप्रैल 2019 में द वायर  से बात करते हुए असम में ऐसे केंद्रों में रह चुके कुछ लोगों ने वहां की ख़राब हालत के बारे में बताया था.

8 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गोआलपाड़ा, कोकराझार और सिलचर की जेलों में डिटेंशन केंद्र बनाए हुए दस सालों से अधिक समय बीत चुका है, इसलिए इसे ‘अस्थायी व्यवस्था’ तो नहीं समझा जा सकता है.

अदालत ने सरकार से इसके लिए उपयुक्त आवास किराये पर लेने के संबंध में 10 दिनों के भीतर एक कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है.

जस्टिस बरुआ ने जेल परिसर के एक हिस्से को डिटेंशन घोषित करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के 2018 के निर्देश के अनुपालन के राज्य सरकार के तर्क को खारिज कर दिया.

अदालत ने कहा कि यदि उपयुक्त आवास उपलब्ध नहीं हैं, तो राज्य सरकार निजी भवनों को किराये पर ले सकती है. मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होनी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)