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भारत में आरटीआई क़ानून आने के बाद पिछले 15 वर्षों में कितना बदलाव हुआ

सूचना का अधिकार क़ानून के 15 साल पूरे होने के मौके पर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर में कम से कम 3.33 करोड़ आवेदन दायर हुए. सूचना आयोग समय पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं कर रहे. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद देश भर के सूचना आयोगों में 38 पद ख़ाली हैं, जो इस क़ानून के लिए बड़ा झटका है.

(फोटो साभार: सतर्क नागरिक संगठन)

(फोटो साभार: सतर्क नागरिक संगठन)

नई दिल्ली: बीते 12 अक्टूबर 2020 को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून को लागू हुए 15 साल हो गए. इस तारीख को देश में आरटीआई दिवस मनाया जाता है.

लंबे संघर्ष के बाद बने इस कानून का सफर काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. एक तरफ विभिन्न सरकारें इस कानून में संशोधन करके या समय पर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न करके या कई महत्वपूर्ण विभागों को इसके दायरे से बाहर रखकर इसे कमजोर करने की कोशिश करती रही हैं.

वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों ने अपने इस बेहद महत्वपूर्ण अधिकार का इस्तेमाल करते हुए बहुत बड़ी संख्या में आरटीआई आवेदन दायर किया और जवाब न मिलने पर वे सूचना आयोग, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक भी गए. आरटीआई के तहत सूचना देने से इनकार करने के फैसलों को न्यायालयों में चुनौती दी गई और लगातार इस कानून की व्याख्या की जा रही है.

ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर पिछले 15 सालों में आरटीआई एक्ट के आने के बाद से भारतीय लोकतंत्र कितना बदला है.

पारदर्शिता एवं भ्रष्टाचार की दिशा में काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया’ (टीआईआई) की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2005-06 से लेकर 2019-20 तक केंद्र एवं राज्य सरकारों में कुल 3.33 करोड़ आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

हालांकि ये आरटीआई आवेदनों की न्यूनतम संख्या है, क्योंकि इसमें उत्तर प्रदेश और तेलंगाना के आंकड़े शामिल नहीं है. इसके साथ ही इसमें कई राज्यों का अपडेटेड आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

आरटीआई एक्ट की धारा 25 (2) के तहत सभी केंद्रीय एवं राज्य के विभागों को साल भर में दायर किए गए आरटीआई आवेदनों एवं इसके निपटारे की जानकारी संबंधित सूचना आयोग को देना होती है, जिसे आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट में शामिल करता है.

इसके बावजूद देश के कई सूचना आयोग समय पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं कर रहे हैं. आलम ये है कि उत्तर प्रदेश एवं तेलंगाना ने आज तक एक भी वार्षिक रिपोर्ट जारी नहीं किया है, इसलिए सरकारी आंकड़ों के अभाव में हम ये कह सकते हैं कि पिछले 15 सालों में देश में न्यूनतम 3.33 करोड़ आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

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इसमें से सबसे ज्यादा 9,263,816 आरटीआई आवेदन केंद्र सरकार के लिए दायर किए गए हैं. इसके बाद महाराष्ट्र राज्य का नंबर आता है, जहां पिछले 15 सालों में 6,936,564 आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

इसी तरह कर्नाटक में 3,050,947, तमिलनाडु में 2,691,396, केरल में 2,192,571, गुजरात में 1,388,225, राजस्थान में 1,212,827, उत्तराखंड में 969,511, छत्तीसगढ़ में 896,288, बिहार में 884,102, आंध्र प्रदेश में 804,509, पंजाब में 792,408 और हरियाणा में 613,048 आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में 484,356, ओडिशा में 411,621, मध्य प्रदेश में 184,112, असम में 182,994, पश्चिम बंगाल में 98,323, जम्मू कश्मीर में 73,452, झारखंड में 67,226, त्रिपुरा में 42,111, गोवा में 32,283, नगालैंड में 28,604, अरुणाचल प्रदेश में 26,152, मेघालय में 18,527, मिजोरम में 16,115, सिक्किम में 5,120 और मणिपुर में 4,374 आरटीआई आवेदन दायर किए जा चुके हैं.

आरटीआई एक्ट के तहत सबसे ज्यादा आवेदन प्राप्त करने वाले बड़े राज्यों में पहले नंबर पर महाराष्ट्र है, जहां पिछले 15 सालों में हर साल औसतन 630,596 आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

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इसके बाद कर्नाटक में करीब 338,994, तमिलनाडु में 244,672 और केरल में 219,257 आवेदन दायर हुए हैं. इस श्रेणी में मध्य प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इसकी जनसंख्या के मुकाबले काफी कम आवेदन दायर किए गए हैं. यहां हर साल क्रमश: 18,411, 14,076 और 8,193 आरटीआई फाइल किए गए हैं.

वहीं छोटे राज्यों में हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा का प्रदर्शन अच्छा रहा है, जहां हर साल औसतन 44,032 और 3,509 आवेदन दायर किए गए हैं. सिक्किम एवं मणिपुर इस मामले में काफी पीछे हैं, जहां हर साल औसतन महज 1,024 और 397 आरटीआई आवेदन दायर किए गए हैं.

सूचना आयोगों में दूसरी अपील

आरटीआई एक्ट के तहत जनसूचना अधिकारी द्वारा सूचना देने से इनकार किए जाने पर कानून में ये व्यवस्था दी गई है कि आवेदन संबंधित सूचना आयोग में इसके खिलाफ अपील और शिकायत दायर कर सकते हैं, जो इस पर निर्णय लेगा कि सूचना दी जा सकती है या नहीं.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2005-06 से लेकर 2019-20 तक केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में कुल 21.86 अपील एवं शिकायतें दायर की गई हैं.

सबसे ज्यादा तमिलनाडु सूचना आयोग में 461,812 अपील एवं शिकायतें दायर की गई हैं. इसके बाद केंद्रीय सूचना आयोग का नंबर आता है, जहां पिछले 15 सालों में कुल 302,080 शिकायतें एवं अपीलें दायर की गई हैं.

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इसी तरह महाराष्ट्र सूचना आयोग में 277,228, कर्नाटक में 164,627, बिहार में 158,218, राजस्थान में 87,124, गुजरात में 92,860, हरियाणा में 77,343, पंजाब में 67,408 और उत्तर प्रदेश में 65,035 अपील एवं शिकायतें दायर की गई हैं.

इनके अलावा असम में 61,161, ओडिशा में 57,625, आंध्र प्रदेश में 54,843, मध्य प्रदेश में 47,003, छत्तीसगढ़ में 51,335, उत्तराखंड में 41,861, केरल में 33,218, झारखंड में 32,481, पश्चिम बंगाल में 20,108, तेलंगाना में 10,619, हिमाचल प्रदेश में 8,549, गोवा में 4,579, जम्मू कश्मीर में 2,499, अरुणाचल प्रदेश में 1,995, मणिपुर में 1,746, त्रिपुरा में 1,064, मेघालय में 646, सिक्किम में 439, नगालैंड में 338 और मिजोरम सूचना आयोग में कुल 206 अपील एवं शिकायतें दायर की गई हैं.

सूचना न देने पर लगाया गया जुर्माना

आरटीआई एक्ट की धारा 20(1) के तहत केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों को ये शक्ति मिली हुई है कि यदि गलत तरीके से सूचना देने से मना किया जाता है या सूचना नहीं दी जाती है तो वे संबंधित जनसूचना अधिकारी पर जुर्माना लगा सकते हैं. सूचना आयोग प्रतिदिन 250 रुपये या अधिकतम 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगा सकते हैं.

हालांकि ये देखने में आया है कि सूचना आयोग आम तौर पर जुर्माना लगाने पर ढिलाई बरतते हैं, जिसके चलते सूचना देने से इनकार, गलत सूचना, देरी से सूचना देने जैसे मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है.

उदाहरण के तौर पर असम में पिछले 14 सालों में सिर्फ 63 मामलों में सूचना आयोग ने जुर्माना लगाया है. इसी तरह बिहार में 463, गुजरात में 654, हिमाचल प्रदेश में 208, केरल में 664, नगालैंड में 73, ओडिशा में 1,031 मामलों में जुर्माना लगाया गया है.

अन्य राज्यों के सूचना आयोगों द्वारा लगाए गए जुर्माने का आंकड़ा नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है.

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केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में खाली पद

देश भर के विभिन्न सूचना आयोगों में समय पर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने के कारण सरकारें सवालों के घेरे में हैं. इसे लेकर पिछले साल फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने समय पर नियुक्ति करने के लिए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया था, लेकिन इसके बावजूद कोई खास परिवर्तन नहीं आया है.

देश भर में केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में कुल 160 पद हैं, जिसमें से 29 पद मुख्य सूचना आयुक्त और 131 पद सूचना आयुक्तों के हैं. हालांकि आलम ये है कि इस समय मुख्य सूचना आयुक्तों के चार पद और सूचना आयुक्तों के 34 पद खाली पड़े हैं.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय सूचना आयोग में कुल 11 पद हैं, लेकिन इसमें से पांच पद खाली हैं. हालत ये है कि मुख्य सूचना आयुक्त का भी पद यहां रिक्त है.

राज्यों को अगर देखें तो आंध्र प्रदेश सूचना आयोग में कुल छह पद हैं, जिसमें दो अक्टूबर 2020 तक सभी पद भरे हुए थे. वहीं अरुणाचल प्रदेश में पांच में से तीन पद, छत्तीसगढ़ में चार में से एक पद, गोवा में तीन में से एक पद, हरियाणा में 11 में से तीन पद, हिमाचल प्रदेश में दो में से एक पद, झारखंड में दो में से दोनों पद खाली पड़े हैं.

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इसके अलावा कर्नाटक में 11 में से एक पद, केरल में छह में से एक पद, महाराष्ट्र में नौ में से चार पद, मणिपुर में तीन में से दो पद, ओडिशा में छह में से दो पद, पंजाब में 11 में से दो पद, राजस्थान में पांच में से दो पद, तमिलनाडु में सात में से दो पद, त्रिपुरा में दो में से एक और उत्तर प्रदेश में 11 में से एक पद खाली हैं.

केंद्रीय सूचना आयोग, गोवा, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली पड़ा हुआ है. सीआईसी समेत सिर्फ आठ सूचना आयोगों में महिला सूचना आयुक्त हैं.

आरटीआई के क्रियान्वयन एवं निष्पादन के आधार पर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा किए गए विश्लेषण में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2017-18 एवं 2018-19 के दौरान अधिकांश राज्य सूचना आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट के प्रकाशन की समयसीमा का पालन नहीं किया गया है.

केंद्रीय सूचना आयोग सहित कुछ राज्यों ने ही साल 2017-18 एवं 2018-19 तक अपनी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित किया है. छत्तीसगढ़ ने 2019 तक के सभी वार्षिक रिपोर्ट पेश किए हैं,, जबकि मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार एवं कुछ राज्यों के सूचना आयोग ने वार्षिक रिपोर्ट बनाने या प्रकाशित करने में काफी विलंब किया है.

उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने साल 2005 से अब तक एक भी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है. साल 2017-18 में 28 में से सिर्फ 9-10 राज्यों ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखी है.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशन इंडिया के कार्यकारी निदेशक रामनाथ झा ने कहा, ‘सूचना का अधिकार निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार के उन्मूलन का कारगर हथियार है, लेकिन शुरू के कुछ वर्ष के बाद इस कानून की धार को सभी सरकारों ने कम किया है, कोर्ट ने भी अपने फैसलों में आरटीआई एक्ट को मजबूत करने के बजाय इस पर ब्रेक लगाने का काम किया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कानून बनने के बाद से केंद्र अथवा किसी राज्य सरकार ने इसकी जागरूकता के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए. गांव में आज भी आरटीआई लगाने का मतलब लोग शिकायत करना समझते हैं, शायद जनता के पास अपनी हर समस्या का समाधान करने का अभी भी यही कारगर अधिकार है.’

मालूम हो कि आरटीआई के पालन को लेकर जारी वैश्विक रैंकिंग में भारत का स्थान नीचे गिरकर वर्ष 2018 में सातवें पायदान (साल 2020 में भी) पर पहुंच गया है, जबकि पूर्व में भारत दूसरे स्थान पर था. खास बात ये है कि जिन देशों को भारत से ऊपर स्थान मिला है, उनमें से ज्यादातर देशों ने भारत के बाद इस कानून को अपने यहां लागू किया है.