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महाराष्ट्र: जेल प्रशासन के विरोध में जीएन साईबाबा 21 अक्टूबर से भूख हड़ताल करेंगे

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा, जेएनयू के एक छात्र और एक पत्रकार समेत पांच लोगों को 2017 में महाराष्ट्र की गढ़चिरौली कोर्ट ने माओवादियों से संपर्क रखने और भारत के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचने का दोषी क़रार दिया था.

GN Saibaba PTI

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः नक्सलियों से कथित संबंधों के आरोप में नागपुर सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने 21 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला किया है.

साईबाबा का कहना है कि बीते एक महीने से कपड़े, दवाइयां और किताबें मुहैया नहीं की वजह से उन्होंने भूख हड़ताल का फैसला किया है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, साईबाबा की पत्नी एएस वसंता कुमारी का कहना है कि उन्हें पाठन सामग्री मुहैया नहीं कराई जा रही है. इसके साथ ही उन्हें दवाइयां और कपड़े नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘साईबाबा 2014 से जेल में हैं और उन्हें उनके सभी मानवाधिकारों से वंचित रखा जा रहा है, उन्हें बीते एक महीने से कोई पत्र नहीं दिए जा रहा, मेरी फोन पर उनसे बात भी नहीं कराई जा रही.’

कुमारी ने महाराष्ट्र के अतिरिक्त महानिदेशक (जेल) सुनील रामानंद और नागपुर के जेल अधीक्षक अनूप कुमार कुमरे को पत्र लिखकर जेल में साईबाबा के समक्ष आ रहीं दिक्कतों और उत्पीड़न के बारे में बताया और गलत तरीके से उन पर लगाए गए प्रतिबंधों से भी वाकिफ कराया.

कुमारी ने बताया, ‘कई बार उनके वकीलों द्वारा दी गईं सभी दवाइयां उन्हें (साईबाबा) नहीं दी जाती. उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य संबंधई समस्याएं हैं और उन्हें अपनी जिदंगी बचाने के लिए हर तीन दवाएं लेने की जरूरत है.’

साईबाबा को नियमित तौर पर दवाइयां और कपड़े पहुंचाने वाले वकील आकाश सरोदे का कहना है कि बीते महीने उन्होंने एक कमीज, अंडरगार्मेंट्स, दवाइयां, चार किताबें और दो नोटपैड उनके लिए भिजवाए थे, लेकिन जेल प्रशासन ने बिना कारण बताए उनमें से कोई भी सामान नहीं लिया.

उन्होंने कहा, ‘मैं दो हफ्ते पहले गया था लेकिन उन्होंने मुझसे कुछ भी लेने से इनकार कर दिया. मैं 21 अक्टूबर से पहले एक बार फिर जाने की कोशिश करूंगा.’

जेल अधीक्षक कुमरे ने हालांकि इन आरोपों को खारिज किया है.

द हिंदू की रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है कि साईबाबा 21 अक्टूबर से भूख हड़ताल कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘कोरोना वायरस की वजह से हमने मार्च महीने से ही जेल में अखबार लेने बंद कर दिए लेकिन जांच के बाद उन्हें किताबें और पत्र दिए जा रहे हैं. इस पर फैसला किया जाता है कि क्या सही है और क्या उन्हें इसकी जरूरत है.’

जेल अधीक्षक ने कहा, ‘प्रशासन किताबों की जांच कर यह देखता है कि क्या ये किताबें जेल नियमों के अनुरूप पढ़ने के लिए सही हैं. महात्मा गांधी, स्वतंत्रता सेनानियों, पौराणिक कथाओं पर आधारित किताबों को कैदियों को देने की मंजूरी है. पत्रिका या इसी तरह की अन्य पाठन सामग्री को भी कैदियों के लिहाज से सही होना चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘जहां तक कपड़ों का सवाल है, कोरोना की वजह से हमने जेल में सिविल कपड़ों के आने पर रोक लगा दी है, क्योंकि इससे वायरस का प्रसार होता है.’

एडीजी (जेल) सुनील रामानंद का कहना है कि स्थिति का पता लगाने के लिए डीआईजी नागपुर जा रहे हैं.

बता दें कि मार्च 2017 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की सत्र अदालत ने एक पत्रकार और जेएनयू के एक छात्र सहित साईबाबा और चार अन्य को नक्सलियों से संबंध रखने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने संबंधी गतिविधियों में संलिप्तता के लिए दोषी करार दिया था.

अदालत ने साईबाबा और अन्य को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दोषी ठहराया था.

साईबाबा ने हाल ही में चिकित्सा आधार और अपनी मां से मिलने की मांग के आधार पर पैरोल पर रिहा करने के लिए याचिका दायर की थी. उनकी मां कैंसर से जूझ रही थीं. हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी मां के निधन से चार दिन पहले ही उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी.

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