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बिहार: बेटी जन्मने के लिए मां को ज़िंदा जलाने की घटना और महिला सशक्तिकरण के सरकारी दावे

बीते 14 अक्टूबर को भागलपुर के एक अस्पताल में बुरी तरह से जली अररिया ज़िले की 22 साल की काजल ने दम तोड़ दिया. उनके माता-पिता का कहना है कि पिछले महीने बेटी पैदा होने के बाद से ही काजल को प्रताड़ित किया जा रहा था और उनके पति और ससुराल वालों ने उसे ज़िंदा जला दिया.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

बिहार के अररिया जिले की बनगामा पंचायत की 22 वर्षीय काजल अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थीं, इसलिए उसे घरवाले वाले प्यार से गुड़िया कहकर पुकारते थे.

बीते दिसंबर में बड़ी धूमधाम से उसकी शादी अररिया जिले के भरगामा निवासी रोशन भगत के साथ की गई, लेकिन उसके परिवार को नहीं मालूम था कि ये रोशन उनकी गुड़िया की जिंदगी में अंधेरा ले आएगा.

बीत दिनों एक बेटी को जन्म देने की वजह से काजल को प्रताड़ित किया गया और फिर जिंदा जला दिया गया. अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.

काजल के पिता अशोक भगत बताते हैं, ‘उसकी शादी हमने बड़ी-धूमधाम से की थी. इस पर छह-सात लाख रुपये खर्च हुए थे. 3.51 लाख रुपये और एक अपाचे बाइक लड़के को दिया था. इनके अलावा फर्नीचर और दूसरे जरूरी सामान भी.’

लेकिन ये धूमधाम गुड़िया की शादी समारोह तक ही सीमित रही, उनकी शादीशुदा जिंदगी में खुशहाली जगह नहीं बना पाई.

अशोक भगत बताते हैं, ’10 अक्टूबर को बेटी ने मुझे बताया था कि ससुराल में उसके साथ मारपीट किया जा रहा है. इसके बाद जब मैंने अपने दामाद और उसके माता-पिता से पूछा कि क्या बात है तो उन्होंने जवाब दिया कि हम मारेंगे-पीटेंगे, ये हम जानेंगे. इसके बाद हमने अपनी बच्चियां को समझा दिया कि लड़ाई-झगड़ा मत करो, जो कहता है….उसकी बात सुनो.’

शादी के समय काजल और रोशन.

शादी के समय काजल और रोशन.

वे आगे बताते हैं कि 13 अक्टूबर को उन्हें इस बात की जानकारी मिली की, उनकी बेटी जल चुकी है और पूर्णिया सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

पीड़िता की गंभीर स्थिति को देखते हुए भागलपुर सदर अस्पताल भर्ती कराया गया, जहां उनकी मौत हो गई.

14 अक्टूबर को शव को पोस्टमार्टम किया गया है, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक नहीं आई है.

अररिया स्थित महिला थाना का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की जाएगी. फिलहाल मृतका के पति और सास-ससुर फरार हैं.

इससे पहले 13 सितंबर को काजल ने एक बेटी को जन्म दिया था. काजल के परिजनों की मानें तो बेटी को जन्म देने के बाद से ही काजल को पहले से और अधिक प्रताड़ित किया जाने लगा था.

काजल की मां रूबी देवी बताती हैं, ‘बच्ची की जन्म के बाद जब हम उसके यहां गए थे तो उसकी सास ने हमसे कहा- ये बेटी को जन्म क्यों दी? उन सबको इस चीज से दिक्कत थी. इसके बाद अस्पताल में भी उसने कहा था कि बेटी को जन्म देने के चलते उसको बुरी तरीके से जिंदा जला दिया गया.’

गुड़िया के माता-पिता अभी भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन काजल की छोटी-सी बच्ची की देखभाल और भविष्य की चिंता किसी के चेहरे पर नजर नहीं आती है.

इस घटना के बारे में जब हमने कई स्थानीय लोगों से बात की तो इनमें कई इससे अनजान थे. इस वीभत्स घटना को लेकर स्थानीय समाज में कोई हलचल नहीं दिखीं.

इस बारे में अररिया जिला स्थित जन जागरण शक्ति संगठन की कामायनी स्वामी से बात की, तब उनका कहना था, ‘आज एक पिछड़े हुए इलाके में सामाजिक और मानसिक विकृतियां काफी अधिक होती जा रही हैं. इसमें अजीब बात ये है कि अब इस तरह की घटनाएं नॉर्मल लग रही हैं. हमारे समाज में लड़कियों के लिए दोयम दर्जा स्थापित कर दिया गया है और वे इसे चुनौती भी नहीं दे पा रही हैं.’

कामायनी इस तरह की स्थिति के लिए पितृसत्तात्मक समाज के साथ-साथ प्रशासन को भी जिम्मेदार मानती हैं. वे कहती हैं, ‘हमारा जो सिस्टम (कानून-व्यवस्था) है, उसमें पीड़िता का परिवार थाने जाने या कोई वकील रखने में कितना सहज महसूस करता है?’

कामायनी का मानना है कि ये घटनाएं साफतौर पर प्रशासनिक उदासीनता का नतीजा है. बिहार के संदर्भ में कामायनी की बातों की पुष्टि राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी करते हैं.

इसकी हालिया रिपोर्ट की मानें तो बिहार में साल दर साल महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या बढ़ती जा रही है. राज्य में साल 2017 में इस तरह के 14,711 मामले दर्ज किए गए थे. इसके दो साल बाद यानी 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 18,587 पहुंच जाता है.

वहीं, बीते साल दहेज को लेकर कुल 1,127 विवाहितों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा है. अगर हम प्रति लाख आबादी पर इस अपराध की दर देखें तो बिहार (1.9 प्रति लाख) से केवल उत्तर प्रदेश (2.2 प्रति लाख) ही आगे है.

बिहार में इस तरह की स्थिति उस समय है, जब खुद राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनवरी, 2018 में दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक जागरूकता अभियान की शुरूआत की थी.

उस वक्त उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार विकास के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों से भी सरोकार रखती है. लेकिन महिला मुद्दों पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो इस तरह की सरकारी अभियान का असर जमीन पर नहीं दिखा है.

पटना में काम करने वाली निवेदिता झा इस तरह के अभियान पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीति से भी जोड़ती हैं.

वे कहती हैं, ‘यह एक राजनीतिक अभियान है और इसका सामाजिकता से कुछ लेना-देना नहीं है. नीतीश कुमार जानते हैं कि पिछली बार (2015) में जब वे सत्ता में आए थे, तो महिलाओं ने बड़ी तादाद में उनको वोट दिया था. मुख्यमंत्री जानते हैं कि राज्य की महिलाएं उनके लिए एक बड़ा वोट बैंक है और वे इनके बीच अपनी एक छवि बनाना चाहते थे.’

कामायनी स्वामी का भी मानना है कि इस तरह का अभियान महिलाओं को वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश है. वे कहती हैं कि राज्य में पिछले 10 साल के दौरान महिलाएं एक वोट बैंक के रूप में उभरकर सामने आईं हैं.

निवेदिता मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में आरोपित मंजू वर्मा को चेरिया बेरियारपुर विधानसभा सीट से जदूय उम्मीदवार बनाए जाने पर भी सवाल उठाती हैं.

उस समय मंजू वर्मा सामाजिक न्याय मंत्री थीं और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा भी इस मामले में आरोपित हैं. उनका कहना है कि इससे अपराध और न्याय को लेकर समाज में नीचे तक एक गलत संदेश जाता है.

वे कहती हैं, ‘बिहार में लोगों के अंदर कानून का एकदम डर नहीं है. इसके अलावा राज्य की राजनीति में महिलाओं के खिलाफ अपराध कोई मुद्दा ही नहीं है. अब तो इस तरह के वीभत्स घटनाओं को लेकर न तो कोई आंदोलन होता है और न ही विरोध. इन सबका सामान्यीकरण हो गया है.’

परिजनों के बीच बिहार की महिलाएं सबसे अधिक असुरक्षित

कामायनी के मुताबिक इस तरह का सामान्यीकरण अब पीड़िता के परिजनों के सोच में भी आ गया है. वे कहती हैं, ‘जिस तरह काजल के पिता ने उसे समझाया कि पति की बात सुनो और फिर प्रताड़ित किए जाने के बावजूद उसे ससुराल में ही रहने के लिए छोड़ दिया गया, वह ये दिखाता है कि पीड़िता को उसका परिवार ही बोझ की तरह देखता है और इस बोझ को किसी और के कंधे पर लाद दिया जाता है. आखिर में महिलाओं को तो बोझ ही समझा जाता है न!’

(फोटोः पीटीआई)

(फोटोः पीटीआई)

कामायनी की इन बातों को एनसीआरबी की रिपोर्ट की रोशनी में और बेहतर समझ सकते हैं. इसकी रिपोर्ट की मानें तो पिछले साल बिहार में वैसे मामलों की कुल संख्या 2,397 थी, जिसमें महिलाओं के खिलाफ हिंसक अपराध में उनके पति या अन्य रिश्तेदार शामिल थे.

इस तरह के अपराध में बिहार की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. ब्यूरो के मुताबिक पूरे देश में इस तरह की घटनाओं की दर 19.3 प्रति लाख थी, लेकिन बिहार में यह आंकड़ा 70.7 प्रति लाख दर्ज किया गया.

बेटी को लेकर मानसिकता पर शिक्षा का भी अधिक असर नहीं

जून 2018 में इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) की एक शोध रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में ये बताया गया था कि साल 1992-93 में केवल एक बेटी वाले परिवारों की संख्या पांच फीसदी से बढ़कर 8.9 फीसदी (2015-16) पहुंच गई.

हालांकि, बिहार की स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है. इस रिपोर्ट की मानें तो राज्य के लिए यह आंकड़ा 2.5 फीसदी से बढ़कर 2.9 फीसदी ही पहुंच पाया है.

इस मामले में दक्षिण भारत के राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में इस तरह के परिवारों की संख्या पांच फीसदी से नीचे है.

वहीं, दक्षिण भारत के राज्यों में यह आंकड़ा 10 फीसदी से अधिक है. उदाहरण के लिए, इस अवधि के दौरान केरल में केवल एक बेटी वाले परिवारों की संख्या 14 फीसदी से बढ़कर 20.1 फीसदी हो गई.

आईआईपीएस की इस रिपोर्ट में कहा गया है बेटियों को लेकर मानसिकता निर्धारित करने में पितृसत्तात्मक सोच और आर्थिक स्थिति के साथ शिक्षा का स्तर भी अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन बिहार के मामले में ये बातें पूरी तरह सटीक नहीं बैठती हैं.

साल 1991 की जनगणना में राज्य की साक्षरता दर 38.5 फीसदी थी. दो दशक बाद ये आंकड़ा बढ़कर 61.8 फीसदी हो गया, लेकिन शिक्षा का असर लिंगानुपात पर दिखाई नहीं देता है.

साल 1991 में राज्य में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 911 थी. इसके 20 साल बाद इसमें केवल साल अंकों की बढ़ोतरी (918) ही हुई.

इसकी साल 2001 की जनगणना से तुलना करें तो इसमें गिरावट ही दर्ज की गई है. 2001 की जनगणना में बिहार में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 919 महिला दर्ज किया गया था. 2011 में यह आंकड़ा प्रति 1000 पुरुषों पर 918 महिला दर्ज किया गया.

बिहार में बेटियों की इस चिंताजनक स्थिति को लेकर कामायनी शिक्षा की गुणवत्ता पर ही सवाल उठाती हैं. वे कहती हैं, ‘स्कूलों में शिक्षा तो मिलती है, लेकिन ये लिबरेशन एजुकेशन नहीं है. क्या स्कूलों-कॉलेजों में ऐसी शिक्षा दी जा रही है, जो हमें समतामूलक समाज की ओर प्रेरित करती हो? जाति से ऊपर उठने और बेटियों को बराबर मानने की सोच पैदा करती हो? मुझे नहीं लगता.’

कामायनी की इन बातों को आगे बढ़ाते हुए निवेदिता इसकी वजह बताती हैं. वे कहती हैं, ‘पहले की तुलना में लड़कियां अधिक मुखर हो रही हैं. इसके चलते उनके खिलाफ हिंसा के मामले भी बढ़े हैं. बिहार की जो संरचना है, वह सांमतवादी संरचना है. समाज उस तरह से नहीं बदला है, जिस तरह से लड़कियां बदल रही हैं.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)