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एल्गार परिषद मामला: एनआईए का दावा, आरोपी ‘दलित मिलिटेंसी’ शुरू करने की कोशिश कर रहे थे

एल्गार परिषद मामले में दायर तीसरी चार्जशीट में एनआईए ने कहा है कि आरोपियों ने ‘जंगलों में जाकर हथियार चलाने की ट्रेनिंग’ ली थी. अपने आरोपपत्र में एनआईए ने पुणे पुलिस द्वारा ‘प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचने’ के दावे को तवज्जो नहीं दी है.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो: पीटीआई)

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: एल्गार परिषद मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दायर की गई 10,000 से अधिक पेज की चार्जशीट में गवाहों के बयानों के आधार पर दावा किया गया है कि आरोपियों ने ‘जंगलों में हथियार की ट्रेनिंग लेने’ से लेकर ‘दलित मिलिटेंसी को पुनर्जीवित’ करने की कोशिश कर रहे थे.

इस मामले की तीसरी और एनआईए द्वारा दायर की गई पहली चार्जशीट में कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि आरोपियों के संबंध प्रतिबंधित माओवादी संगठन से है.

इतना ही नहीं, गवाहों ने यह भी दावा किया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई छात्र नेता और अकादमिक या तो ‘नक्सल परस्त’ हैं या फिर ‘माओवादी पार्टी के सदस्य’ हैं.

द वायर  ने चार्जशीट से ऐसे छह गवाहों के बयान प्राप्त किए हैं. चूंकि ये बयान सीआरपीसी की धारा 161 के तहत एनआईए अधिकारियों के समझ दर्ज किए गए हैं, न कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने, इसलिए इन बयानों को न्यायालय में स्वीकृत नहीं माना जाएगा.

इनमें से एक गवाह, जिन्होंने कथित तौर पर गिरफ्तार लेखक वरवरा राव के साथ मिलकर काम किया था, ने दावा किया है कि स्टाफ की कमी होने पर राव ने उनसे ‘अवामी जंग ’नामक माओवादी पत्रिका की संपादकीय जिम्मेदारी संभालने के लिए कहा था.

अवामी जंग माओवादी पार्टी की एक आंतरिक पत्रिका है, जिसे 2012 तक पार्टी की केंद्रीय समिति के नेताओं द्वारा चलाई जाती थी. गवाह ने कहा कि चूंकि वे राव के लेखन और विप्लव रचाईतला संघम (VIRASAM) या कांतिकारी लेखक समूह द्वारा पहले से ही ‘प्रभावित’ थे, इसलिए उन्होंने इस काम को स्वीकार कर लिया.

गवाह ने कहा कि माओवादी पत्रिका के साथ के दौरान उन्होंने एक कार्यक्रम के आयोजन में भी भाग लिया था, जिसमें नागपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर शोमा सेन, वकील और कैदियों के अधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एसएआर गिलानी, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और माओवादी मामले में दोषी करार दिए गए जीएन साईंबाबा और कई अन्य लोगों के साथ अकादमिक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बडे भी उपस्थित थे.

एल्गार परिषद मामले में सेन, फरेरा और तेलतुम्बडे को गिरफ्तार किया गया है, जबकि गिलानी का पिछले साल अक्टूबर में निधन हो चुकी है.

गवाह का कहना है कि यह बैठक रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा आयोजित की गई थी और बैठक के बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था.

खास बात ये है कि गवाह ने दावा किया है कि तेलतुम्बड़े ने इस बैठक में ‘दलित उग्रवाद को पुनर्जीवित करने या बढ़ाने’ के साथ-साथ ‘माओवादी नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन’ शुरू करने की बात की थी. हालांकि इस बातचीत का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है.

शैक्षणिक कार्यों के लिए तेलतुम्बड़े द्वारा की गई विदेश यात्राएं भी एनआईए जांच के दायरे में आई है, जिसमें गवाहों ने दावा किया है कि ‘पेरू, फिलीपींस, तुर्की और अन्य देशों में आयोजित सम्मेलन में भाषण देने के बहाने तेलतुम्बड़े ने कथित तौर पर माओवादी साहित्य और वहां से वीडियो जुटाए थे.’

गवाह ने दावा किया है कि गढ़चिरौली जिले में, जहां आदिवासी समुदाय वनोपज यानी कि मुख्य रूप से तेंदू के पत्तों की बिक्री पर निर्भर है, सीपीआई (माओवादी) समूह के कैडर कथित तौर पर समुदाय के सदस्यों से ‘कर’ वसूल रहे हैं.

उन्होंने कहा कि तेंदू पत्तों के प्रति एक हजार गट्ठर पर स्थानीय  लोगों या ठेकेदार को 350 रुपये देने पड़ते हैं. इसके जरिये महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सीपीआई (माओवादी) द्वारा प्रत्येक वर्ष 2.5-3 करोड़ रुपये एकत्र किए जाते हैं.

एक अन्य गवाह ने कहा कि इसे ‘जंगल टैक्स’ कहा जाता है और ये लगभग सात फीसदी था.

एक अन्य गवाह, जो कथित रूप से 2012 और 2016 के बीच सशस्त्र आंदोलन का हिस्सा थे और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और बस्तर में अबुझमाड़ क्षेत्र में सक्रिय रहे थे, ने दावा किया है कि कबीर कला मंच के सांस्कृतिक कार्यकर्ता 20 दिनों से अधिक समय के लिए गढ़चिरौली में रुके थे और इसे दौरान उन्होंने ‘आर्म्स ट्रेनिंग’ ली थी.

गवाह ने कहा, ‘अगस्त या सितंबर 2012 में रमेश रमेश गयचोर, सागर गोरखे और एक अन्य व्यक्ति (मामले में आरोपी न होने के कारण नाम छिपा लिया गया है) डीवीसी सदस्य अरुण भेल्के के साथ पुणे से गढ़चिरौली के कोरची- कोब्रामेन्धा वन क्षेत्र में आए थे. वे महाराष्ट्र समिति के सचिव मिलिंद तेलतुम्बड़े उर्फ दीपक और डीवीसी सदस्य अनिल नागपुरे उर्फ विलास उर्फ नवजोत के साथ शहरी क्षेत्रों में पार्टी कार्यों की चर्चा करते थे…’

प्रतिबंधित माओवादी संगठन के बड़े नेता के रूप में माने जाने वाले और साल 1996 से कई अंडरग्राउंड आंदोलनों में कथित रूप से शामिल मिलिंद तेलतुम्बड़े को चार्जशीट में ‘फरार आरोपी’ बताया गया है.

हालांकि मिलिंद 1996 में आंदोलन में शामिल हुए थे, लेकिन कम से कम दो गवाहों ने दावा किया है कि वे अपने भाई आनंद तेलतुम्बड़े से प्रभावित हुए थे और सशस्त्र संघर्ष में शामिल हो गए. आनंद को एक शिक्षाविद और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है.

एक गवाह ने दावा किया है कि इन लोगों ने जंगल में हथियारों और विस्फोटक की ट्रेनिंग ली थी. उन्होंने दावा किया कि रमेश गयचोर और गोरखे ने एक महिला के साथ 12 बोर राइफल, पिस्टल और हथियारों, विस्फोटकों इत्यादि के पहचान के लिए ट्रेनिंग की थी. उन्होंने कहा कि इनकी फिजिकल ट्रेनिंग भी हुई थी.

खास बात ये है कि इसी तरह के दावे महाराष्ट्र राज्य के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने भी 2011 के मामले में किए थे, जिसमें गयचोर और गोरखे पहले ही आरोपी हैं और 2013 में गिरफ्तार किए गए थे.

गवाह ने यह भी आरोप लगाया है कि एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए जाने वाले वरिष्ठ मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गडलिंग के प्रभाव में कई लोग हथियार आंदोलन में शामिल हुए थे.

गवाह ने आरोप लगाया कि एक अन्य आरोपी कैदी अधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन ने भी 10 दिनों के लिए जंगल का दौरा किया था.

साल 2018 के बाद से इस मामले को लेकर कई दावे किए गए हैं. पुणे के बाहरी इलाके में भीमा कोरेगांव जाने वाले दलितों पर की गई हिंसा को लेकर शुरू हुई जांच को सरकार गिराने के लिए ‘शहरी नक्सलियों’ की बड़ी साजिश का नाम दे दिया गया.

पुणे पुलिस, जिसने पूर्व में मामले की जांच की थी, ने यह भी दावा किया था कि गिरफ्तार आरोपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की कोशिश कर रहे थे.

हालांकि इस दावे को अंततः दरकिनार कर दिया गया और एजेंसी ने अब आरोपी व्यक्तियों पर ‘माओवादी संबंध’ होने का दावा किया है.

एक गवाह, जिसने ’इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स’ नाम के एक वकीलों के समूह द्वारा आयोजित बैठकों में भाग लेने का दावा किया है, ने कहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर विल्सन और हेनी बाबू ने कथित तौर पर ‘राजनीतिक कैदियों’ को बचाने की बात की थी.

उन्होंने यह भी दावा किया कि इसमें एक पैटर्न देखा जा सकता है ‘जहां हमेशा नक्सल मामलों को कानूनी सहायता प्रदान करने और राजनीतिक कैदियों को सरकार द्वारा सताया जाने के रूप में चित्रित करने पर जोर था.’

गवाह ने कहा कि ये दोनों दिल्ली में छात्रों, विशेष रूप से दलित और पीड़ित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों में ‘माओवादियों के प्रति सहानुभूति पैदा करने’ के लिए भी जिम्मेदार हैं.

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विल्सन और हेनी दोनों उत्पीड़ित समुदाय से आते हैं. विल्सन का काम काफी हद तक कैदियों के अधिकारों पर केंद्रित रहा है, जबकि हेनी बाबू ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जाति-विरोधी आंदोलन के लिए काम करने में बिताया है.

उनके अकादमिक लेखन ने बहुजन, विशेष रूप से ओबीसी के प्रतिनिधित्व की कमी पर ध्यान केंद्रित किया है.

(द वायर द्वारा उन लोगों के नाम नहीं प्रकाशित किए गए हैं, जिन्हें मामले में संदिग्ध बताया गया है लेकिन गवाहों के बयानों में उनके नाम हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)