भारत

स्त्री रक्षा करो, गोरक्षा हो जाएगी

लड़कियों को बिना दिमाग का और भावुक फिसलन की शिकार माना जाता है और इसलिए उन पर निगाह और लगाम रखने की ज़रूरत है. लड़कियां ज़िंदा बम है और उनको फटने से बचाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य. लगता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष इसी कर्तव्य निर्वाह के पवित्र अभियान पर निकल पड़ी हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

सुना कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने इस महामारी के बीच महाराष्ट्र के राज्यपाल से मुलाकात की. कोरोना संक्रमण का ख़तरा उठाकर दिल्ली से मुंबई की यात्रा करने का कष्ट किसी बहुत गंभीर कारण से ही किया गया होगा.

उन्होंने राज्यपाल से लव जिहाद के बढ़ते मामलों पर चिंता जाहिर की. द वायर  की रिपोर्ट के मुताबिक़,

‘राज्यपाल के साथ बैठक के दौरान ‘लव जिहाद’ का उल्लेख करने को लेकर शर्मा ने कहा, ‘मुझे महाराष्ट्र में नागरिक समाज के संगठनों से ‘शादियों के लिए मजबूर करने’ और ‘शादी के बाद धर्म परिवर्तन करने’ के संबंध में कई शिकायतें मिली थीं. मैंने ‘लव जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि नागरिक समाज संगठनों की शिकायतों में इसका उल्लेख किया गया था.’

उन्होंने लव जिहाद शब्द का यों इस्तेमाल किया जैसे वह कोई विधिसम्मत या कानूनी रूप से परिभाषित पद हो. यह बहस अलग, अध्यक्ष महोदया की इस चिंता और इस भीषण महामारी में इस चिंता को उन्होंने जो वजन दिया, उससे मुझे कई वर्ष पहले के उन्हीं की तरह की चिंता के वशीभूत एक व्यक्ति के अभियान की याद आ गई.

वह याद एक पर्चे से शुरू होती है:

‘हर घर में एक ज़िंदा बम है. यह कभी भी फट सकता है. क्या आपको मालूम है कि यह यह (ज़िंदा बम) कौन है?

यह हमारी बेटियां हैं. … बेटियां हमारे परिवार और समाज की इज्जत हैं. उसकी रक्षा करना हमारा हिंदू कर्तव्य और हिंदू संस्कृति है.…. आओ, एकजुट हो जाओ कि इन बमों को बचाया जा सके …जय श्रीराम.’

सत्या सागर ने गुजराती में छपा यह पर्चा पढ़ने को बढ़ाया. बात फरवरी 2007 की है. हम अहमदाबाद में थे. सत्या से ‘अनहद’ के दफ़्तर में मुलाक़ात हो गई थी. वे अपने किसी शोध के सिलसिले में गुजरात में थे.

मैं अपने पत्रकार मित्र नासिरूद्दीन हैदर खान के साथ अहमदाबाद में था. फरवरी 2002 के आख़िरी दिन शुरू हुए जनसंहार के 5 साल बीत गए थे.

हम दोनों ने सोचा कि किसी भी समाज के लिए 5 साल पर्याप्त होते हैं कि वह सोच सके कि उसने क्या किया है, उसके साथ क्या हुआ है. इसलिए इस मन मस्तिष्क को समझने के खयाल से हम दोनों ने सोचा कि कुछ दिन अहमदाबाद में बिताना चाहिए.

‘हर घर में एक ज़िंदा बम है’ वाला यह पर्चा उससे पिछली दीवाली के अवसर पर जारी किया गया जान पड़ता था. इसे बाबू बजरंगी ने जारी किया था, अपनी संस्था ‘नवचेतन’ की तरफ से.

बाद में हमने फ्रंटलाइन पत्रिका में डियोन बुंशा की रिपोर्ट में इस पर्चे का ज़िक्र पढ़ा. यह रिपोर्ट 2001 के दिसंबर में पहले ही छप चुकी थी. यह बाबू बजरंगी के साथ लिए गए एक इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट थी.

बाबू बजरंगी तब तक सिर्फ गुजरात नहीं, भारत भर में परिचित नाम हो चुका था. बाबू बजरंगी की शोहरत का कारण 2002 के जनसंहार की कुछ सबसे क्रूर सामूहिक हत्याओं में से एक ‘नरोडा पाटिया’ में उसकी भूमिका थी.

इस हत्याकांड में 97 मुसलमान मार डाले गए थे. इनमें 35 बच्चे, 36 औरतें और 26 पुरुष थे. बाद में बाबू बजरंगी को उम्र क़ैद की सजा हुई. लेकिन अदालतों ने इतने संगीन जुर्म के बावजूद, जिसे मानवता के विरुद्ध अपराध कहा जा सकता है, एक-दो बार नहीं, चौदह बार बजरंगी को ज़मानत दी.

अदालतों को बाबू बजरंगी के ख़राब स्वास्थ्य पर रहम आ गया. आप और क़ानून चाहें तो बाबू बजरंगी को हत्यारा मानें, वह खुद को समाज सेवक मानता है. उसकी संस्था का नाम भी ‘नवचेतन’ है.

हो सकता है यह आपको ‘नवजीवन’ की याद दिला दे जो गांधी की संस्था है और उनका साहित्य प्रकाशित करती है. बजरंगी की सबसे बड़ी समाज सेवा अपने पटेल समुदाय की लड़कियों की रक्षा का है.

डियोन बुंशा को उसने शान बघारते हुए बताया था कि वह वैसी लड़कियों की सूची बनाता है जो दूसरे समुदाय के लड़कों के साथ भाग जाती हैं और उनके साथ शादी कर लेती हैं. वह उनका पीछा करता है और उनका अपहरण करके कुछ दिन अपने पास रखता है. उनके दिमाग की धुलाई करके वह वापस उन्हें माता-पिता को सुपुर्द करता है.

लड़कियों को वापस लाते समय, वे न चाहें तो भी अगर लड़का मुसलमान है तो उस पर ताकत आज़माई जाती है. मार-पीट तो मामूली बात है. यह सब धर्मार्थ ही तो किया जा रहा है!

‘अगर आप एक लड़की को बचाते हैं तो यह सौ गायों को बचाने के समान है. एक लड़की का मूल्य सौ गायों के बराबर है.’

बाबू बजरंगी के इस पर्चे में लड़की को बचाने से मिलने वाले पुण्य का प्रलोभन भी है.

सत्या से इस पर्चे से मिलने के बाद हम कुछ बुद्धिजीवियों और लेखकों से मिलने गए. उनमें से एक बुजुर्ग लेखक ने चर्चा के दौरान हिंदू लड़कियों और हिंदू परिवारों पर आई ‘आफ़त’ का ज़िक्र किया.

ये मुसलमान जवान कॉलेज और स्कूलों के बाहर मोटरसाइकिल लगाकर खड़े रहते हैं. ऐसे जवान होते हैं जिनकी बॉडी गठी हुई होती है और जो हीरो जैसे लगते हैं. वे लड़कियों पर डोरे डालने के लिए वहां जमे रहते हैं.

लड़कियां मोटरसाइकिल पर घूमने के लालच में उनके झांसे में आ जाती हैं. फिर वे उन्हें घुमाते हैं, अपने जाल में फंसा लेते हैं और उनका मजहब बदलकर उनसे शादी कर लेते हैं. इतना ही नहीं, वे उन्हें खराब करके छोड़ देते हैं. वे कहीं की नहीं रह जातीं. उनके मां-बाप बेचारे क्या करें!

इन बुज़ुर्गवार के मुंह से यह सब सुनकर हम बाबू बजरंगी से उनकी तुलना के अलावा और क्या कर सकते थे? लेकिन यह ख़याल गुजरात में हिंदुओं के बीच आम था.

यह कि मुसलमान नौजवान लड़के यह सब कुछ एक साज़िश और योजना के तहत करते हैं. उन्हें गैराजों से मोटरसाइकिल इस काम के लिए दी जाती है. गैराज ज़्यादातर मुसलमानों के हैं. इसके लिए पैसा इस्लामी मुल्कों से भेजा जाता है.

साज़िश इस तरह अंतरराष्ट्रीय है. इरादा हिंदू लड़कियों को खराब करने का है. उनकी कोख से मुसलमान पैदा करने का भी. यह मुसलमान आबादी बढ़ाने का षड्यंत्र है.

इसके बाद मेरी चर्चा एक वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता से हो रही थी. उन्होंने बताया कि हिंदुओं को उत्साहित किया जा रहा है कि वे अपने लड़कों को जिम या अखाड़ों में भेजें, जिससे वे अपना कसबल बना सकें.

यह ख़याल गुजरात में प्रचलित था कि मुसलमान नौजवान ‘हैंडसम’ और ‘मस्क्युलर’ होते हैं और लड़कियां उनकी ओर आकर्षित हो जाती हैं.

इसके कई वर्ष बाद एक टीवी चैनल की चर्चा में एक ‘हिंदुत्ववादी’ संगठन के प्रवक्ता ने शिकायत की- वे लोग अपने सुंदर नौजवान इस साज़िश में लगाते हैं. वे मसल वगैरह बनाकर हिंदू लड़कियों को लुभा लेते हैं. बेचारी हमारी लड़कियां फंस जाती हैं.

मैंने उन्हें कहा कि हम हिंदुओं को इतनी हीनता ग्रंथि में न पड़ जाना चाहिए. हिंदुओं में भी खूबसूरत और कसबल वाले जवान हुआ करते हैं. सुंदरता और सौष्ठव कोई मुसलमान जवानों के हिस्से ही नहीं आया है.

लेकिन यह समझ पुरानी है. यह लेख लिखते हुए मैं डॉक्टर अपर्णा वैदिक की किताब ‘मेरे बेटे की विरासत’ (My Son’s Inheritance) पढ़ रहा हूं. वे अपनी किताब को भारत में सामूहिक हत्याओं का गोपनीय इतिहास बताती हैं.

इस किताब में हिंदुओं के भीतर पैठी ग्रंथि को समझने की कोशिश की गई है, जिसके चलते बाबू बजरंगी जैसे लोग पैदा होते हैं और समाज के रक्षक बन जाते हैं. सिर्फ समाज की लड़कियों की रक्षा के नाम पर समाज का नेता बना जा सकता है.

यह इत्तेफ़ाक़ ही है कि इस ग्रंथि के निर्माण और इसे पोसने में आर्य समाज का काफी योगदान है जिसके प्रवर्तक स्वामी दयानंद, एक गुजराती ही थे! वे क्या इसकी कल्पना कर पाए होंगे कि उनके आंदोलन का एक परिणाम बाबू बजरंगी हो सकता है?

बाबू बजरंगी के पर्चे की तुलना करीब 150 साल पहले के इस उद्धरण से करें जो ‘हमारा भीषण ह्रास’ नामक संग्रह से लिया गया है:

‘यौन तृप्ति से वंचित हमारी विधवाओं को खासकर मुसलमानों से ख़तरा है और उनसे मुसलमान बच्चे पैदा कराए जा सकते हैं. वे अपनी संख्या बढ़ाते जाते हैं और हिंदुओं के लिए विपदा लाते हैं … तुम्हीं कहो क्या तुम चाहोगे कि हमारी आर्य विधवाएं मुसलमानों के साथ निकाह पढ़ें?’

अपर्णा लिखती हैं कि शायद मुसलमान मर्दों की वीर्यवानता की तुलना में हिंदुओं में खुद अपने पुंसत्व को लेकर संदेह था.

उस समय के साहित्य में इसके प्रमाण हैं कि हिंदुओं के भीतर मुसलमान जितनी यौन शक्ति हासिल करने की आकांक्षा थी. और इसके चलते मुसलमानों से घृणा भी की जाती थी.

इन सबके कारण हिंदू अपनी औरतों (पत्नी, मां, पुत्रियां, बहनें और गौमाता) को लेकर सशंकित रहते थे. उन गुजराती लेखक ने मोटरसाइकिल सवार हृष्टपुष्ट मुसलमान के यौन आकर्षण के आगे बेचारी हिंदू लड़कियों की लाचारी का वर्णन किया था.

सौ साल पहले मोटरसाइकिल की जगह इक्का था. अपर्णा एक पर्चे से एक उद्धरण देती हैं जिसका शीर्षक है:

‘चंद मुसलमानों की हरकतें’:

ऐ आर्यो ! क्यों सो रहे हो पैर पसारे
मुस्लिम ये नहीं होंगे हमारे तुम्हारे…

मुस्लिम बनाने के लिए स्कीम बनाई…

इक्कों को गली गांवों में लेकर घुमाते हैं
पर्दे में डाल मुस्लिम औरतों को बिठाते हैं

घुमाने का काम अब मोटर साइकिल करती है, तब इक्कों से ही काम लिया जाता था. हिंदू औरतों को घुमाने के बहाने फुसलाकर इक्कों में बिठाकर गायब कर दिया जाता है, यह इस पर्चे में चेतावनी दी जा रही है.

इस तरह एक हिंदू कल्पना का निर्माण किया गया, जो मुसलमान मर्दों को उनकी औरतों की चोरी करने की ताक में लगा हुआ मानते हैं. वे उनसे अपनी हवस मिटाते हैं और उन्हें मुसलमान बना लेते हैं. वे उनका इस्तेमाल मुसलमान पैदा करने के लिए करते हैं.

जो औरतों का अपहरण करते हैं, वे ही गायों को भी काटते हैं. गोरक्षा और स्त्री रक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

यौन ग्रंथि जलन पैदा करती है और अत्यंत हिंसक प्रतिशोध की भावना को जन्म दे सकती है. सदियों से करीब रहने वाले मुसलमानों को लेकर एक तरह की यौन प्रतियोगिता का भाव डेढ़ सौ सालों के दौरान लगातार प्रचार के जरिये पैदा किया गया है.

मुसलमान मांसाहारी हैं, इस कारण उनमें यौन ऊर्जा अधिक होती हैऔर वे हिंसक होते हैं. उनका प्रेम मात्र प्रेम नहीं है, वह एक व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा है.

उनका विवाह भी हिंदू विवाह से अलग है. हिंदू विवाह तो एक संस्कार है, एक धार्मिक कृत्य है. मुसलमान विवाह यौनतृप्ति और संतति वृद्धि के उद्धेश्य से किया जाता है.

यह बात हमने 2006 में राजस्थान की समाजशास्त्र की स्कूली किताब में पढ़ी, जिसमें हिंदू विवाह, मुसलमान विवाह और ईसाई विवाह की तुलना की गई थी.

इसलिए मुसलमान मर्दों के खिलाफ हिंसा जायज़ हो जाती है क्योंकि उनकी संख्या कम करके आप अपनी लड़कियों और स्त्रियों को ही नहीं बचाते, गायों की रक्षा भी करते हैं. मुसलमान औरतों के साथ हिंसा इसलिए कि मुसलमान संतति में वृद्धि न हो.

हम जानते हैं कि यह सारा कुछ हीनता बोध के कारण है. लेकिन इसे लगातार प्रचार के जरिये खाद-पानी दिया जा रहा है.

मुसलमान वीर्यत्व का प्रचार मुसलमान फिल्मी हीरो भी करते हैं. ख़ानों के हिंदी सिनेमा पर वर्चस्व को भी इसी तरह देखा जाता है. ख़ान बंधुओं के मुकाबले हिंदू हीरो की तुलना तगातार की जाती रही है.

‘कहो ना प्यार है’ फिल्म के हिट होने के बाद ह्रतिक रोशन से उम्मीद बंधी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ ने इस पर उल्लास प्रकट करते हुए पूरे पृष्ठ पर ह्रतिक रोशन का तस्वीर छापी और एक हिंदू पुत्र के उदय की सूचना दी.

आशा पैदा हुई कि ह्रतिक रोशन ख़ान बंधुओं के प्रति आकर्षण को ख़त्म कर सकेंगे. दुर्भाग्य से यह न हो सका. जैसे-जैसे भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ के निकट पहुंच रहा है, मुसलमान नायकों के प्रति खिंचाव बढ़ता जा रहा है.

बीच में तो हद तब हो गई जब एक पाकिस्तानी मुसलमान फ़वाद खान के प्रति हिंदू लड़कियों के भीतर दीवानगी देखी गई.

लड़कियों को बिना दिमाग का और भावुक फिसलन की शिकार माना जाता है और इसलिए उन पर निगाह रखने की ज़रूरत है और लगाम कसने की भी. लेकिन साथ साथ मुसलमानों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है, इसीलिए लगातार प्रचार आवश्यक है.

लड़कियां ज़िंदा बम है और उनको फटने से बचाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य है. लगता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष इसी कर्तव्य निर्वाह के पवित्र अभियान पर निकल पड़ी हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)