भारत

लद्दाख: हिमालयन भेड़िए के संरक्षण के लिए अनूठी कोशिश

एक समय तक लद्दाख में हिमालयन भेड़ियों से मवेशी बचाने के लिए शांगदोंग यानी एक तरह के पत्थरों के जाल बनाकर उन्हें फंसाया जाता था और इसकी मौत पर स्थानीय उत्सव मनाते थे. पर अब इसके अस्तित्व पर मंडराते ख़तरे को देखते हुए इसके संरक्षण के लिए इन शांगदोंगों को स्तूपों में बदला जा रहा है.

क्यामार घाटी के माने किरी में स्थित शांगदोंग के सामने प्रतिष्ठित स्तूप और उसके सामने हवा में फहराते हुए प्रार्थना ध्वज. (फोटो: कर्मा सोनम/ एनसीएफ)

क्यामार घाटी के माने किरी में स्थित शांगदोंग के सामने प्रतिष्ठित स्तूप और उसके सामने हवा में फहराते हुए प्रार्थना ध्वज. (फोटो: कर्मा सोनम/ एनसीएफ)

रहस्यों से भरी पहाड़ियों से घिरे लद्दाख की क्यामार घाटी में अपनी जीप खड़ी कर एक किनारे हम पहाड़ी झरने के बगल से फिसलन भरे पथरीले रास्ते पर चलने लगे.

दायीं ओर तकरीबन 20 फीट गहरी खाई और बाईं ओर खड़े पहाड़ थे. ऐसे दुर्गम और जोखिम भरे मार्ग पर कर्मा ले (ले यह एक लद्दाखी आदरार्थी विशेषण है) सहजता के साथ ऐसे चल रहे थे मानो बगीचे में टहल रहे हो.

पर मेरे लिए इस मार्ग पर चलना बेहद कठिन व चुनौतीपूर्ण था. पूरी सजगता के साथ चलने के बावजूद मैं भीतर से सशंकित और डरा हुआ था. लेकिन साहस करके किसी तरह मैंने यह रास्ता पार किया और अंततः हम एक हल्के ढलान वाली जगह पहुंच गए.

सुबह जल्दी ही हम ग्या गांव में बनी कर्मा ले की छोटी-सी बस्ती रुम्त्से छोड़ चुके थे. यह लेह-मनाली राजमार्ग पर समुद्र की सतह से लगभग 4150 मीटर की ऊंचाई पर सिंध नदी की एक उप-नदी के किनारे  है. हमने मनाली वाला मार्ग चुना. बायीं ओर गहरी खाई से बह रही वह नदी धीरे-धीरे हमारे समानांतर आ गई थी.

आगे चलकर जहां वह संकरी हुई वहां हमने उसे पार किया और फिर सॉल्ट रोड पर आ गए. 1980 तक इसी रास्ते से त्सो कर की ऊंची झील से लेह तक नमक पहुंचाया जाता था.

चरवाहे मवेशियों पर नमक की थैलियां लादकर आते थे और इसके बदले में जौ लेकर जाते थे. मौजूदा समय में यह सड़क त्सो मोरीरी के लोकप्रिय ट्रैक मार्ग का हिस्सा है.

आगे बढ़ते हुए हमने नदी पार की और विशाल क्यामार घाटी के ग्या चारागाह पहुंचे.  ‘अब हम एक बहुत ही विशेष स्थान देखने जा रहे है, एक प्राचीन भेड़ियों का फंदा!’ कर्मा ले ने कहा.

यह बात सुनकर मेरी उत्सुकता अत्यधिक बढ़ गई. रहस्य और रोमांच से भरे इस विस्तृत प्रदेश में भेड़िए का प्राचीन फंदा कैसा होगा? कल्पना से मन रोमांचित होने लगा. ऐसा लग रह था मानो मध्य युग में पहुंच गए हों.

लद्दाख जैसे उच्च पठार वाले ठंडे रेगिस्तानी इलाके में पशुपालन आजीविका का प्रमुख साधन था. 1970 के दशक तक ग्या के 150 में से 24 परिवार पशुपालन पर ही निर्भर थे.

आज ऐसे 14 परिवार हैं, जिनमें कुछ लोगों के पास 400 से भी अधिक मवेशी हैं. सर्दियों में पूरे गांव के मवेशियों का क्यामार घाटी में डेरा रहता है.

यहां की परिस्थितियां अत्यधिक जटिल और कष्टदायी हैं. तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तथा 25 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं.

यह इलाका कुछ दुर्लभ और लुप्तप्राय वन्य जीवों का अधिवास भी है. यहां भराल (ब्लू शीप), आईबेक्स, अरगली, यूरियल, कियांग के अलावा छोटे वन्यजीव जैसे खरगोश, पीका व मारमॉट भी पाए जाते हैं.

यहां घास के मैदानों में चर रही भेड़-बकरियों पर अक्सर भेड़िए और कभी-कभार तेंदुए, लिंक्स तथा तिब्बती रेगिस्तानी लोमड़ी हमला कर उनकी शिकार कर लेते थे.

ऐसे में अपनी भेड़, बकरियों को मारने वाले शिकारियों, खासकर भेड़ियों को सबक सिखाने तथा मवेशियों को उनसे बचाने के लिए चरवाहों ने एक तरीका ईजाद किया जिसका नाम था- शांगदोंग.

पक्षियों और पीका को निहारते हुए चलते जा रहे थे कि अचानक कर्मा ले कुछ दिखाते हुए चिल्लाए, ‘वह रहा शांगदोंग!’

लगभग 50 मीटर की दूरी पर एक पत्थर की दीवार जैसी आकृति नजर आ रही थी,जैसे-जैसे हम करीब पहुंचे आश्चर्य बढ़ता गया. शांगदोंग एक बड़ा, कटोरे के आकार का गड्ढा था, जिसकी दीवारें लगभग 6 फीट गहरी थीं.

इसकी संरचना व बनाने का कौशल लाजवाब थे. इसमें लगे पत्थर बड़े, सपाट और आयताकार थे, जिनमें कई 2 फीट, तो कुछ और भी ज्यादा लंबे थे. यह शांगदोंग लगभग 40 फीट चौड़ा था. इसे बनाने के लिए पत्थरों को कहीं दूर से लाया गया होगा क्योंकि ऐसे पत्थर वहां आसपास कहीं नजर नहीं आ रहे थे.

भेड़िए को शांगदोंग में फंसाने के लिए एक छोटे स्वस्थ भेड़ को चारे के रूप में इसमें रखा जाता था. भेड़ की मौजूदगी व गंध से भेड़िया आकर्षित होता और आसान शिकार के लालच में आकर शांगदोंग में कूद जाता.

पर कूदने के बाद जल्द ही उसे एहसास होता है कि शांगदोंग की ऊंची दीवारों से बाहर से निकल पाना नामुमकिन है.

शांगदोंग. (फोटो: पीयूष सेखसरिया)

शांगदोंग. (फोटो: पीयूष सेखसरिया)

नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ) ने एक 13 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘शांगदोंग टू स्तूप‘ जारी की है, जिसमें शांगदोंग के बारे में विस्तार से बताया गया है. हालांकि इसमें एक भेड़िए की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में मौत की घटना भी शामिल है.

हम जिस शांगदोंग को देख रहे थे वह कुछ समय से इस्तेमाल में नहीं था, उसमें झाड़ियां उग रही थीं. कर्मा ले ने अपने किशोरावस्था की एक घटना बताई जब उन्होंने भी शांगदोंग में फंसे एक भेड़िए को मारने के लिए पत्थर इकठ्ठा किए थे.

यह करीब 35 साल पहले की घटना थी. आज एनसीएफ में फील्ड मैनेजर के तौर पर काम कर रहे कर्मा ले लद्दाख के वन्य जीवों के संरक्षण की आवश्यकता को भली-भांति समझ चुके है.

भेड़िए को फंसाना और फिर उसे बेरहमी मारना, यहां एक उत्सव जैसा था. स्थानीय लोग भेड़िए का सिर काटकर गांव में उसका जुलूस निकालते थे.

चरवाहों के परिवार अपनी भेड़ और बकरियों की रक्षा के लिए सौ में से एक पशु को चारे की तरह उपयोग करने की इजाजत दे देते थे.

भेड़ियों को शांगदोंग में फंसाकर तो मारा जाता ही था, साथ ही सर्दियों में चरवाहे भेड़ियों की गुफाओं को ढूंढते और इन गुफाओं में रह रहे भेड़ियों के बच्चों (पिल्लों) को भी मार देते थे. इसके बदले में उन्हें बतौर इनाम ग्रामीणों से जौ मिलती थी.

हालांकि अब शांगदोंग उपयोग में नहीं हैं, लेकिन चरवाहे अब भी इन बच्चों को मारते हैं, जिससे हिमालयन भेड़िए के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.

हिमालयन भेड़िया एक असाधारण प्राणी है जो समुद्र की सतह से 4 हजार मीटर की ऊंचाई पर विरल हवा में जीवित रहने में सक्षम है. यह अपनी तरह की एक अलग प्रजाति घोषित होने की कगार पर है.

इसका विचरण क्षेत्र सिक्किम से लेकर लद्दाख तक फैला हुआ है, जिसमें तिब्बत, नेपाल और स्पीति घाटी के कुछ हिस्से शामिल हैं. वास्तव में हम यह नहीं जानते कि आज हिमालयन भेड़ियों की संख्या कितनी है.

इनके संरक्षण की दिशा में अभी तक इतना ध्यान नहीं दिया गया जितना ध्यान दिए जाने के यह हकदार हैं. शोधकर्ताओं को डर है कि यदि इनके संरक्षण के लिए जल्द कारगर कदम न उठाए गए, तो यह सुंदर जीव विलुप्त हो जाएंगे.

समय गुजरने के साथ अब पुरानी प्रथाओं में बदलाव आया है. आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध हुए हैं, जिससे लद्दाख के अनूठे वन्यजीवों के बारे में जागरूकता बढ़ रही है.

कर्मा ले ने पिछले एक दशक में एक भी भेड़िए को मारे जाने के बारे में नहीं सुना, शांगदोंग का भी उपयोग नहीं किया जाता है. फिर भी भेड़ियों और अन्य जानवरों के गलती से इन गड्ढों में गिरने और फंसने का खतरा है.

त्सो कार झील के पास सड़क के किनारे स्थित शांगदोंग में मैंने भेड़ और याक की खाल व कंकाल देखे, जो शिकारी प्राणियों को आकर्षित कर सकते हैं.

एनसीएफ के रिंगजिन दोरजे के प्रयासों से पूर्वी लद्दाख और शाम घाटी में इस तरह भेड़ियों के लिए बिछाए गए 80 जाल मिले हैं, जिससे पता चलता है कि शांगदोंग का उपयोग कितना व्यापक था.

कर्मा ले के अनुसार, शांगदोंग का उपयोग लगभग एक दशक पहले लद्दाख में किया जाता था, लेकिन तिब्बत वाले इलाके में यह अब भी इस्तेमाल में है.

दोरजे और उनके सहयोगी अब कारगिल सहित इस विशाल क्षेत्र के अन्य हिस्सों का अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं. साल 2016 में शांगदोंग को प्रतीकात्मक रूप से धार्मिक महत्व के स्थल (पूजा स्थल) में बदलने के विचार ने आकार लिया था.

शांगदोंग को स्तूप में बदलने के लिए एनसीएफ ने ग्राम प्रधानों (गोबा), गांव के युवा समूहों, महिलाओं के समूहों, चरवाहों के प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया.

2018 में एनसीएफ के चारुदत्त मिश्रा और चुशूल के लामायुरु मठ के धार्मिक नेता रंगडोल न्यामा रिनपोचे के बीच चर्चा के माध्यम से इस तरह का पहला स्तूप बनाया गया.

ग्या गांव के उत्साही युवाओं के समूह, ग्रामीणों, धार्मिक नेताओं, सरकारी अधिकारियों और विशेषकर चरवाहों को एकजुट किया गया, फलस्वरूप 2019 में ग्या गांव भी इस प्रयास में शामिल हो गया.

चुशूल के निवासियों ने एक शांगदोंग पर स्तूप का निर्माण किया और चार शांगदोंग खोल दिए, जबकि लाटो जनजाति ने शांगदोंग पर मानी अर्थात प्रार्थना अंकित पत्थर प्रतिष्ठित किया.

हिमालयन भेड़िया एक असाधारण प्राणी है समुद्र की सतह से 4,000 मीटर तक ऊंचाई वाले क्षेत्र की विरल हवा में भी जीवित रहने में सक्षम है तथा एक अलग प्रजाति घोषित होने की कगार पर है. (फोटो: रिंगझिन दोरजे/ एनसीएफ)

हिमालयन भेड़िया एक असाधारण प्राणी है समुद्र की सतह से 4,000 मीटर तक ऊंचाई वाले क्षेत्र की विरल हवा में भी जीवित रहने में सक्षम है तथा एक अलग प्रजाति घोषित होने की कगार पर है. (फोटो: रिंगझिन दोरजे/ एनसीएफ)

स्तूपों के निर्माण के साथ शांगदोंग को इस क्षेत्र की समृद्धि, कृषि और पशुपालन की विरासत के तौर पर संरक्षित किया जा रहा है. यदि कोई जानवर इसमें गिर जाता है तो वह आसानी से बाहर निकल सके इसके लिए रास्ता खुला छोड़ दिया जाता है.

चुशूल स्तूप को रंगडोल न्यामा रिनपोचे और अन्य बौद्ध भिक्षुओं के भी आशीर्वाद प्राप्त हुए है. इन धार्मिक नेताओं ने यह विश्वास जताते हुए पहल की है कि स्तूप बनने से अतीत में हुई गलतियों का प्रायश्चित होगा और सह-अस्तित्व को बढ़ावा मिलेगा.

मौसम अब ठंडा हो रहा था इसलिए हमने वापस लौटने का फैसला किया. उस दिन शाम को कर्मा ले को ग्या गांव के शांगदोंग से संबंधित एक चर्चा में भाग लेना था. जब तक हम अपनी जीप तक पहुंचे, बूंदाबांदी शुरू हो गई थी.

हालांकि लद्दाख में बर्फबारी और बारिश का यह समय नहीं था. कर्मा ले ने आशंका जताई कि मनाली-लेह मार्ग पर अधिकारियों ने आवागमन रोक दिया होगा. हम वापस उसी रास्ते पर चले गए, लेकिन अब हमारा नजरिया बदल गया था.

हमें अपने आसपास भेड़ियों की मौजूदगी का एहसास हो रहा था. रास्ते में कई जगह वन्यजीवों की लीद दिखी. कर्मा ले ने कहा कि वे भेड़िए की थीं.

हमें ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ों से घिरे इस विस्तृत क्षेत्र में भेड़िए भूरे धब्बे जैसे घूम रहे हों. रास्ते में हम कुछ जगहों पर पक्षियों और मारमॉट्स को देखने के लिए रुके.

शांगदोंग को स्तूप में बदलना वन्यजीवों के लिए बहुत अच्छा था लेकिन चरवाहों को क्षति का सामना करना पड़ेगा. इस पर कर्मा ले ने कहा कि चरवाहों की आजीविका की रक्षा के लिए अन्य पहल की गई है.

उनके अनुसार एनसीएफ के लोग बीमा योजना, शिकार मुक्त पशुशाला और चराई मुक्त क्षेत्र के लिए भी काम कर रहे हैं. उस शाम कर्मा ले की शांगदोंग को एक स्तूप में बदलने के बारे में ग्रामीणों के साथ हुई बैठक सकारात्मक रही.

दिल्ली लौटने के कुछ महीनों बाद वॉट्सऐप पर कुछ सुंदर तस्वीरें मिलीं. हमारे देखे गए शांगदोंग के बगल में स्तूप तथा प्रार्थना के झंडे लहरा रहे थे, धार्मिक कार्यक्रम के लिए शाही पोशाक में लामा खड़े थे.

एक लद्दाखी लोककथा है जिसमें शांगदोंग के भीतर फंसा एक भेड़िया मेमने से दोस्ती करने का नाटक करता है. उसे ‘प्यारी बहना’ कहते हुए उम्मीद करता है कि चरवाहे उसे छोड़ दें.

यह भेड़ और भेड़िए दोनों के लिए एक खुशहाल स्थिति नहीं हो सकती, जब लेकिन  अब जब उनके लिए बिछाए जाल स्तूप में तब्दील हो रहे हैं, यह कहानी जल्दी ही एक स्मृति बन जाएगी.

(लेखक प्रकृतिप्रेमी है.)

(मूल अंग्रेजी लेख से अरुण सिंह द्वारा अनूदित.)