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यूपी में निर्दोष लोगों के ख़िलाफ़ गोहत्या क़ानून का दुरुपयोग हो रहा है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

राज्य में इस साल 19 अगस्त तक रासुका के तहत गिरफ़्तार 139 में से 76 लोगों पर गोहत्या के आरोप हैं. हाईकोर्ट ने गोहत्या के मामलों में पुलिस द्वारा पेश साक्ष्यों की विश्वनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी कोई मांस बरामद होता है, तो फॉरेंसिक जांच कराए बिना ही उसे गोमांस क़रार दे दिया जाता है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गोहत्या संरक्षण कानून का निर्दोष लोगों के खिलाफ दुरुपयोग करने और इस तरह के मामलों में पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की विश्वनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस कानून का दुरुपयोग राज्य में निर्दोष लोगों के खिलाफ किया जा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आवारा मवेशियों की सुरक्षा के लिए गोहत्या कानून को राज्य में सही भावना के साथ लागू करने की जरूरत है.

गोहत्या संरक्षण कानून के तहत अगस्त से जेल में बंद एक आरोपी को जमानत देते हुए जस्टिस सिद्धार्थ ने गोहत्या निषेध कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए रहमू और रहमुद्दीन नाम के दो व्यक्तियों को जमानत दे दी. इन दोनों पर  कथित तौर पर गोहत्या में शामिल होने की बात कही गई थी.

याचिकाकर्ता का कहना था कि प्राथमिकी में उनके खिलाफ कोई विशेष आरोप नहीं हैं और उन्हें घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया. इसके अलावा, बरामद किया गया मांस गाय का था या नहीं, इसकी पुलिस द्वारा जांच भी नहीं की गई.

संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा, ‘निर्दोष लोगों के खिलाफ इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. जब भी कोई मांस बरामद होता है तो फॉरेंसिक लैब में जांच कराए बिना उसे गोमांस करार दे दिया जाता है.’

उनके आदेश में कहा गया, ‘अधिकतर मामलों में बरामद मांस को जांच के लिए लैब नहीं भेजा जाता. इस दौरान आरोपी को उस अपराध के लिए जेल में जाना होता है, जो उसने नहीं किया होता और जिसमें सात साल तक की सजा है और इस पर विचार प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है.’

अदालत ने कहा, ‘जब भी कोई मांस बरामद होता है, उसका कोई रिकवरी मेमो तैयार नहीं किया जाता और किसी को पता नहीं होता कि बरामदगी के बाद उसे कहां ले जाया जाएगा.’

उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में इस साल अगस्त 2019 तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत गिरफ्तार किए गए 139 में से 76 यानी आधे से अधिक लोगों पर गोहत्या के आरोप लगे हैं.

एनएसए के अलावा इस साल 26 अगस्त तक यूपी गोहत्या संरक्षण कानून के तहत 1,716 मामले दर्ज किए गए हैं और 4,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

आंकड़ों से पता चलता है आरोपियों के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने में असफल रहने पर पुलिस ने 32 मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की.
जस्टिस सिद्धार्थ ने अपने आदेश में राज्य में आवारा मवेशियों और समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों को भी उठाया.

आदेश में कहा गया, ‘गौशालाएं दूध न देने वाली और बूढ़ी गायों को स्वीकार नहीं करतीं और उन्हें सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ देती हैं. इसी तरह जब गाय दूध देना बंद कर देती है तो उनके मालिक उन गायों को सड़कों पर छोड़ देते हैं इस तरह वे नाले का पानी पीती हैं और कचरा व पॉलिथीन खाती हैं. गाय और मवेशी यातायात के लिए परेशानी का सबब है और इस वजह से कई मवेशियों की मौतें हो चुकी हैं.’

आदेश में कहा गया, ‘ग्रामीण इलाकों में मवेशियों को चारा खिलाने में अक्षम इनके मालिक इन्हें आवारा छोड़ देते हैं. स्थानीय लोगों और पुलिस की वजह से इन्हें राज्य से बाहर नहीं ले जाया जा सकता. अब कोई चारागाह भी नहीं है इसलिए मवेशी यहां-वहां भटकते हैं और फसलों को बर्बाद करते हैं. इससे पहले किसान नीलगाय से परेशान रहते थे और अब उन्हें आवारा गायों से भी अपनी फसलों को बचाना है.’

आदेश में आगे कहा गया, ‘चाहे गाय सड़कों पर हो या फिर खेतों में इनको आवारा छोड़ देने से समाज पर बड़े पैमाने पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अगर उत्तर प्रदेश गोहत्या संरक्षण अधिनियम को सही तरीके से लागू किया जाता है तो इन गायों को गौशालाओं या फिर मालिकों के पास ही रखने का कोई तरीका निकाला जा सकता है.’

अदालत ने कहा, चाहे गायें सड़कों पर हों या खेत में, उन्हें खुला छोड़ने से समाज बुरी तरह प्रभावित होता है. यदि गोहत्या कानून को सही ढंग से लागू करना है तो इन पशुओं को आश्रय स्थलों या मालिकों के पास रखने के लिए कोई रास्ता निकालना पड़ेगा.

बता दें कि उत्तर प्रदेश गोहत्या संरक्षण कानून के तहत राज्य में गोवंश हत्या निषेध है. इसका उल्लंघन करने पर दस साल सश्रम कारावास और पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)