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मुज़फ़्फ़रपुर: विकास के दावे के साथ शुरू हुआ पावर प्लांट अब बना मुसीबतों का सबब

ग्राउंड रिपोर्ट: मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के कांटी में बना एनटीपीसी का थर्मल पावर प्लांट स्थानीयों के लिए नौकरियों और विकास के सपनों के साथ शुरू हुआ था, लेकिन आज आजीविका की जद्दोजहद में लगे स्थानीय लोग प्लांट से निकल रही ज़हरीली गैस और राख़ के चलते रोगों से घिरे हैं, जिनकी सुनने वाला भी कोई नहीं है.

गांव के एक खेत में बने तालाब में गिर रही बॉटम ऐश. (सभी फोटो: रोहित उपाध्याय)

गांव के एक खेत में बने तालाब में गिर रही बॉटम ऐश. (सभी फोटो: रोहित उपाध्याय)

बिहार का मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला अपनी शाही लीची के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर की दूरी पर एक जगह है कांटी.

ये इलाका काफी हरा-भरा है. यहां पास में बूढ़ी गंडक नदी बहती है जिसकी वजह से यहां तमाम सारे बड़े और गहरे तालाब बन गए है जो साल भर पानी से भरे रहते हैं. गांव के लोग इन्हीं तालाबों से मछलियां पकड़कर गुजर-बसर करते हैं.

कांटी में साल 1985 में एक कोल बेस्ड थर्मल पावर स्टेशन लगाया गया. एनटीपीसी के इस पावर प्लांट में कोयला जलाकर बिजली बनाई जानी थी.

थर्मल पावर स्टेशन में बहुत बड़े स्तर पर कोयला जलाया जाता है. ट्रेनें बिना रुके कोयला ढोती रहती हैं ताकि बिजली बनती रहे.

ये बिजली बनाने का सबसे सस्ता तरीका है. लेकिन पर्यावरण के लिए बहुत ज़हरीला होता है. इसलिए जहां भी थर्मल पावर प्लांट्स लगाए जाते हैं, ये ख़्याल रखा जाता है कि आस-पास रिहायशी इलाके न हों. लेकिन मुज़फ़्फ़रपुर में कांटी के हरे भरे इलाके में प्लांट लगाया गया.

इलाके वालों से कहा गया कि पावर प्लांट बनेगा तो लोगों को नौकरी मिलेगी और विकास होगा, बिजली फ्री में मिलेगी. जिसकी वजह से इलाके के बहुत सारे लोगों ने अपनी जमीनें दान में दे दीं, कुछ लोगों ने औने-पौने दाम पर अपनी जमीन बेच दी.

प्लांट बना. बिजली पैदा होने लगी, लेकिन नाममात्र के लोगों को नौकरी मिली और बाकी लोगों के हिस्से आई दमा, हार्ट अटैक और चर्म रोग की बीमारी.

दरअसल कोयला जलने से कार्बन डाई ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स और मिथेन जैसी जहरीली गैसों के साथ-साथ राख भी निकलती है.

प्लांट से राख दो तरह से निकलती है एक तो वो महीन कण जो उड़कर हवा में मिल जाते हैं इसे फ्लाई ऐश कहते हैं और दूसरे लिक्विड यानी तरल फॉर्म में राख निकलती है. इसे बॉटम ऐश कहते हैं.

फ्लाई ऐश (हवा में मिली राख) थर्मल पावर प्लांट के आसपास के इलाकों में उड़ती रहती है जिससे पावर प्लांट के नजदीक रहने वाले लोगों में सांस के जरिये राख के टुकड़े फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं. इससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियां होने लग जाती हैं.

थर्मल पावर प्लांट के बिल्कुल नजदीक कोठियां गांव में रहने वाले बिश्नी साहनी बताते हैं कि प्रदूषण की वजह से उन्हें दमा की बीमारी हो गई है और हार्ट अटैक भी आ चुका है.

इसी गांव की फूलो देवी बताती हैं, ‘घर में छाई (राख) घुस जाती है. हमारे खाने में भी पड़ जाती है. पेड़-पौधे भी हरे-भरे नहीं रहते हैं और जानवरों को भी नुकसान होता है. राख के टुकड़े आंख में भी चले जाते हैं जिससे गांव वालों की आंख भी कमजोर हो रही है. आंधी चलने पर राख घर में घुस जाती है और पूरे गांव का सांस लेना मुश्किल हो जाता है. सबसे खराब स्थिति बच्चों की है.’

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर तीन मिनट में एक बच्चे की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हो जाती है.

इसी साल का यूनिसेफ का एक अध्ययन बताता है कि प्रदूषित वातावरण में रह रहे एक साल से कम उम्र के बच्चों में ब्रेन डैमेज होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है और बच्चों के फेफड़े अपेक्षाकृत छोटे हो जाते हैं.

कोठियां गांव के बच्चे बड़े-बूढ़े सभी दिन रात थर्मल पावर से निकलती जहरीली हवा और राख अपने फेफड़ों में भर रहे हैं. प्लाई ऐश के अलावा पावर प्लांट से पानी के साथ निकलती बॉटम ऐश को एक गड्ढे में डिस्पोज़ किया जाता है जिससे ऐश पॉन्ड बन जाता है.

लेकिन डिस्पोज करते वक्त इसका ध्यान रखा जाता है कि राख के ये टुकड़े ग्राउंड वाटर यानी जमीन के पानी में न मिलने पाएं. वरना पानी बहुत जहरीला हो जाता है.

पर गांव वाले बताते हैं कि इस राख को पावर प्लांट वालों ने मनमाने तरीके से उन तालाबों में भर दिया जिनमें वे मछली पकड़ते थे. तालाबों को राख से लगातार पाटा जा रहा है.

गांव वालों को पावर प्लांट से नौकरी की उम्मीद थी, लेकिन हुआ यह कि उनके गुज़ारे का एकमात्र सहारा तालाब भी छिनने लगा. तालाबों में राख भरी जाने लगी.

ये राख उपयोगी होती है. इसका इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन में बालू की जगह पर किया जा सकता है, इसलिए इसको निकालकर बेचा जाता है.

निकालने का ठेका एनटीपीसी किसी कंपनी को देती है, लेकिन कांटी थर्मल पावर प्लांट से जो राख निकाली जा रही है उसमें मजदूरी का काम कोठियां गांव के लोग ही कर रहे हैं क्योंकि तालाब पाटे जाने के बाद उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं बचा है इसलिए वे कम पैसों में और बिना सेफ्टी के राख को ट्रकों में भरवाने को लिए राज़ी हो जाते हैं.

पावर प्लांट से निकली राख में रेडियोऐक्टिव पदार्थ भी मिले होते हैं इसलिए बिना सेफ्टी के राख भरने की वजह से कोठियां गांव के कई लोग चर्म रोग का शिकार हो गए हैं.

गांव के प्रेम लाल साहनी बताते हैं, ‘प्लांट जब लग रहा था तो लोगों से वादा किया गया था कि गांव वालों को नौकरी मिलेगी लेकिन नहीं मिली. हम लोग मछली पकड़ने का काम करते थे लेकिन हमारे तालाब में राख भर दी गई है. नाममात्र के तालाब बचे हैं जिनसे गुजारा नहीं होता है इसलिए हमें मजबूरन राख भरनी पड़ रही है. मेरा पैर देखिए मुझे चर्म रोग हो गया है. दवा लगाता हूं लेकिन घाव ठीक नहीं होता है. दिन रात पैर दर्द करता है.’

राम विलास के पांव में हुआ घाव.

राम विलास के पांव में हुआ घाव.

प्रेम लाल की ही तरह राम विलास भी राख की ढुलाई करने जाते थे. लेकिन घाव बढ़ जाने के कारण अब उनका चलना-फिरना मुश्किल हो गया है.

ये पूछने पर कि एनटीपीसी तो बिना सेफ्टी के राख की ढुलाई करने से मना करती है फिर भी क्यों करने जाते हैं, राम विलास कहते हैं, ‘गांव के सब आदमी कमा रहे हैं, हम भूखे मरें क्या!’

इस इलाके में घूमते हुए चारों तरफ राख ही दिखाई देती है. गांव के थोड़ा अंदर जाने पर कुछ किसानों से बात की तो उन्होंने बताया कि पहले के मुकाबले उनके खेतों में पैदावार कम हो गई है और जहरीली गैस की वजह से शाही लीची की पैदावार पर असर पड़ा है और कई पेड़ भी सूख गए हैं.

लीची के किसान मोहम्मद हुसैन वारसी बताते हैं, ‘पहले और अब की लीची में बहुत फर्क आ गया है. एनटीपीसी पावर प्लांट लगने के पहले जो शाही लीची पैदा होती थी वो साइज में बड़ी होती थी लेकिन अब उनका साइज छोटा हो गया है. लीची का साइज बड़ा करने के लिए अब कई लोग केमिकल का इस्तेमाल भी करते हैं लेकिन फिर भी पहले वाली बात नहीं आ पाती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘पैदावार पर भी असर पड़ा है. और क्योंकि मुज़फ़्फ़रपुर के किसानों के लिए शाही लीची ही उनकी मुख्य फसल हैं इसलिए किसानों की आमदनी भी कम हो गई है.’

दरअसल कोयला जलने से सल्फर डाईऑक्साइड निकलता है जिसकी वजह से एसिड रेन होती है. एसिड रेन पेड़-पौधों के लिए बहुत खतरनाक होती है क्योंकि एसिड रेन से मिट्टी में मिले मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व ख़त्म हो जाते हैं, जिससे पेड़ पौधे सूख जाते हैं.

सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड हवा में न मिलने पाएं इसके लिए डीसल्फराइज़ेशन किया जाता है. इसे फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन [Flue Gas Desulfurization] या एफजीडी [FGD] कहते हैं.

कांटी के थर्मल पावर प्लांट में डीसल्फराइजेशन किया जा रहा है या नहीं, इस बारे में जब एनटीपीसी के अधिकारियों से बात करनी चाही, तब एनटीपीसी के एचआर अतुल पराशर ने कहा कि उन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और वे हमसे बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव तक बात नहीं करेंगे। उसके बाद अपने वरिष्ठों से पूछकर बताएंगे.

कोयला जलने से कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2), क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFCs) और मिथेन जैसी गैसें निकलती हैं, जिन्हें ग्रीन हाउस गैसें कहते हैं. ये गैसें सूरज से मिल रही गर्मी को वापस नहीं जाने देतीं, जिससे उस इलाके का तापमान बढ़ जाता है.

Kanti Thermal Plant Ash Pond Photo Rohit Upadhyay

गांव के विजय कुमार बताते हैं, ‘अभी ठंड का मौसम आ रहा है तो थोड़ा ठीक है लेकिन गर्मी के मौसम में इस गांव में रहना मुश्किल हो जाता है भयंकर गर्मी लगती है और गर्मी के मौसम में लू के साथ उड़कर राख घरों में घुसती है, खाने-पीने में पड़ जाती है. लोगों का बहुत बुरा हाल हो जाता है.’

मुज़फ़्फ़रपुर में कांटी थर्मल पावर प्लांट का मुद्दा हमेशा से उठता रहा है. इस मुद्दे को उठाकर हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के अजित कुमार कांटी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते और सरकार में मंत्री पद तक पहुंचे.

उनसे जब पूछा गया कि प्लांट की वजह से लोगों को आ रही दिक्कतों पर वे क्या सोचते हैं, उन्होंने कहा, ‘चुनाव के बाद सब कुछ मैं ठीक कर दूंगा, चुनाव के बाद सब ठीक हो जाएगा.’

गांव वाले आरोप लगाते हैं कि एनटीपीसी की तरफ से आने वाली मदद उन तक नहीं पहुंचती है. कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का जो पैसा आता है उससे गांव में कुछ लोगों को कंबल बंटवाया जाता है बाकी पैसा अधिकारी नेता मिलकर खा जाते हैं.

कांटी ही नहीं पूरे मुज़फ़्फ़रपुर में वायु प्रदुषण बहुत ज्यादा है. हालांकि इसके लिए अकेला थर्मल पावर प्लांट जिम्मेदार नहीं है लेकिन प्रदूषण का एक बड़ा कारण जरूर है.

कुल मिलाकर कहा जाए तो दिन-रात कांटी इलाके के लोगों के फेफड़ों में रोजाना जहर उतर रहा है. उनकी आजीविका के साधन रहे तालाब पाटे जा रहे हैं, किसानों की पैदावार कम हो गई है, लीची के पेड़ सूखने लगे हैं. हर वो बीमारी जो प्रदूषण के चलते होती है, उसके रोगी यहां हैं, मगर सुनने वाला कोई नहीं है.

जमीन लेते समय किए गए कंपनी के वादे झूठे साबित हो चुके हैं और अब लोगों ने इसे ही नियति मान लिया है. बिहार में विधानसभा चुनाव शुरू हो चुके हैं लेकिन बाकी कई जरूरी मुद्दों की तरह यह मुद्दा भी चुनावी चर्चा से नदारद है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)