भारत

दीनदयाल उपाध्याय: जो मुसलमानों को समस्या और धर्मनिरपेक्षता को देश की आत्मा पर हमला मानते थे

अंत्योदय का नारा देने वाले दीनदयाल उपाध्याय का कहना था कि अगर हम एकता चाहते हैं, तो हमें भारतीय राष्ट्रवाद को समझना होगा, जो हिंदू राष्ट्रवाद है और भारतीय संस्कृति हिंदू संस्कृति है.

New Delhi: Prime Minister Narendra Modi pays floral tributes to the bust of Shyama Prasad Mukherjee at BJPs national executive meeting at Talkatora stadium, in New Delhi on Monday. PTI Photo by Kamal Kishore (PTI9 25 2017 000034B)

दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती पर श्रद्धांजलि देते प्रधानमंत्री मोदी (फोटो: पीटीआई)

(यह लेख पहली बार 2 अगस्त 2017 को प्रकाशित किया गया था)

भारत के मौजूदा राजनीतिक विमर्श में दीनदयाल उपाध्याय का उभार, जो धर्मनिरपेक्षता की मुख़ालफ़त करते थे, जिन्होंने हिंदू मुस्लिम एकता का विरोध किया और जो हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थे, एक तरह से आनेवाले दिनों की बानगी है.

-संपादक

‘दीनदयाल उपाध्याय की भाजपा के लिए वैसी भी अहमियत है जैसी कांग्रेस के लिए मोहनदास करमचंद गांधी की’’, यह कहना था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के पूर्व संपादक आर बालाशंकर का, जो इन दिनों भाजपा की केंद्रीय कमेटी के प्रशिक्षण महाअभियान के सदस्य हैं.’

(The Indian Express, September 24, 2016)

हाल में सीमावर्ती सूबे राजस्थान में इतिहास को ‘नए सिरे से गढ़ा गया.

अगर अभी तक हम यही जानते थे कि हल्दीघाटी की ऐतिहासिक लड़ाई में – जो 1571 में संपन्न हुई थी, सम्राट अकबर के हाथों महाराणा प्रताप को शिकस्त मिली थी, मगर अब (कम से कम राज्य के स्नातक कक्षाओं के) छात्रों को यही पढ़ाया जाएगा कि दरअसल राणाप्रताप नहीं बल्कि इस लड़ाई में अकबर हारा था.

समाचार है कि राजस्थान विश्वविद्यालय ने सत्ताधारी पार्टी के एक विधायक द्वारा इस संबंध में भेजे प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है तथा एक स्थानीय लेखक/इतिहासकार द्वारा की गयी ‘खोजों’ के आधार पर विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में तब्दीली करने का निर्णय लिया है.

निश्चित ही प्रस्तुत ‘कदम’ जिसे विशिष्ट समुदाय/ संगठन की मांगों/चिंताओं को ‘संतुष्ट’ करने या ‘संबोधित’ करने के नाम पर उठाया गया है, उसे लेकर बहस लंबे समय तक चलती रहेगी क्योंकि इतिहास ऐसा अनुशासन नहीं है कि जिसे राजनेताओं के आदेश पर ‘गढ़ा’ जा सके, बल्कि वह ज्ञान की एक प्रणाली होती है जो लंबे कालखंड में एकत्रित या संकलित किए गए तथ्यों पर आधारित होती है.

अधिक चिंताजनक बात यह है कि कितने गुपचुप तरीके से महात्मा गांधी- जिन्हें प्यार/सम्मान के तहत ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है, को सत्ताधारी पार्टी के एक अन्य नेता के समकक्ष खड़ा किया जा रहा है.

नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के पहले व्याख्यान में इसकी जिस तरह झलक दिखाई दी उसके चलते उठा विवाद फिलवक्त़ थम गया दिखता हो, मगर चिंताएं गहरा रही हैं.

निस्सन्देह केंद्र में तथा कई राज्यों सत्तासीन पार्टी के लिए दीनदयाल उपाध्याय (25 सितंबर 1916 – 11 फरवरी 1968), जिन्हें भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ का शिल्पकार कहा जाता है, की अत्यधिक अहमियत है. और इसी वजह से उनकी जन्मशताब्दी मनाने का काम उसने जोर-शोर से हाथों में लिया है.

मोदी सरकार ने इसके लिए दो कमेटियों का गठन भी किया है. अगर जनाब मोदी 149 सदस्यों वाली राष्ट्रीय कमेटी की अध्यक्षता कर रहे हैं जबकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह 23 सदस्यीय कार्यकारी कमेटी की अध्यक्षता कर रहे हैं (द हिंदू, 24 सितंबर 2016)

विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों के जरिए जारी उनका गौरव बढ़ाने के तमाम प्रयासों के अलावा दीनदयाल उपाध्याय की संकलित रचनाओं के 15 खंड भी उन राज्यों के स्कूलों को भेजे जा रहे हैं जहां भाजपा हुकूमत में है, जिसके लिए इन सरकारों को करोड़ो रुपये देने पड़ रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि दीनदयाल उपाध्याय का गौरव बढ़ाने की लिए की जा रही यह तमाम कवायद व्यापक जनता के बीच उनके अपने जीवन के तमाम पहलुओं तथा विश्व दृष्टिकोण को लेकर रातोंरात चुनिंदा स्मृतिलोप विकसित करने में मददगार होगी ताकि आम जनता ‘उपाध्यायजी के सपनों’ का समतामूलक समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगी.

उनके चरित्रकार बताते हैं कि दीनदयाल उपाध्याय 21 साल की उम्र में सामाजिक-राजनीतिक तौर पर संघ कार्यकर्ता/प्रचारक के तौर पर 1937 में सक्रिय हुए, मगर यही देखने में आता है कि वह आज़ादी के पहले के एक दशक में उनकी गतिविधियों को लेकर अर्थात 1937 से 1947 के बीच के कार्यकलापों को लेकर अजीब-सी ख़ामोशी बरतते हैं और अचानक 1947 पहुंचकर बताने लगते हैं कि किस तरह उस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की शुरूआत की तथा संघ प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय को दो प्रकाशनों के संपादन का ज़िम्मा सौंपा.

हम आज़ादी के पहले के उस तूफानी दशक को याद कर सकते हैं जो ज्ञात भारतीय इतिहास का सबसे उथलपुथल भरा कालखंड था, जब लाखों करोड़ों जनता बर्तानवी हुक्मरानों के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई थी. 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश सरकार के लिए इतना बेकाबू हो चला था कि उसे आंदोलनकारी जनता को कुचलने के लिए तमाम स्थानों पर मशीनगनों एवं हवाई बमबारी का प्रयोग करना पड़ा था तथा भारत के कुछ हिस्सों पर उसका नियंत्रण कुछ समय तक के लिए समाप्त हुआ था.

इस आंदोलन में लाखों लोग जेलों में ठूंस दिए गए थे और हजारों लोग मारे गए थे. इतना ही नहीं उस दौर में मजदूरों एवं किसानों के उग्र आंदोलन चले थे, फिर चाहे कल कारखानों के मजदूर हों या तेभागा -तेलगांना के जुझारू किसान हों. इतना ही नहीं राॅयल इंडियन नेवी के जांबाज सैनिकों ने ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ बगावत की थी और उनके समर्थन में तमाम शहरों में लाखों लोग खड़े हुए थे.

और संघ के जीवनव्रती दीनदयाल उपाध्याय और उनके जैसे तमाम प्रचारक/स्वयंसेवक इस तूफानी कालखंड में कहा थे ?

दरअसल उनके चरित्रकार इस सच्चाई को रेखांकित नहीं करना चाहते हैं कि उपाध्याय अपने तमाम स्वयंसेवक साथियों की तरह इस आंदोलन से दूर खड़े थे और हिंदू राष्ट्र हेतु ‘संगठन निर्माण’ पर अपने आप को केंद्रित किए थे. यह ऐसी सच्चाई है जिसकी ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभागों की रिपोर्टों में भी ताईद की जा सकती है.

एक ऐसी रिपोर्ट के मुताबिक,

‘.. संघ ने सचेतन तौर पर अपने आप को क़ानून के दायरे में रखा है और विशेष तौर पर, अगस्त 1942 में उठे विद्रोहों में शामिल होने से अलग किया है.’ (एंडरसन, वाॅल्टर एंड दामले, श्रीधर ; द ब्रदरहुड इन सैफ्रन: द राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एंड हिंदू रिवाइवलिज़्म, वेस्टव्यू प्रेस, 1987, पेज 44)

यह जाहिर था कि हिंदुत्व के यह तमाम स्वयंभू रणबांकुरे संघ के सुप्रीमो गोलवलकर द्वारा तय की गयी लाइन का ही अनुकरण कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था,

 ‘1942 में भी तमाम लोगों के दिलों में भावनाओं का ज़बर्दस्त उबाल था. उस दौरान भी संघ का दैनंदिन कार्य चलता रहा. संघ ने तय किया कि वह सीधे कुछ नहीं करेगा. हालांकि संघ के स्वयंसेवकों के दिलों में उथलपुथल चलती रही. संघ निष्क्रिय लोगों की संस्था है, उनकी बातें बेकार हैं, न केवल बाहरी बल्कि हमारे स्वयंसेवक भी ऐसी बातें करते थे. और काफी उद्धिग्न थे.’ (माधव सदाशिव गोलवलकर, श्रीगुरूजी समग्र दर्शन, हिंदी में गोलवलकर की संकलित रचनाएं, खंड 4, भारतीय विचार साधना, नागपुर, पेज 40)

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संघ प्रमुख एमएस गोलवलकर (बाएं) और युवा अटल बिहारी बाजपेयी (दाएं) के साथ दीनदयाल उपाध्याय (बीच में) (फोटो: जीवन दर्शन का यूट्यूब स्क्रीनशॉट)

अधिक विचलित करनेवाली बात यह है कि संगठन द्वारा ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ चले संघर्ष में सहभागी न होने या उसका विरोध करने को लेकर, बाद में आत्मालोचनात्मक रुख अख्तियार करने के बजाय दीनदयाल उपाध्याय बाद में उसको औचित्य प्रदान करते दिखते हैं और इस दौरान आज़ादी के लिए अपना सबकुछ कुर्बान किए तमाम ज्ञात अज्ञात शहीदों को एक तरह से अपमानित करते दिखते हैं:

‘हम लोग दरअसल इस गुमराह करनेवाली धारणा का शिकार थे कि आज़ादी का मतलब विदेशी शासन को उखाड़ फेंकना. विदेशी सरकार का विरोध का मतलब यह नहीं होता कि मातृभूमि के लिए आप सही मायने में प्यार करते हैं… आज़ादी के लिए चले संघर्ष में ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध पर ज़ोर दिया गया.. यह माना जाने लगा कि जिसने भी ब्रिटिशों का विरोध किया वह देशभक्त है. उन दिनों एक नियमित अभियान चलाया गया कि ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त असंतोष को पैदा किया जाए और इस देश के लोगों के सामने खड़ी हर समस्या और परेशानी के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाए. (सीपी भिशीकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय: आइडियोलॉजी एंड परसेप्शन – कॉन्सेप्ट ऑफ द राष्ट, वॉल्यूम 5, सुरूचि, दिल्ली, पेज 169)

उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में सहभागी न होना या उसका विरोध करने के अलावा हिंदू मुस्लिम एकता पर दीनदयाल का नज़रिया बहुत समस्याग्रस्त दिखता है, जिस मकसद के लिए महात्मा गांधी ने अपनी जान की बाजी लगा दी. दीनदयाल ने ऐसे लोगों को मुस्लिमपरस्त कहकर संबोधित किया तथा ‘एकता’ की कांग्रेस नीति की मुख़ालफ़त की.

‘संघ के एक मुखपत्र ‘राष्ट्रधर्म’ में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया है कि संघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय ‘हिंदू मुस्लिम एकता’ के ख़िलाफ़ थे और मानते थे कि एकता का मुददा ‘अप्रासंगिक’ है और मुसलमानों का तुष्टीकरण है.’

‘मुस्लिम समस्या: दीनदयाल जी की दृष्टि में’ शीर्षक से उपरोक्त लेख राष्ट्रधर्म के विशेष संस्करण में प्रकाशित हुआ जिसका विमोचन रविवार को केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने किया. मासिक पत्रिका का उपरोक्त अंक उपाध्याय को समर्पित किया गया है और उसमें उनके बारे में तथा उनके नज़रिये के बारे में लेख है.

डॉ. महेशचंद्र शर्मा द्वारा लिखा गया उपरोक्त लेख यह भी दावा करता है कि उपाध्याय ने कहा था कि ‘मुसलमान होने के बाद कोई व्यक्ति देश का दुश्मन बन जाता है.’ उसमें यह भी लिखा गया है, ‘अगर देश का नियंत्रण उन लोगों के हाथ में है जो देश में पैदा हुए हैं मगर वह कुतुबुददीन, अल्लाउददीन, मुहम्मद तुगलक, फिरोज शाह तुगलक, शेरशाह, अकबर और औरंगजेब से अलग नहीं हैं, तो यह कहा जा सकता है कि उनके प्रेम के केंद्र में भारतीय जीवन नहीं है.’

प्रस्तुत लेख लिखनेवाले डॉ. महेश चंद्र शर्मा का परिचय यह है कि वह 15 खंडों में प्रकाशित दीनदयाल उपाध्याय की संकलित रचनाओं के संपादक हैं जिसका विमोचन जनाब मोदी ने पिछले साल किया था.

अन्य स्थानों पर भी मुसलमानों के एक ‘जटिल समस्या’ होने की बात दीनदयाल दोहराते दिखते हैं.

‘आजादी के बाद सरकार, राजनीतिक पार्टियों और लोगों को कई महत्वपूर्ण समस्याओं का सामना करना पड़ा.. लेकिन मुस्लिम समस्या इनमें सबसे पुरानी, सबसे जटिल है और नये-नये रूपों में उपस्थित होती रहती है. विगत 1200 सालों से इस समस्या से हम जूझ रहे हैं. (BN Jog, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology & Perception-Politics for Nation’s Sake, vol. vi, Suruchi Prakashan, Delhi, 73)

कोई भी देख सकता है कि दीनदयाल उपाध्याय जिस तरह मुसलमानों को ‘समस्या’ के तौर पर देखते हैं, इसमें वह गोलवलकर के विचारों के साथ बिल्कुल सामंजस्य लिए दिखते हैं, जो अपनी किताब ‘बंच आफ थॉट्स’ अर्थात विचार सुमन में मुसलमानों को ‘आंतरिक ख़तरा’ के तौर पर चिन्हित करते हैं.

यह बात भी अब इतिहास हो चुकी है कि नवस्वाधीन भारत जो व्यक्तिगत अधिकारों की उल्लंघनीयता और सामाजिक तौर पर वंचित उत्पीड़ित रहे करोड़ों भारतीयों के लिए विशेष अवसरों पर आधारित संविधान रच रहा था, तब गोलवलकर की अगुआई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मांग की कि स्वतंत्र भारत के लिए मनुस्मृति को ही संविधान घोषित किया जाए.

संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ (30 नवंबर 1949, पेज 3) में शिकायत की गयी कि:

But in our constitution there is no mention of the unique constitutional developments in ancient Bharat. Manu’s laws were written long before Lycurgus of Sparta or Solon of Persia. To this day laws as enunciated in the Manusmriti excite the admiration of the world and elicit spontaneous obedience and conformity. But to our constitutional pundits that means nothing.

निश्चित ही दीनदयाल उपाध्याय- जो अपने संगठन के अनुशासित प्रचारक थे – वह इस तमाम घटनाक्रमों का न केवल गवाह थे बल्कि उनमें विभिन्न स्तरों पर सहभागी भी थे, जिसके चलते वह संघ के सुप्रीमो के करीबियों में शामिल हुए थे. बाद में दिनों में वह जातिप्रथा के समर्थन में अधिक संश्लिष्ट तर्क देते दिखते हैं, यहां तक कि उसकी तुलना स्वधर्म से करते दिखते हैं:

‘हालांकि आधुनिक दुनिया में समानता के नारे उठते हैं, समानता की अवधारणा को सोच समझकर स्वीकारने की ज़रूरत है. हमारा वास्तविक अनुभव यही बताता है कि व्यावहारिक और भौतिक नज़रिये से देखें तो कोई भी दो लोग समान नहीं होते… बहुत सारी उग्रता से बचा जा सकता है अगर हम हिंदू चिंतकों द्वारा प्रस्तुत किए गए समानता के विचार पर गंभीरता से गौर करें. सबसे पहला और बुनियादी प्रस्थान बिंदु यही है कि भले ही लोगों के अलग-अलग गुण होते हैं और उन्हें उनके गुणों के हिसाब से अलग-अलग काम आवंटित होते हैं, मगर सभी काम समान रूप से सम्मानजनक होते हैं. इसे ही स्वधर्म कहते हैं और इसमें एक स्पष्ट गारंटी रहती है कि स्वधर्म का पालन ईश्वर की पूजा के समकक्ष होता है. इसलिए स्वधर्म की पूर्ति के लिए सम्पन्न किए गए किसी भी कर्तव्य में, उच्च और नीच और सम्मानित तथा असम्मानित का प्रश्न उठता ही नहीं है. अगर कर्तव्य को बिना स्वार्थ के पूरा किया जाए, तो करनेवाले पर कोई दोष नहीं आता.’ (C. P. Bhishikar, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology and Perception: Concept of the Rashtra,vol. v, Suruchi, Delhi, 169)

भारतीय जनसंघ ने वर्ष 1965 में ‘एकात्म मानववाद’ को अपने दिशानिर्देशक सिद्धांत के तौर पर स्वीकारा जिसे बाद में वर्ष 1980 में भाजपा ने भी अपनाया. एकात्म मानववाद के दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का विश्लेषण करते हुए क्रिस्टोफ जाफरलो (Christophe Jafferlot) वर्ण व्यवस्था के प्रति उनके सम्मोहन की चर्चा करते हैं जो उनके लिए वह ‘सामाजिक एकजुटता/संबंध का ऐसा माॅडल था जिसका हर जाति पालन करती थी जिसमें ‘अछूत’ भी शामिल थे.

‘उपाध्याय भी उसी ढंग से सोचते थे. ‘एकात्म मानववाद’ – जिसे संघ परिवार के अग्रणियों द्वारा उनकी विचारधारा की बुनियाद कहा गया है – उसकी मूलभूत कल्पना वर्णव्यवस्था की जैविक एकता पर टिकी है.

वर्ष 1965 में उन्होंने लिखा:

‘चार जातियों की हमारी अवधारणा में, वह विराट पुरूष – आदिम मनुष्य जिसके त्याग ने, जैसा कि ऋग्वेद का कहना है, वर्ण व्यवस्था के रूप में समाज को जन्म दिया – ’ के चार अवयवों के समकक्ष हैं.’ उनके हिसाब से वर्ण व्यवस्था में वह जैविक एकता होती है जो राष्ट निर्माण की प्रक्रिया को जारी रख सकती है.

आखिर क्या था एकात्म मानववाद, जिसकी बात भाजपा करती है? डैनिश विद्वान थामस ब्लाम हानसेन लिखते हैं:

दीनदयाल उपाध्याय ने ..‘एकात्म मानववाद’ के नाम पर उन धारणाओं का विकास किया, जिसे जनसंघ ने अपने आधिकारिक सिद्धांत के तौर पर 1965 में अपनाया. एकात्म मानववाद कहीं से भी गोलवलकर के चिंतन से हटा नहीं अलबत्ता उसने गांधीवादी विमर्श के महत्वपूर्ण तत्वों को अपने में समाहित करके उसे हिंदू राष्टवाद के एक ऐसे संस्करण में प्रस्तुत किया-जिसका मकसद था कि जनसंघ की साम्प्रदायिक छवि को मिटा कर उसे एक सौम्य, आध्यात्मिक, अनाक्रमणकारी छवि प्रदान करना जो सामाजिक समानता पर, ‘भारतीयकरण’ और सामाजिक सदभाव पर जोर देती हो.

इस नए विमर्श का निर्माण एक तरह से भारत में साठ और सत्तर के दशक के राजनीतिक क्षेत्र की चुनौतियों (problematics) और वर्चस्वशाली विमर्शों के अनुकूल था. पार्टी और व्यापक हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन को राजनीति की मुख्यधारा के दक्षिणपंथी हाशिये से उंचे स्तर पर ले जाना भी उसका मकसद था, जिसे 1967 के आम चुनावों के बाद शहरी मध्यम वर्ग में अच्छा खासा समर्थन हासिल हुआ था. गोलवलकर के लेखन से महत्वपूर्ण बदलाव ‘भारतीय’ शब्द के प्रयोग में नज़र आया जिसे रिचर्ड फाॅक्स ने ‘हिन्डीयन’ अर्थात ‘हिंदू और इंडियन’ के संमिश्रण के तौर पर अनुदित किया है. (The Saffron Wave: Democracy and Hindu Nationalism in Modern India, Oxford University Press, pages 84-85)

दिल्ली स्थित विद्वान प्रलय क़ानूनगो, उसी किस्म के विचारों को प्रकट करते हैं:

‘दीनदयाल उपाध्याय गोलवलकर के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत को ‘एकात्म मानववाद’ के अपने सिद्धांत से प्रतिस्थापित करते हैं. यह नया सिद्धांत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदू राष्ट की अवधारणा को थोड़ा नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है और उसकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु को समृद्ध करता है. (RSS’ Tryst with Politics; Manohar, page 118)

यह बात बताने की ज़रूरत नहीं कि दीनदयाल उपाध्याय धर्मनिरपेक्षता के विचार को नापसंद करते थे, इस विचार से घृणा करते थे. अलीगढ़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठक में उन्होंने साफ कहा:

‘भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करने से भारत की आत्मा पर हमला हुआ है. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में तो कठिनाइयों का पहाड़ खड़ा रहता है. ..हालांकि रावण के लंकास्थित धर्मविहीन राज्य में बहुत सारा सोना था, मगर वहां राम राज्य नहीं था.’

अपने एक अन्य आलेख में वह लिखते हैं

‘अगर हम एकता चाहते हैं, तो हम निश्चित ही भारतीय राष्ट्रवाद को समझना होगा, जो हिंदू राष्ट्रवाद है और भारतीय संस्कृति हिंदू संस्कृति है.

वह संविधान को रैडिकल ढंग से बदलने की बात करते थे क्योंकि उनके मुताबिक

‘वह उनके मुताबिक वह भारत की एकता और अखंडता के ख़िलाफ़ पड़ता है. उसमें भारत माता, जो हमारी पवित्र मातृभूमि है तथा जो हमारे लोगों के दिलों में बसी है- के विचार का कोई स्वीकार नहीं है. संविधान के प्रथम अनुच्छेद के मुताबिक, इंडिया जिसे भारत भी कहा जाता है, वह राज्यों का संघ होगा अर्थात बिहार माता, बंग माता, पंजाब माता, कन्नड़ माता, तमिल माता, सभी को मिला कर भारत माता का निर्माण होता है. यह विचित्र है. हम लोगों ने इन सूबों को भारत माता के अवयवों के रूप में देखा है, और न व्यक्तिगत माता के तौर पर. इसलिए हमारे संविधान को संघीय के बजाय एकात्मक होना चाहिए. जनसंघ का मानना है कि भारतीय संस्कृति की तरह भारतवर्ष भी एक है और अविभाज्य है. साझा संस्कृति की कोई भी बात न केवल असत्य है बल्कि ख़तरनाक भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है और विघटनकारी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करती है.’ (‘जनसंघज़ प्रिन्सिपल्स एंड पाॅलिसीज, जनवरी 25, 1965, पेज 10)

अंत में, संघ-भाजपा कुनबे में दीनदयाल उपाध्याय के महिमामंडन को समझा जा सकता है क्योंकि वह ‘गोलवलकर के चिंतन’ पर अडिग रहे मगर उन्होंने ‘पूरक के तौर पर गांधीवादी विमर्श की भाषा को भी अपनाया तथा संघ के विचारों को अधिक लोकप्रिय बनाया. मगर क्या यह मुनासिब होगा कि महात्मा गांधी की श्रेणी में उन्हें संसद के पटल पर भी वही स्थान मिले.

क्या यह विरोधाभासपूर्ण नहीं होगा कि एक साथ आज़ादी के संघर्ष के नेता महात्मा गांधी, ऐसी शख्सियतों के साथ साथ खड़े कर दिए जाएं जो उनके विचारों के बिल्कुल ख़िलाफ़ खड़े थे. क्या यह हास्यास्पद नहीं होगा कि हिंदू मुस्लिम एकता के लिए, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए शहादत दिए महात्मा गांधी उन लोगों के समकक्ष प्रस्तुत कर दिए जाएं तो मुसलमानों को ‘समस्या’ मानते थे.

इसमें कोई दोराय नहीं कि केंद्र में भाजपा के सत्तासीन होने के बाद नए भारत की भविष्यदृष्टि (विज़न) को लेकर बहुत कुछ बदल गया है. गांधी, नेहरू, मौलाना आज़ाद, आंबेडकर एवं आज़ादी के आंदोलन के तमाम अग्रणियों ने नवस्वाधीन भारत के लिए जिस समावेशी, प्रगतिउन्मुख समाज की कल्पना की थी, उसके स्थान पर इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में जो नया भारत गढ़ा जा रहा है वह असमावेशी भविष्यदृष्टि पर आधारित है. और जैसा आलम फिलवक्त़ मौजूद है, उसमें उन्हें जल्द कोई मजबूत चुनौती मिलने के आसार भी नहीं दिखते.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)

  • SANJEEV KUMAR

    Akatm shabd ka arth ab samajh me aaya. Dhanyavad. Inko apne agenda pe chalne dijiye. Hamara desh inki soch se 2000 saal aage pahunch chuka hai.