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दिल्ली दंगा: सुप्रीम कोर्ट ने देवांगना कलीता की ज़मानत के ख़िलाफ़ अपील ख़ारिज़ की

पिंजरा तोड़ की सदस्य देवांगना कलीता को दिल्ली दंगों के संबंध में गिरफ़्तार किया गया था. सितंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी थी.

देवांगना कलीता. (फोटो साभार: ट्विटर)

देवांगना कलीता. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली:  उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान इस साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित मामले में ‘पिंजरा तोड़’ संगठन की कार्यकर्ता देवांगना कलीता को जमानत देने के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (एनसीटी दिल्ली) की अपील बुधवार को खारिज कर दी.

एनसीटी दिल्ली एक विशेष केंद्र शासित क्षेत्र है, जो केंद्र सरकार, एनसीटी की निर्वाचित सरकार और तीन नगर निगमों द्वारा संयुक्त रूप से प्रशासित होता है.

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने दिल्ली सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि प्रभावशाली व्यक्ति होना जमानत खारिज करने का आधार नहीं हो सकता.

एनसीटी दिल्ली की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि कलीता बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं. वह गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं और सबूतों से छेड़छाड़ कर सकती हैं. हालांकि उच्च न्यायालय ने कहा था कि मामले में केवल पुलिस गवाह हैं.

इस पर पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से सवाल किया कि ‘प्रभावशाली व्यक्ति’ होने के आधार पर क्या जमानत से इनकार किया जा सकता है?

साथ ही पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि वह गवाहों को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं.

उन्होंने कहा कि मामले में कुछ और गवाह हैं जिन्हें सुरक्षा प्रदान की गई है.

पीठ ने कहा कि वह कलीता को जमानत प्रदान करने के उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप नहीं करेगी.

उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के मामले में एक सितंबर को कलीता को जमानत देते हुए कहा था कि पुलिस ऐसे रिकॉर्ड पेश करने में नाकाम रही कि उन्होंने खास समुदाय की महिलाओं को भड़काया या नफरत फैलाने वाले भाषण दिए.

अदालत ने कहा था कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से किए जाने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जो कि उनका मौलिक अधिकार है.

अदालत ने कहा था कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मौजूदगी में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध लंबे समय से चल रहा था. इसके अलावा पुलिस विभाग के कैमरे भी वहां लगे थे, लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कलीता की वजह से कथित अपराध हुआ.

उच्च न्यायालय ने कलीता को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही रकम जमानत राशि देने पर रिहा करने का आदेश दिया था.

अदालत ने उन्हें निर्देश दिया था कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी गवाह को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ का प्रयास नहीं करेंगी और अदालत की अनुमति के बगैर देश से बाहर नहीं जाएंगी.

मालूम हो कि देवांगना कलीता और ‘पिंजरा तोड़’ की एक अन्य सदस्य नताशा नरवाल को मई महीने में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा द्वारा गिरफ्तार किया गया था और उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

छात्रावासों और पीजी आवासीय सुविधाओं को छात्राओं के लिए कम प्रतिबंधित बनाने के उद्देश्य से 2015 में ‘पिंजड़ा तोड़‘ समूह का गठन किया गया था. जेएनयू के सेंटर फॉर वूमेन स्टडीज़ की एमफिल की छात्रा देवांगना कलीता और ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र की पीएचडी की छात्रा नताशा नरवाल इसकी संस्थापक सदस्य हैं.

पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में और इस साल की शुरुआत में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों और हिंसा के संबंध में कलीता के खिलाफ चार मामले दर्ज किए गए हैं.

कलीता को दो मामलों में- दरियागंज और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद मामले में जमानत मिल चुकी है.

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और इसका विरोध कर रहे लोगों के बीच हिंसक झड़प होने के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी को सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मृत्यु हो गई थी और करीब 200 अन्य जख्मी हुए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इपुनट के साथ)