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बिहार चुनाव: पलायन से प्रभावित गांव में न सरकार से नाराज़गी है, न ही कोई उम्मीद

ग्राउंड रिपोर्ट: आजीविका की तलाश में राज्य से पलायन की जिस बात को बिहार में चुनावी मुद्दा बताया जा रहा है, उसे मधुबनी ज़िले के बस्सीपट्टी गांव के लोग अपनी नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं.

बस्सीपट्टी में चुनाव को लेकर चौक-चौराहे पर होने वाली बहसों में पलायन कोई मुद्दा नहीं है. (सभी फोटो: हेमंत कुमार पांडेय)

बस्सीपट्टी में चुनाव को लेकर चौक-चौराहे पर होने वाली बहसों में पलायन कोई मुद्दा नहीं है. (सभी फोटो: हेमंत कुमार पांडेय)

यह दोपहर का वक्त है. पहले चरण के मतदान के बाद ठंड की आहट के बीच बिहार में चुनावी पारा काफी चढ़ा हुआ है.

जब पूर्वी भारत को देश के पश्चिमी हिस्से से जोड़ने वाले पूर्वी-पश्चिमी गलियारे (एनएच-57) से गुजरते हैं, तो जगह-जगह चुनावी शोर सुनाई पड़ता है.

लेकिन जब हाईवे से उतरकर मधुबनी की बस्सीपट्टी पंचायत की राह पकड़ते हैं, तो ये शोर भी धीरे-धीरे गुम होने लगता है और सन्नाटा चारों ओर से घेर लेता है.

रास्ते पर एक-दो लोग दिखते हैं. इनमें भी अधिकांश बूढ़े हैं. कुछ बच्चे खेलते हुए दिखते हैं. महिलाएं घरेलू काम करती हुई दिखती हैं.

जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर बस्सीपट्टी पंचायत मधुबनी जिले में एक ओर कोसी और दूसरी तरफ से बलान नदी से घिरी हुई है.

यह फुलपरास विधानसभा और झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र में आता है. बिहार विधानसभा चुनाव-2020 के तहत यहां तीन नवंबर को मतदान होना है.

यहां के अधिकांश घर कच्चे हैं, छत पर टिन की चादर है. माना जाता है कि कोसी क्षेत्र के लोग ही केवल विस्थापित नहीं होते, उनके साथ उनका घर भी साथ चलता है.

यहां से बाहर की दुनिया में जिस पलायन पर बड़ी बहस होती है, उसे यहां के लोग अपनी नियति मान चुके हैं और चुनाव में भी ये कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिखता है. यह स्थिति उस ग्राम पंचायत की है, जिसे पलायन से सबसे अधिक प्रभावित माना जाता है.

रामवल्लभ मंडल.

रामवल्लभ मंडल.

‘जब मेरी कमाने की उम्र हुई थी तो उसी समय दिल्ली चले गए थे. यहां खेत में बच्चा लोग खेती करता था और हम बाहर में नून-तेल का इंतजाम. कोसी में खेत कटने से अब बुढ़ापा में यहां दूसरी की जमीन पर फसल लगाते हैं,’ 60 साल के सत्तो मंडल कहते हैं.

उनके दो बेटे हैं और दोनों ही हरियाणा में काम करते हैं. वे बताते हैं कि इससे ही उनके घर का खर्चा चलता है.

इस इलाके में हर किसी की यही कहानी दिखती है. 70 साल के रामवल्लभ मंडल के पांच बेटे हैं. इनमें से दो हरियाणा की अनाज मंडी में काम करते हैं और एक दिल्ली में बिल्डिंग मजदूर है. उनके साथ रहने वाले दो बेटों के पास कोई काम नहीं है.

वे बताते हैं, ‘अगर बंटाई पर जमीन मिलती है तो ये उसमें खेती करते हैं. लेकिन इसमें घर की जरूरत का भी अनाज नहीं हो पाता है. अभी आधा बीघा जमीन पर खेती है.’

रामवल्लभ आज अपनी इस स्थिति की वजह साल 1999 में कोसी के कटान को मानते हैं. वे धीमी आवाज में कहते हैं, ‘1999 में कोसी ने हमारे पांच-छह बीघा जमीन को काट दिया. उसके बाद हमें रहने के लिए भी यहां (सुरक्षा बांध के पास) जमीन खरीदकर रहना पड़ा.’

वहीं, सत्तू मंडल की मानें तो दो दशक पहले बस्सीपट्टी का रकबा 2,200 बीघा था, अब ये केवल 25-30 बीघे में सिमट कर रह गया है.
इसके चलते पहले जो बड़े किसान थे, उनके परिवार के लोग भी दूसरे राज्य में मजदूर बन गए हैं या फिर यहां खाली बैठे हुए हैं.

इन इलाकों से दूसरे राज्यों में पलायन पहले भी था, लेकिन रोजगार के मौके के अभाव और खेती लायक पर्याप्त जमीन न होने के चलते अब पहले से कहीं अधिक पलायन हो रहा है. इसके चलते बस्सीपट्टी की लोगों की स्थिति पहले से बदतर ही हुई है.

वहीं, कोविड-19 महामारी के चलते हुए लॉकडाउन के दौरान इस गांव के मजदूर भी दूसरे राज्यों से किसी तरह वापस लौटे थे. यहां लौटने के बाद इनके पास कोई काम नहीं था.

करीब छह महीने घर में खाली बैठे रहने के बाद अब अधिकांश मजदूर एक बार फिर दूसरे राज्य पहुंच चुके हैं. इनमें से एक 30 वर्षीय श्री पासवान भी हैं.

वे 12 साल की उम्र में ही काम करने के लिए बिहार से बाहर निकल चुके थे. अभी वे पंजाब में धान की कटाई कर रहे हैं.

उनकी पत्नी चंद्रलेखा देवी बताती हैं, ‘यहां कोई काम नहीं मिलता है. परिवार में आठ आदमी हैं और कमाने वाले अकेले वे. अब वे बाहर नहीं जाएंगे तो यहां क्या करेंगे? चार-पांच महीना बैठकर खाए है. महाजन का भी कर्जा हो गया है. एक सौ पर पांच रुपये हर महीने ब्याज देना होता है.’

इस पंचायत के उपमुखिया जगदेव मंडल बताते हैं, ‘बाहर काम करने वाले जितने आए थे, वे किराये आदि खर्चे के लिए कर्ज लेकर फिर दिल्ली-पंजाब जा चुके हैं. बाहर की कंपनियों ने यहां बसें भेजी थीं, जिसमें भर-भरकर मजदूर लोग चले गए. अब गांव में कोई नहीं है.’

चंद्रलेखा देवी.

चंद्रलेखा देवी.

सत्तो मंडल का कहते हैं, ‘चुनाव है लेकिन इनको नेता या अधिकारी ने रोका भी नहीं कि वोट देकर जाना या यहीं कि काम दिला देंगे. सभी भुखमरी से बचने के लिए यहां से भागा है.’

इसके बाद जब उनसे पूछा कि क्या अभी चुनाव में पलायन और बेरोजगारी कोई मुद्दा नहीं है? इस सवाल पर स्थानीय ग्रामीणों का करीब एक आवाज में कहना था लॉकडाउन लग गया अब सरकार इसमें क्या करती? सब चीज बंद था.

जगदेव मंडल कहते हैं, ‘नीतीश जी तो एक पर पांच किलो अनाज फ्री में दे दिए. अगर ऐसा नहीं होता तो लोग भुखमरी का शिकार हो जाते. ऐसे में अब नीतीश जी को कैसे भूल जाएंगे. हमको कोई नाराजगी नहीं है.’

हालांकि, इन सबके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि यहां के लोगों को अपने घर के आस-पास के इलाके में ही काम मिल सके, सरकार ने इसके लिए क्या किया?

हालांकि इस बारे में रामवल्लभ मंडल का मानना है, ‘यहां के लोग बाहर जाते हैं तो सरकार ही न काम धंधा देती है. अगर कोई प्राइवेट कंपनी में भी काम करता है, तो उसको सरकार से ही ठेका मिलता है न. इसलिए हम लोग को मानते हैं कि हमारा काम कभी बंद नहीं होता है.

‘नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार हम सबका काम कभी नहीं रोके हैं. हम लोग कहीं भी मजदूरी करने के लिए आजाद है, ऐसे में मजदूरी करके गुजर-बसर कर लेंगे,’ सत्तो मंडल कहते हैं.

हालांकि, बस्सीपट्टी के निवासी इस बात पर सहमत दिखते हैं कि सरकार की योजनाओं और परियोजनाओं में भ्रष्टाचार है, लेकिन इसके लिए वे स्थानीय प्रशासन को दोषी मानते हैं.

‘मोदी जी जितना देते हैं, वह हमको पंचायत में नहीं मिलता है. ऊपर से पैसा तो आता है लेकिन नीचे वाला इसे हम लोगों को नहीं देता है, तो इसमें प्रधानमंत्री का क्या दोष है?’

वहीं, जब हम इनसे चुनावी घोषणापत्रों में राजद के 10 लाख और भाजपा के 19 लाख रोजगार देने के वादे का जिक्र करते हैं, तो वे इसे केवल हवा-हवाई वादे करार देते हैं.

गांव के नवकांत सिंह एक दवा कंपनी में एमआर हैं. वे बताते हैं कि अब तक यहां के लोगों को सरकारी नौकरी न के बराबर मिली है. इस इलाके का पढ़ा-लिखा युवा भी दूसरे राज्यों में मजदूरी करने को मजबूर है.

बस्सीपट्टी में पलायन और रोजगार को लेकर यहां के जदयू- अत्यंत पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव लालेश्वर प्रसाद सिंह से बात की.

उन्होंने कहा, ‘सरकार इसके लिए प्रयत्नशील रही है, सरकार की कोशिश थी कि मनरेगा के माध्यम से लोगों के पलायन को रोका जाए, लेकिन प्राकृतिक आपदा के चलते मनरेगा का भी काम नहीं होता है. यहां अधिकांश कृषि मजदूर ही हैं और वे बाहर जाने के लिए विवश हैं.’

मनरेगा को लेकर सरकारी आंकड़ों की बात करें तो लॉकडाउन के दौरान इस योजना पर जोर दिए जाने के बावजूद बस्सीपट्टी के मजदूरों को इस वित्तीय वर्ष (2020-21) में केवल 24 दिनों का काम मिल पाया है. साल 2019-20 में ये आंकड़ा 35 था.

वहीं, प्रखंड प्रशासन का कहना था कि लॉकडाउन के दौरान केवल तीन हजार प्रवासी मजदूर वापस आए हैं.

लेकिन स्थानीय दैनिक की एक रिपोर्ट की मानें, तो इससे अधिक संख्या में मजदूर वापस आए थे. इसके बावजूद इनमें से केवल 1,000 लोगों का ही मनरेगा जॉबकार्ड बन पाया था.

इसे लेकर भी जयदेव मंडल का कहना है, ‘गांव में मनरेगा में कोई काम नहीं मिलता है. अगर बाहर नहीं जाएगा तो यहां सब भूखे मर जाएगा.’

जब यहां के लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि केवल बस्सीपट्टी ही नहीं, बल्कि आस-पास के गांवों के यही स्थिति है. हालांकि, बस्सीपट्टी की स्थिति बहुत खराब है क्योंकि यहां से कोई बड़ा नेता नहीं है.

रामवल्लभ कहते हैं कि अभी चुनाव का वक्त है, लेकिन हमसे वोट मांगने कोई पार्टी के उम्मीदवार नहीं आते हैं. विधायक-सांसद तो पहले भी नही आते थे. इस बीच एक उम्मीदवार की प्रचार गाड़ी सामने से सड़क पर तेजी से गुजरती है.

इस पर वे अपनी बात को रोकते हुए कहते हैं, ‘आप देख लिए, हमारे पास ये रुका. ये सब गांव का बड़ा आदमी (मुखिया या अन्य लोग) के पास जाता है. फिर उसका चेला लोग आता है और हमको कहता है कि किसको वोट देना है.’

रामवल्लभ की बात को आगे बढ़ाते हुए सत्तो कहते हैं, ‘गांव में एक डर होता है कि फलाना को वोट नहीं देंगे तो क्या होगा? वोटर कह तो देता है लेकिन उसी को देता है, जिसे उसे देना होता है. अब बताइए जिन्होंने हमारे लिए काम किया है, उनको हम कैसे भूल जाएंगे? हमारा खून भी बह जाएगा तो भी उसी को वोट देंगे.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)