भारत

स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी सामाजिक कार्यकर्ताओं को डराने का प्रयास है

केंद्र सरकार द्वारा स्टेन स्वामी सहित देश के 16 सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करना आंदोलनरत जनसंगठनों और उनसे जुड़े नेताओं को भयभीत कर इन आंदोलनों को कमज़ोर करने की कोशिश है.

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

फादर स्टेन स्वामी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

पिछले महीने एनआईए ने भीमा-कोरेगांव मामले में 83 वर्षीय स्टेन स्वामी को झारखंड के रांची स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया. उन पर भाकपा (माओवादी) के साथ संबंध होने का आरोप लगाया गया है, जो सरासर झूठ है.

स्टेन स्वामी झारखंड में पिछले तीस वर्षों से आदिवासी, मूलवासी, दलित, किसानों के बीच जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण की रक्षा तथा उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए काम करते रहे हैं.

सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून और पांचवी अनुसूची में प्रावधान अधिकारों को लेकर लोगों को जागृत करते रहे हैं. इन कानूनों का सरकार की नीतियों द्वारा हनन होने पर सवाल भी उठाते रहे हैं.

रघुबर दास सरकार द्वारा पूंजीपतियों के लिए तैयार भूमि बैंक पर भी स्टेन स्वामी ने सवाल उठाए थे. उनका कहना था कि पांचवी अनुसूची क्षेत्र में ग्राम सभा के अधिकार और रैयतों के अधिकारों को ख़ारिज करके सरकार ने मनमाने तरीके से भूमि बैंक बनाया है.

इसी तरह पेसा कानून के हनन पर भी फादर स्टेन की आवाज़ उठाते रहे हैं. केंद्र की मोदी सरकार ने कोविड-19 महामारी के बीच देश के 41 कोयला खदानों की नीलामी की थी, जिसमें झारखंड के 9, छत्तीसगढ़ के 9, उड़ीसा के 9 और मध्य प्रदेश के 11 खदान शामिल हैं.

फादर स्टेन ने सवाल उठाया कि इसमें अधिकांश कोयला खदान आदिवासी बहुल इलाकों में हैं, ऐसे में इस तरह की नीलामी से रैयतों को क्या मिलेगा? इससे केवल उनके अधिकार ही छीने जाएंगे.

इस मुद्दे पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपनी लेखनी में सरकार को सलाह भी दी कि राज्य का कर्तव्य बन जाता है कि वह सहकारी संस्थाओं के निर्माण और पंजीकरण में सहायता करे और प्रारंभिक संसाधन जैसे आवश्यक पूंजी, तकनीकी विशेषज्ञता, प्रबंध कौशल, विपणन मार्ग आदि मुहैया कराए ताकि वे बाधा रहित काम कर सकें और पूरा समुदाय लाभ उठा सके.

राज्य बनने के 12 साल बाद 2012 में फादर स्टेन ने झारखंड के विकास एवं विस्थापन पर एक विस्तृत अध्ययन के साथ विभिन्न परियोजनाओं से आज तक हुए विस्थापित आंकड़ो का एक बड़ा कैलैंडर छपवाया था, जिसमें बहुत सारी जानकारियां थीं.

उनका बगईचा संस्थान परिसर तरह-तरह की जानकारियों से रूबरू कराता है. संस्थान की दीवारों पर सूचना का अधिकार अधिनियम 2006, वन अधिकार कानून 2006, भोजन के अधिकार कानून, केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की सूची, पलायन और ट्रैफिकिंग रोकने की अपील जैसे कई जानकारियां मिलती हैं और ये आज भी वहीं देखी जा सकती हैं.

कई साल पहले की बात है. मैंने एक प्रोग्राम में पहली बार फादर स्टेन को देखा था. लंच ब्रेक का समय था, मैं साथियों के साथ खाने में व्यस्त थी.

दहिनी ओर तीन-चार टेबल बाद वो और लोगों के साथ बैठकर खा रहे थे. फादर स्टेन का दहिना हाथ थाली के ऊपर कांपते-कांपते इधर-उधर हो रहा था.

कुछ क्षणों बाद हाथ भात के थाली में रखे और कांपते हाथ से उंगुलियों से भात को समेटने का कोशिश करने लगे. भात उठाकर सीधे मुंह तक ले जाने में कठिनाई हो रही थी.

मेरी नजर वहीं टिकी रही. उन्होंने फिर दोनों हाथ से पानी का गिलास कसकर पकड़ा और पीने के लिए ऊपर उठाने लगे, लेकिन पानी का उसे मुंह तक ले जाने में दिक्कत हो रही थी, हाथ कांपते-कांपते इधर-उधर हो रहे थे. मैं इस क्षण को कभी नहीं भूल सकती.

उनके रांची आने के बाद करीब-करीब सभी कार्यक्रमों में फादर स्टेन से मुलाकात होने लगी. मैं उन्हें फादर कहकर संबोधित करती, तो वे कहते, मैं तुम्हारे लिए फादर नहीं हूं, मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं, तुम मुझको दादा पुकारो.

जब भी मुलाकात होती, मैं उनकी बात याद कर उन्हें दादा से ही संबोधित करती. जब कभी छोटी बैठक बुलानी होती और हम लोग पैसे देकर बैठक स्थल बुक नहीं कर सकते, तब सीधे उन्हें बोलते कि फलां तिथि को 10-20 लोगों के बैठने के लिए जगह चाहिए.

अगर पहले से बुक नहीं हुआ हो, तो दादा कभी न नहीं बोले. कहते थे, ठीक है जगह मिल जाएगा, लेकिन खाना नहीं खिला पाएंगें. हम लोग फिर आपस में चंदा करके कैंटीन में 30रुपये में खिचड़ी खा लेते थे.

उन्होंने अपने संस्थान में नामकोम क्षेत्र के बच्चों को नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए लाइब्रेरी और पढ़ने के लिए जगह दी हुई है, जहां बच्चे आकर तैयारी करते हैं.

बगईचा परिसर झारखंड के जल, जंगल, जमीन, भाषा-संस्कृति के इतिहास एवं संघर्ष का एहसास दिलाता है. यहां साल के दर्जनों नन्हे पौधों को सींचकर बड़ा किया गया है, आज यहां साल के जंगल का-सा दृश्य मिलेगा.

साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता संग्राम के नायक वीर बिरसा मुंडा के उलगुलान का प्रतीक डोम्बारी बुरू पर हाथ में तीर-धनुष और मशाल लिए बिरसा की प्रतिमा आदिवासियों के संघर्ष की याद दिलाती है.

परिसर के बीच गांव सभा, ग्राम सभा की बैठकों और विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए परंपरागत अखड़ा भी बनाया गया है.

अखाड़ा के पीछे झारखंड की अमर शहीदों के नामों का बड़ा शिलालेख है, जिसमें राज्य के जंगल, जमीन, भाषा-सांस्कृति की रक्षा के संघर्ष में हुए शहीदों के नाम दर्ज किए जाते हैं.

परिसर में पपीते से लदे कई पेड़, अमरूद, कटहल, जामुन, नींबू, नेंवा, डाहू पेड़, अरहर, आलू, धन मिर्चा, तुलसी के खेत, कुंदरी और अदरक आदि की खेती राज्य की खेती-किसानी को विकसित करने को प्रेरित करते हैं.

राज्य में 245 गांवों को विस्थापित होने से बचाने का संघर्ष कर कोइलकारो जनसंगठन ने जीत हासिल की है. कोइलकारो जनसंगठन प्रत्येक वर्ष 5 जुलाई को संकल्प दिवस और 2 फरवरी को शहादत दिवस मनाता है.

इन दोनों कार्यक्रमों में स्टेन स्वामी प्रत्येक वर्ष जाते हैं. तपकारा जाने के लिए वे हमेशा मिनीडोर-ऑटो बुक करते थे और फोन करके पूछते थे, अगर किसी को मेरे साथ जाना है.

राज्य में करीब 3,000 निर्दोष आदिवासियों को विभिन्न आरोप लगाकर वर्षों से जेल में बंद रखा गया है. स्टेन स्वामी हमेशा इन निर्दोषों को रिहा करने की मांग को लेकर अपनी लेखन के साथ कार्यक्रमों में सवाल उठाते रहे हैं.

यहां विशेष ध्यान देने की जरूरत है कि-एक तरफ राज्य की रघुबर सरकार खूंटी क्षेत्र के आदिवासियों पर तरह-तरह के अरोप लगाकर उन्हें परेशान किया, जेल में भेज दिया.

दूसरी ओर 2019 में राज्य में आई महागठबंधन की सरकार ने 29 दिसंबर 2019 को घोषणा की कि पत्थलगड़ी आंदोलन के सभी फर्जी केस वापस किए जाएगें. इसको लेकर भाजपा विरोध भी किया कि हेमंत सरकार आरोपियों को बचाने का काम कर रही है.

हेमंत सरकार के आदेश के साथ ही राज्य के मुख्य सचिव ने जिला के उपायुक्त को कार्यवाही करने के लिए पत्र भी लिखा. कुल 30 केसों में से 16 केसों को वापस लेने की अनुशांसा भी कर दी गई, बाकी पर समीक्षा चल रही है.

स्टेन स्वामी सहित देश के 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी देश के आंदोलनरत जनसंगठनों, उनसे जुड़े नेताओं को भयभीत कर जनआंदोलनों को कमजोर करने की केंद्र सरकार की कोशिश है. स्टेन स्वामी को माओवादी घोषित करना और उनकी गिरफ़्तारी करना इसी की कड़ी है.

(दयामनी बारला आदिवासी, मूलनिवासी अस्तित्व रक्षा मंच की संस्थापक हैं.)