भारत

सार्वजनिक स्थल पर अपमान की मंशा से एससी/एसटी शख़्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी अपराधः सुप्रीम कोर्ट

एक याचिका की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि घर की चारदीवारी के भीतर, बिना किसी गवाह की अनुपस्थिति में अनुसूचित जाति/जनजाति के किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी अपराध के दायरे में नहीं आती है.

New Delhi: A view of the Supreme Court of India in New Delhi, Monday, Nov 12, 2018. (PTI Photo/ Manvender Vashist) (PTI11_12_2018_000066B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से जुड़े किसी भी शख्स के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत तब तक अपराध के दायरे में नहीं है, जब तक यह टिप्पणी सार्वजनिक स्थान पर अपमानित करने की मंशा से न की गई हो.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि यह टिप्पणी किसी बाहरी गवाह के समक्ष की जानी चाहिए तभी वह अपराध के दायरे में आती है.

पीठ ने कहा कि घर की चारदीवारी के भीतर और बिना किसी गवाह की अनुपस्थिति में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी अपराध नहीं है. इसके लिए टिप्पणी को सार्वजनिक स्थान पर लोगों की उपस्थिति में होना आवश्यक है.

बता दें कि पीठ ने यह टिप्पणी उत्तराखंड के स्थानीय निवासी हितेश वर्मा की अपील पर सुनवाई करते हुए की. वर्मा ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज चार्जशीट एवं समन रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराधों को खारिज करते हुए कहा कि वर्मा के खिलाफ एफआईआर में दर्ज अन्य अपराधों के संदर्भ में सुनवाई जारी रहेगी.

इस मामले में आरोपी हितेश वर्मा ने घर के भीतर महिला के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. यह एफआईआर अनुसूचित जाति की एक महिला द्वारा दिसंबर 2019 में दर्ज कराई गई थी, जिसमें वर्मा पर उनके खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है.

महिला का आरोप है कि वर्मा और कुछ अन्य लोग उन्हें उनके खेतों में काम करने की मंजूरी नहीं दे रहे थे, उनके और अन्य मजदूरों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और जहां वे इमारत का निर्माण करवा रही थी, वहां से निर्माण संबंधी सामग्री हटा ली गई थी.

इस पर पीठ ने साल 2008 के एक फैसले का हवाला दिया था, जिसमें समाज में अपमान और किसी बंद जगह में की गई टिप्पणी के बीच फर्क बताया था.

अदालत ने कहा, 2008 के फैसले में स्पष्ट किया गया था कि अगर अपराध इमारत के बाहर जैसे घर के लॉन, बालकनी या फिर चारदीवारी के बाहर किया गया है, जहां से आते-जाते किसी ने देखा या सुना है तो उसे सार्वजनिक माना जाएगा.

मौजूदा मामले में दर्ज एफआईआर के मुताबिक, महिला के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी घर की चारदीवारी में की गई और किसी बाहरी व्यक्ति ने इसे सुना या देखा नहीं तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता.

अदालत का कहना है कि एफआईआर के मुताबिक, यह कथित घटना एक महिला के घर की चारदीवारी के भीतर हुई है और इस दौरान कोई बाहरी व्यक्ति भी मौजूद नहीं था इसलिए आपत्तिजनक टिप्पणी सार्वजनिक स्थान पर नहीं कई गई इसलिए एससी-एसटी अधिनियम के तहत यह अपराध के दायरे में नहीं आती.