भारत

आज धूमिल जीवित होते तो देशद्रोही के ख़िताब से ज़रूर नवाज़े गए होते…

जन्मदिन विशेष: जिस धूमिल ने देश की व्यवस्था की कमज़ोरियों और नागरिकों से उसकी दूरी को इतना ‘नंगा’ किया, आज उस देश में धूमिल जैसे स्वर के लिए कितनी जगह बची है?

सुदामा पांडे 'धूमिल' (जन्म: 09 नवंबर 1936 - अवसान: 10 फरवरी 1975) (फोटो साभार: 4.bp.blogspot.com)

सुदामा पांडे ‘धूमिल’ (जन्म: 09 नवंबर 1936 – अवसान: 10 फरवरी 1975) (फोटो साभार: 4.bp.blogspot.com)

‘हवा से फड़फड़ाते हुए हिंदुस्तान के नक्शे पर
गाय ने गोबर कर दिया है’

बीस साल बाद कविता से उद्धृत धूमिल की यह पंक्ति सातवें दशक में हिंदुस्तान के क्रमशः असहाय स्थितियों में प्रवेश करते जाने को इंगित कर रही थी. लेकिन आज इसमें प्रयुक्त गाय और गोबर वही अर्थ नहीं दे रहे जो तब दे रहे थे.

सांप्रदायिक परिस्थितियों और उसकी विकृतियों में कैद हिंदुस्तान की हालत वैसी ही हो गई है जैसी अखबार के उस हिस्से की होती है जो गोबर के नीचे दबा हो.

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया के एक बड़े हिस्से, सांप्रदायिक नेताओं ने देश के प्रति समर्पित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के एक बड़े तबके को जिस तरह देशद्रोही के खिताब से नवाजा है, मूलतः उनमें से कई वैसी ही बातें कह रहे थे जो धूमिल आज से दशकों पहले कह रहे थे.

जो नई परिस्थितियाँ आज काबिज़ हैं उनमें धूमिल की कविता की केंद्रीय चिंताएं तीव्रता के साथ महत्वपूर्ण हो गई हैं.

धूमिल के जन्मदिन पर हमें विचार करना चाहिए कि जिस धूमिल ने देश की व्यवस्था की कमजोरियों और नागरिकों से उसकी दूरी को इतना ‘नंगा’ किया, उस देश में धूमिल जैसे स्वर के लिए कितनी जगह बची है.

बीस साल बाद कविता में जिस तरह के प्रयोग हैं वह धूमिल को, उनके देशप्रेमी मन को समझने में असफल और कविता की संवेदनशील दुनिया में प्रवेश करने में असमर्थ भीड़ का शिकार बना देने के लिए पर्याप्त हैं.

फैज़ की कविता ने तो दुर्व्याख्या का मौका भी नहीं दिया था, तब इतना हो-हल्ला मचाया गया. धूमिल तो सीधे-सीधे हत्यारों को आमंत्रण देते हैं. इसी कविता में धूमिल आगे लिखते हैं-

‘क्या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?’

देश के झंडे तिरंगे को धूमिल आजकल के उन्मादियों से अलग कुछ मूल्यों से जोड़कर देखते हैं, अन्यथा झंडा ढोने का कोई मतलब नहीं.

धूमिल को सातवें दशक में ही यह लगने लगा था कि आजादी, जनतंत्र और गांधी मुहावरों में तब्दील हो चुके हैं, जिस पर एक वर्ग और सत्ता तथा उसके चाटुकार अपनी रोटी सेंक रहे हैं.

क्रमशः गांधी राजनीति के व्यापार में अपने लिए वैधता हासिल करने का माध्यम बनते गए. उनका चश्मा, उनकी लाठी, उनके कपड़े, हाव-भाव, उनके राम- ये सभी अब राजनीतिक बाजार के बिकाऊ उत्पाद हैं जिनका जगह-जगह प्रतीकात्मक उपयोग गांधी के मूल्यों के लिए नहीं, निजी स्वार्थों के लिए किया जाता है.

अकाल दर्शन कविता की पंक्तियां हैं-

‘और सहसा मैंने पाया कि मैं खुद अपने सवालों के/ सामने खड़ा हूं और/ उस मुहावरे को समझ गया हूं / जो आज़ादी और गांधी के नाम पर चल रहा है/ जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम/ बदल रहा है.’

धूमिल मिली हुई आजादी के स्वरूप से चिंतित, परेशान और उद्विग्न थे. पचास सालों की दूरी तय करने के बाद अब आजादी का नारा फिर से लोकप्रिय होने का कारण यही है कि जो कुछ हासिल किया गया वह हाथ से फिसलता जा रहा है.

अब उस आजादी की स्पष्ट मांग भास्वर हो चुकी है जिसके न मिलने पर धूमिल परेशान थे.  आलम यह है कि अपने निहितार्थों से दूर खड़ी इस आजादी को समय-समय पर युद्धोन्माद की भावनाओं से उकसाकर नागरिकों को फिर से पटरी पर लाया जाता है…

‘कबूतर का पर लगाकर/ विदेशी युद्ध प्रेक्षकों ने/ आजादी की बिगड़ी हुई मशीन को/ ठीक कर दिया है./ वह फिर हवा देने लगी है.’ (शांति पाठ) 

कविता में संदर्भ तो सातवें दशक के युद्धोन्माद का है लेकिन धूमिल का स्थिर और क्षुब्ध स्वर इसकी ताकीद करता जाता है. इन न सुधरने वाली स्थितियों ने ही सचेत नागरिकों को भी अपनी दुनिया में कैद कर दिया है जिससे बाहर वे निकल नहीं पा रहे और भीतर वे घुटते जा रहे हैं.

मकान कविता में धूमिल लिखते हैं-

‘मैंने अपने बेलगाम मित्रों को बतलाया है/ कि किस तरह इस षड्यंत्र की शुरुआत/ उसी वक्त हो जाती है जब आदमी/ आज़ादी और वक्त से ऊबकर/ अपनी देशी आदतों और सस्ती किताबों के साथ/ 16 x 12 फुट का एक खूबसूरत कमरा हो जाता है.’

सातवें दशक में ही यह पूरी तरह से जाहिर हो चुका था कि सारे जनोन्मुखी मुहावरे बस अपनी ताकत को बनाए रखने का माध्यम हैं. उन मुहावरों को उछालते रहो जिनसे वर्चस्व बनाए रखने में सहूलियत हो.

मुहावरों के खेल में अगर पारंगत हो तो और आगे बढ़कर लोगों को अतीत की गुफाओं में कैद कर दो, वहीं भटकने के लिए छोड़ दो, आध्यात्म और सौन्दर्य की अबूझ छवियों में अपनी ही शिनाख्त न कर पाने की स्थितियों तक पहुंचा दो.

ऐसे ‘महान’ भावों के सामने उन्हें हाथ बांधकर खड़ा कर दो कि शासन, राशन, भूख, रोटी, रोजगार, भ्रष्टाचार आदि के बारे में बात करने में हिचक हो, बात हो तो सिर्फ ‘राष्ट्र’ की-

‘मैंने जब भी उनसे कहा है देश शासन और राशन… / उन्होंने मुझे टोक दिया है./ अक्सर, वे मुझे अपराध के असली मुकाम पर/ अंगुली रखने से मना करते हैं./ जिनका आधे से ज्यादा शरीर/ भेड़ियों ने खा लिया है/ वे इस जंगल की सराहना करते हैं-/ ‘भारतवर्ष नदियों का देश है.’ (अकाल दर्शन) 

ऐसे लोगों का देश-प्रेम कब एक पुनरुत्थानवादी हिंदूवादी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद में कैद हो जाता है इसका अंदाजा भी नहीं लगता.

कब समुद्रगुप्त मुगलों के प्रतिपक्ष में आ जाते हैं, कब ताजमहल सोमनाथ के प्रतिपक्ष में आ जाता है, कब गोबर-गोमूत्र आधुनिक उपचारों का विकल्प हो जाता है, कब वेदों को आज के वैज्ञानिक आविष्कारों का स्रोत मान लिया जाता है, कब पुरानी इमारतें लोकतांत्रिक युग में वर्चस्व की लड़ाई का स्रोत बन जाती हैं, कब रूढ़िवाद से मुक्ति की बात करने वाले निशाने पर आ जाते हैं, पता ही नहीं चलता.

उनकी कविताएं भारतीयों की फंसी हुई स्थिति का बोध कराती हैं. धूमिल अनावश्यक ढंग से, इन स्थितियों में संभावनाएं नहीं तलाशते, क्रांति नहीं ढूंढने बैठ जाते बल्कि यथार्थ का वास्तविक खाका खींचते हैं.

नक्सलबाड़ी से सहानुभूति रखने वाले कवि थे धूमिल, लेकिन यथार्थ में इतने गहरे पैठे हुए कि क्रांति को आसमानी चीज़ नहीं बनाते.

विरक्ति, पछतावा और संकोच से भरा कवि अपने लोगों को स्वप्नलोक में ले जाकर पटक देने की रूमानी आकांक्षा से खुद को पूरे सामर्थ्य से रोकता है.

उनकी कविता में जगह-जगह दिखाई देता है कि वे अपने मुल्क से बेइंतहा प्यार करते हैं और इसीलिए जिन मूल्यों से यह देश बना था, उन मूल्यों के बिखराव को देखकर तड़प जाते हैं और कविता में वह तड़प ही प्रत्यक्ष होती है.

धूमिल की आशा को, आकांक्षा को समझने के लिए इस तड़प से गुजरते हुए स्थिर बने रहने की जरूरत है. उनकी कविता प्रौढ़ शिक्षा की पंक्तियों पर गौर करिए-

‘मैंने भी इस देश को/ एक जवान आदमी की/ रंगीन इच्छाओं की पूरी गहराई से/ प्यार किया था/ मगर अब, अतीत में अपना चेहरा/ देखने के लिए/ शीशे की धूल झाड़ना बेकार है/ उसकी पालिश उतर चुकी है/ और अब उसके दोनो ओर, सिर्फ/ दीवार है.’

ये पंक्तियां उनके सपनों के भारत को बताती हैं न कि पस्ती को. देश कोई भूखंड मात्र नहीं है. भूखंड के निवासियों से किसी देश की पहचान बनती है. धूमिल इन निवासियों की खुशियों के रास्ते अपना देश पाना चाहते हैं.

भुखमरी और बेरोजगारी में फंसी जनता अगर पस्त है तो कवि राष्ट्रवाद में अंधा नहीं हो सकता. इसीलिए धूमिल लिखते हैं-

‘एकाएक-/ जंग लगे अचरज से बाहर/ आ जाता है आदमी का भ्रम और देश प्रेम/ बेकारी की फटी हुई जेब से खिसककर/ बीते हुए कल में/ गिर पड़ता है.’ (पतझड़) 

जो नफरत हमने पैदा की है उसकी इतनी बेबाक अभिव्यक्ति, रंगों और रोशनियों की लीपापोती किए बगैर, अगर किसी कवि ने की है तो धूमिल ने.

उनकी नक्सलबाड़ी कविता दिखाती है कि किस तरह हमने इस देश को नफरत की आंधी में झोंक दिया है. जो नफरत की फसल हमने तैयार की है वह परिवारों के भीतर पैठ चुकी है, वह संविधान की आत्मा पर खरोंच लगा रहा है, वह देश के समतावादी मूल्यों को चोटिल कर रहा है, और हम थोड़ा भी सचेत होने के लिए तैयार नहीं हैं-

‘ख़बरदार/ उसने तुम्हारे परिवार को/ नफरत के उस मुकाम पर ला खड़ा किया है/ कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी/ तुम्हारे पड़ोसी का गला/ अचानक, / अपनी स्लेट से काट सकता है./ क्या मैंने गलत कहा?’

देश और आजादी के मायने क्या हैं अगर परिवेश इतना जहरीला हो चुका है, आसमान अगर धुंए से ढंक चुका है. देशप्रेम, आजादी, मनुष्यता, प्रेम की बातें वहां खोखली प्रतीत होती हैं जहां नफरत की फसल दिन-रात बोई जा रही हो.

धूमिल की दो कविताएं- भाषा की रात और पटकथा इनका खाका शानदार तरीके से खींचती हैं. आज के भारत की स्थितियों को देखते हुए लिखे जाने के पचास साल बाद पटकथा कविता, जो उस समय आलोचक को अतिव्याप्ति और अतिरंजना का शिकार लग रही थी, चालू मुहावरों में कैद लग रही थी, अब ठोस यथार्थ लगती.

यहीं धूमिल की सफलता है. भाषा की रात कविता में धूमिल इस यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए बिना किसी हिचक के कहते हैं कि सिर्फ नफरत ही झूठ के आवरण से बाहर है. यह कविता अपने सवालों के साथ पूरी तरह समकालीन हो जाती है-

‘धुंए से ढके हुए/ आसमान के नीचे/ लगता है कि हर चीज़/ झूठ हैः/ आदमी/ देश/ आजादी/ और प्यार-/ सिर्फ नफरत सही है’ (भाषा की रात)

मुनासिब कार्रवाई कविता भी बताती है कि धूमिल निराशा हताशा के कवि नहीं हैं बल्कि क्षोभ, करुणा, और यथार्थ के कवि हैं. अपने आस-पास की दुनिया में मजलूमों के साथ हो रहे जुल्मों से परेशान हैं.

कविता से उन्होंने उम्मीद नहीं खोई है. भीतर की रोशनी की चर्चा धूमिल की कविताओं में जगह-जगह इसीलिए है कि वे जितनी भी रोशनी बची है उसे जिलाए रखना चाहते हैं. कविता के माध्यम से वे बहस का रुख बदलना चाहते हैं-

‘वक्त बहुत कम है./ इसलिए कविता पर बहस/ शुरू करो/ और शहर को अपनी ओर झुका लो/ क्योंकि असली अपराधी का/ नाम लेने के लिए/ कविता, सिर्फ उतनी ही देर तक सुरक्षित है/ जितनी देर, कीमा होने से पहले/ कसाई के ठीहे और तनी हुई गंडास के बीच/ बोटी सुरक्षित है.’

वे जानते थे कि चीजें जिस दिशा में हैं विकृतियां बढ़ते देर नहीं लगेगी. लगी भी नहीं. कहना न होगा कि धूमिल अपनी कविता में हमेशा एक ऐसे आम आदमी के रूप में बात करते हैं जो बहुत संवेदनशील है और चाहता है कि उसके आस-पास सब कुछ खूबसूरत हो.

वह तब तक खुश नहीं हो सकता जब तक वह सबके हिस्से कुछ खुशियां नहीं देख लेता. वह पूंजीवादी स्वार्थपरता, वर्गीय दूरियों, संकुचित विलासिता, अकेलेपन और अजनबीयत के खिलाफ खड़ा आदमी है जो जूते की मरम्मत करना तो चाहता है पर उसके पास औजार नहीं हैं.

इसी औजार की कमी कवि को वह सब कहने को मजबूर करती है जो कविता की दुनिया को स्वायत्त समझने वालों को नागवार गुजरता है.

(लेखक असम विश्वविद्यालय, दीफू परिसर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)