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दिल्ली दंगा: ख़ालिद सैफ़ी को ज़मानत मिली, पुलिस को अदालत की फटकार

दिल्ली दंगा मामले में एक आरोपी ख़ालिद सैफ़ी को ज़मानत देते हुए एडिशनल सेशन जज ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ महत्वहीन सामग्री के आधार पर तैयार की गई चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कोई दिमाग नहीं लगाया बल्कि बदले की भावना से काम किया.

खालिद सैफी (फोटो साभारः ट्विटर)

खालिद सैफी (फोटो साभारः ट्विटर)

नई दिल्लीः दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने फरवरी महीने में हुए दिल्ली दंगे मामले में आरोपी खालिद सैफी को जमानत दे दी.

रिपोर्ट के अनुसार, एडिशनल सेशन जज विनोद यादव ने कहा कि खालिद सैफी के खिलाफ महत्वहीन सामग्री के आधार पर तैयार की गई चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कोई दिमाग नहीं लगाया बल्कि बदले की भावना से काम किया.

पुलिस ने उत्तरपूर्वी दिल्ली के एक पार्किंग लॉट में आगजनी के आरोप में सैफी के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की थी.

अदालत ने कहा कि वह यह समझने में नाकाम रहे हैं कि आखिर किस तरह सिर्फ एक गवाह के बयान के आधार पर दंगे की साजिश रचने के उसके दावे को सही माना जा सकता है क्योंकि बयान में केवल इतना कहा गया कि यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के सदस्य सैफी ने कथित तौर पर शाहीन बाग में आठ जनवरी को सह आरोपी ताहिर हुसैन और उमर खालिद से मुलाकात की थी, लेकिन मुलाकात के विषय का खुलासा नहीं किया गया.

दिल्ली पुलिस द्वारा साजिश रचने की थ्योरी अविश्वसनीय साबित हुई. द वायर  पहले भी कई बार अपनी रिपोर्टों में इसे उजागर कर चुका है.

जज यादव ने कहा कि सैफी के खिलाफ अधूरे सबूतों के आधार पर उन्हें जेल में नहीं रखा जा सकता. अदालत ने 20,000 रुपये की जमानत राशि और समान राशि के मुचलके पर सैफी को जमानत दी.

हालांकि, जमानत खजूरी खास पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर मामले में दी गई, जिस मामले में उन्हें छह जून को गिरफ्तार किया गया था.
इससे पहले 26 फरवरी को उन्हें जगतपुरी पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर के तहत गिरफ्तार किया गया था.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कांग्रेस के पूर्व काउंसलर इशरत जहां के साथ सैफी को उस समय गिरफ्तार किया गया, जब वह खुरेजी में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा वहां से बाहर निकालने के लिए उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे थे. सैफी को इस मामले में भी जमानत मिल गई थी.

उन्हें 21 मार्च को दिल्ली दंगे मामले में गिरफ्तार किया गया था. सैफी को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनिमय (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था और वह इससे पहले मिली दो जमानतों के बावजूद अभी भी मंडोली जेल में बंद हैं.

उत्तरपूर्वी दिल्ली में फरवरी महीने में शुरू हुई हिंसा के बाद से सैफी उन प्रमुख लोगों में से थे, जिन्होंने विभिन्न समुदायों के बीच शांति स्थापित करने के लिए जरूरतमंदों के लिए चिकित्सा देखभाल की व्यवस्था की थी.

सैफी को कथित तौर पर हिरासत में बेरहमी से पीटा गया. शुरुआती आरोपों के बीच पुलिस ने उनकी हिरासत के शुरुआती कुछ दिनों के दौरान वकीलों को उनसे नहीं मिलने दिया.

सैफी की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर आई उनकी पहली तस्वीरों में उन्हें व्हीलचेयर पर बैठा देखा जा सकता था. इन तस्वीरों में उनके दोनों पैरों पर प्लास्टर लगा है.

सैफी के वकीलों में से एक हर्ष बोरा ने कहा कि सैफी के स्वास्थ्य में अब सुधार है और वह ठीक हैं.

अदालत ने कहा कि अगर उस बैठक में सैफी मुख्य आरोपी ताहिर हुसैन को उकसाते, तो सैफी को भी हुसैन की तरह दस अन्य मामलों में सह अभियुक्त बनाया जाना चाहिए था.

अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान दर्ज करने की तारीख (27 सितंबर) खुद इसकी विश्वसनीयता बता रही है.

जज ने अपने आदेश में कहा, ‘इस तथाकथित साजिश का एकमात्र सबूत अभियोजन पक्ष के गवाह राहुल कसाना है, जहां उन्होंने 27 सितंबर 2020 को बताया था कि वह शाहीन बाग इलाके में एक इमारत के बाहर खड़े थे और उन्होंने वहीं पर मुख्य आरोपी ताहिर हुसैन को छोड़ा था और उसके बाद उन्होंने खालिद सैफी और उमर खालिद को उसी इमारत में जाते देखा था.’

जज ने कहा, ‘मैं गवाह के बयान से यह समझने में असफल हूं कि आखिर कैसे एक गवाह के बयान के आधार पर साजिश रचने का दावा किया जा सकता है.’

जज ने आदेश में कहा, ‘मेरी राय में खालिद सैफी के खिलाफ महत्वहीन सामग्री के आधार पर तैयार की गई चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कोई दिमाग नहीं लगाया बल्कि बदले की भावना से काम किया.’

जज ने कहा कि अब यह कहीं से भी अभियोजन पक्ष का मामला नहीं है कि सैफी घटना के दिन खुद घटनास्थल पर मौजूद था. उन्होंने कहा कि अदालत ने इस मामले में कोई सीसीटीवी फुटेज या वायरल वीडियो नहीं देखा है.

आदेश में कहा गया, ‘सैफी के खुद के बयान और सह आरोपी ताहिर हुसैन के बयान के आधार पर मामले में सैफी को फंसाया गया. यहां तक कि सैफी के पास से किसी तरह की कोई सामग्री या वस्तु बरामद नहीं हुई.’

ताहिर हुसैन के कबूलनामे के आधार पर उठे सवालों को बारे में पूछे जाने पर काउंसलर अधिवक्ता जावेद अली ने द वायर  को अगस्त के शुरुआत में बताया था कि जो कुबूलनामा दिल्ली पुलिस के समक्ष दिया गया और हुसैन के खिलाफ चार्जशीट में संलग्न किया गया, उसे अदालत में स्वीकार नहीं किया गया. हुसैन ने कहा कि वह खुद दंगों का पीड़ित है न कि कोई अपराधी.

अदालत ने कहा कि यह आरोप कि वह फोन के जरिए नियमित तौर पर हुसैन और खालिद के साथ संपर्क में थे, इसका शायद ही कोई नतीजा निकले क्योंकि ये तथ्य किसी भी तरह से मामले में सैफी के खिलाफ साजिश रचने के आरोपों से मेल नहीं खाते.

अदालत ने कहा, ‘मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत राहुल कसाना के बयान को 21 मई 2020 को दर्ज किया गया था, उस दिन राहुल कसाना ने आपराधिक साजिश रचने को लेकर सैफी के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा था.’

अदालत ने कहा, ‘अब अचानक सीआरपीसी की धारा 161 के तहत 27 सितंबर को दर्ज अपने बयान में राहुल कसाना ने सैफी के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने का बिगुल फूंक दिया.’

अदालत ने कहा कि अन्य सबूत जिनकी पुलिस ने सैफी के खिलाफ इस्तेमाल करने की मांग की थी कि उनमें ताहिर हुसैन द्वारा 24-25 फरवरी की रात हुसैन को की गई 71 सेकेंड की फोन कॉल है.

अदालत ने कहा कि हुसैन दिल्ली दंगों से जुड़े 10 अन्य मामलों में आरोपी है लेकिन सैफी सिर्फ दो मामलों में आरोपी है.

जज ने कहा, ‘साजिश के मामले में सैफी को शामिल करने के पुलिस के कृत्य में कोई औचित्य नहीं है.’

सैफी की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन और अधिवक्ता हर्ष बोरा ने कहा कि उनके मुवक्किल को मामले में फंसाया गया है और उनकी कॉल डिटेल से यह पता नहीं चलता कि वह अन्य आरोपियों के साथ किसी तरह की आपराधिक साजिश में शामिल थे.

मामले में पुलिस की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजन मनोज चौधरी ने सैफी की जमानत याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि सैफी कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हुई साजिश का हिस्सा थे, जिसकी रूपरेखा ताहिर हुसैन और अन्य असामाजिक तत्वों ने रची थी.

(समाचार एजेंसी पीटीआई से इनपुट के साथ)