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ट्रांसजेंडर होने के चलते किसी व्यक्ति को क़ानूनी हकों से वंचित नहीं किया जा सकता: केरल हाईकोर्ट

केरल के एक कॉलेज में एक ट्रांसवूमेन द्वारा एनसीसी में दाखिला लेने के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन प्रशासन ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि एनसीसी में ट्रांसजेंडर को लेने का कोई प्रावधान नहीं है.

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

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नई दिल्ली: एक ट्रांसवूमेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि कोई ट्रांसजेंडर है, इसके चलते उसे कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है.

याचिकाकर्ता ने नेशनल कैडेट कॉर्प्स (एनसीसी) अधिनियम, 1948 की धारा 6 को चुनौती देते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताया है और गैर कानूनी घोषित करने की मांग की है.

उन्होंने कहा कि यह कानून एनसीसी में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के दाखिले को रोकता है.

सुनवाई के दौरान एनसीसी की ओर से पेश हुए केंद्र सरकार के स्थायी वकील ने कहा कि एनसीसी में सिर्फ ‘पुरुष’ और ‘महिला’ कैडेट्स को ही रखने का प्रावधान है. ट्रांसवूमेन के आवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे न तो पुरुष हैं और न ही महिला.

वकील ने कहा कि यह भेदभाव नहीं है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ‘उचित वर्गीकरण’ है.

लाइव लॉ के मुताबिक, इस पर जस्टिस दीवान रामाचंद्रन ने एनसीसी को यह निर्देश देते हुए कि वे इसे लेकर लिखित बयान दायर करें यह कहा कि ‘ट्रांसजेंडर होने की वजह से किसी को कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है.’

कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि वे केंद्र के वकील के साथ सहमत नहीं हैं क्योंकि केरल में ट्रांसजेंडर नीति सभी कानूनों पर लागू होती है, इसलिए किसी को कानूनों अधिकारों से इस आधार पर वंचित नहीं रखा जा सकता कि वह एक ट्रांसजेंडर है.

कोर्ट के इस आदेश के बाद विश्वविद्यालय की एनसीसी यूनिट को एक सीट खाली छोड़ने का निर्देश दिया गया है.

बता दें कि याचिकाकर्ता का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ था. हालांकि 22 अक्टूबर 2018 को सेक्स चेंज सर्जरी के जरिये वो पुरुष से महिला हो गईं.

वर्तमान में वो तिरुवनंतपुरम में यूनिवर्सिटी कॉलेज में छात्रा हैं और उन्होंने एनसीसी में दाखिला लेने के लिए आवेदन दिया था.

उनकी याचिका में कहा गया है कि एनसीसी विभाग और कॉलेज ने उनके आवेदन को अस्वीकार करते हुए कहा कि फिलहाल एनसीसी में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को दाखिल करने का कोई प्रावधान नहीं है. इसी के खिलाफ उन्होंने याचिका दायर की है.

याचिकाकर्ता ने कहा, ‘नेशनल कैडेट कॉर्प्स एक्ट, 1948 की धारा 6 के तहत सिर्फ पुरुष एवं महिला छात्र का इसमें दाखिला करने को कहा गया है और इसमें ट्रांसजेंडर छात्र का जिक्र नहीं है. यह बहुत ज्यादा भेदभावकारी प्रावधान है क्योंकि यह ट्रांसजेंडर समुदाय को बाहर करता है.’

याचिका में कहा गया है कि केरल विश्वविद्यालय ने ट्रांसजेंडर समुदाय के छात्रों की मदद के लिए एक नीति तैयार की है ताकि बिना किसी भेदभाव के वे शिक्षा प्राप्त कर सकें. इसके बावजूद एनसीसी जॉइन करने की मांग को नहीं सुना गया.

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ में अपने एक फैसले में ट्रांसजेंडर को ‘थर्ड जेंडर’ घोषित किया था और कहा था कि संविधान के तहत सुनिश्चित सभी मौलिक अधिकार उन पर बराबर लागू होते हैं.

इस मामले की अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी.