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असम: क़रीब पांच महीने बाद पूरी तरह बुझाई गई ऑयल इंडिया के कुएं की आग

तिनसुकिया ज़िले के बाघजान में ऑयल इंडिया लिमिटेड के एक कुएं में 27 मई से शुरू हुए गैस रिसाव में हफ़्ते भर बाद आग लग गई थी. अब कंपनी की ओर से बताया गया है कि रविवार को विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से क्षतिग्रस्त कुएं को सफलतापूर्वक बंद करके आग को पूरी तरह बुझा दिया गया.

ऑयल इंडिया के कुएं में लगी आग. (फोटो: पीटीआई)

ऑयल इंडिया के कुएं में लगी आग. (फोटो: पीटीआई)

गुवाहाटी/तिनसुकिया: असम के बाघजन में तेल के एक कुएं को करीब पांच महीने बाद रविवार को सफलतापूर्वक बंद कर दिया गया और आग को पूरी तरह बुझा दिया गया.

पूर्वोत्तर की इस बड़ी औद्योगिक तबाही में कंपनी के तीन कर्मचारियों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे.

ऑयल इंडिया ने यह जानकारी दी कि कुएं की आग पर काबू पाने के लिए विदेशी विशेषज्ञों समेत कई दलों के लोगों की सहायता लेनी पड़ी.

ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) के प्रवक्ता त्रिदिव हजारिका ने एक बयान में कहा, ‘कुएं को नमकीन घोल से नष्ट कर दिया गया है और अब हालात नियंत्रण में हैं. आग को पूरी तरह बुझा दिया गया है.’

उन्होंने कहा कि अब कुएं में कोई दबाव नहीं है और अगले 24 घंटों में यह जांचना होगा कि कहीं किसी गैस के रिसाव या दबाव का निर्माण तो नहीं हो रहा है.

हजारिका ने कहा, ‘कुएं को छोड़ने के लिए आगे का काम जारी है.’ साथ ही उन्होंने बताया कि सिंगापुर की कंपनी अलर्ट डिजास्टर के विशेषज्ञ कुएं पर नियंत्रण के लिए अंतिम अभियान में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं.

कंपनी के निदेशक (खोज और विकास) पी. चंद्रशेखरन, निदेशक (संचालन) पीके गोस्वामी और रेजिडेंट चीफ एक्जीक्यूटिव डीके दास ने कुएं को सफलतापूर्वक बंद किए जाने के बाद मौके पर जाकर मुआयना किया और एलर्ट के विशेषज्ञों के साथ उनकी विस्तृत बातचीत हुई.

गौरतलब है कि 27 मई को राजधानी गुवाहाटी से करीब 450 किलोमीटर दूर तिनसुकिया जिले के बाघजान गांव में ऑयल इंडिया लिमिटेड के पांच नंबर तेल के कुएं में विस्फोट (ब्लोआउट) हो गया था, जिसके बाद इस कुएं से अनियंत्रित तरीके से गैस रिसाव शुरू हुआ था.

ब्लोआउट वह स्थिति होती है, जब तेल और गैस क्षेत्र में कुएं के अंदर दबाव अधिक हो जाता है और उसमें अचानक से विस्फोट के साथ और कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस अनियंत्रित तरीके से बाहर आने लगते हैं.

कुएं के अंदर दबाव बनाए रखने वाली प्रणाली के सही से काम न करने से ऐसा होता है. इसके बाद नौ जून को यहां भीषण आग लग गई, जिसमें दो दमकलकर्मियों की मौत हो गई थी. तब से यह रिसाव और आग नियंत्रित नहीं की जा सकी थी.

इसके बाद नौ सितंबर को ओआईएल के एक 25 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियर को उच्च वोल्टेज के बिजली के झटके के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी.

सितंबर महीने में ही वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने विधानसभा में बताया था कि कुल तीन हजार परिवारों को राहत शिविरों में भेजा गया है, साथ ही ओआईएल सरकार के साथ मिलकर उनका ध्यान रख रही है.

मंत्री ने यह भी बताया था कि आग में जो 12 घर पूरी तरह जल गए थे, उन सभी को 24 लाख रुपये की मदद पेश की गई है. कुएं के पास रहने वाले 1,484 परिवारों को 30 हजार रुपये दिए गए हैं, वहीं कुएं से थोड़ी दूर रहने वाले 1,197 परिवारों को 25 हजार रुपये दिए गए हैं.

उनका यह भी कहना था कि इसके अलावा जिला प्रशासन के अनुमोदन पर आग से प्रभावित 57 परिवारों को दस लाख रुपये दिए जाएंगे, आंशिक रूप से प्रभावित 561 परिवारों को ढाई लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी.

उन्होंने यह भी बताया था कि स्थानीय लोग मुआवजा मिलने में देरी के कारण और आग को बुझाने में कंपनी की अक्षमता की वजह से बेचैन हो रहे हैं. वे 24 अगस्त से तिनसुकिया के उपायुक्त के दफ्तर के बाहर बैठे हुए हैं.

मालूम हो कि इससे पहले विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि मई महीने से हो रहे गैस रिसाव के चलते आसपास के इलाके में भारी प्राकृतिक नुकसान हुआ. आसपास के संवेदनशील वेटलैंड, डिब्रु-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान और लुप्त हो रही प्रजातियों पर संकट में रहे.

उस समय स्थानीय रहवासियों ने बताया था कि उन्होंने पास के मागुरीबिल झील में डॉल्फिंस के शव पड़े देखे थे. एक मीडिया रिपोर्ट ने बताया गया था कि आसपास के गांवों के धान के खेत, तालाब और वेटलैंड प्रदूषित हो गए थे.

गांव वालों ने गैस रिसाव के बाद शुरुआती सप्ताह में बताया था कि उन्हें गैस की महक आ रही थी और इस उद्यान में कई जगहों पर तेल फैल चुका था. कई छोटे चाय किसानों ने बताया था कि गैस की परतें चाय बागान के ऊपर इकट्ठी हो गई थीं.

इसके बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस आग पर काबू पाने में असफल रहने पर ऑयल इंडिया पर 25 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. अधिकरण का कहना था कि कुएं में लगी आग से पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है.

बता दें कि इसके बाद 17 अगस्त को क्षतिग्रस्त कुएं को 83 दिनों बाद बंद कर दिया गया था. कंपनी ने बताया था कि गैस कुएं की आग को बुझाने की दिशा में पहले सफल कदम के तहत उसके मुंह पर लपटें रोकने वाला एक उपकरण ब्लो आउट प्रेवेंटर (बीओपी) रख दिया गया है.

बीओपी कई टन की धातु की बहुत भारी चादर होती है जिसे किसी भी गैस या तेल कुएं पर नीचे से ईंधन का रिसाव रोकने के लिए रखा जाता है.

कंपनी अपने तीसरे प्रयास में इस कुएं पर बीओपी रख पाई थी. इससे पहले 31 जुलाई को भी कुएं का मुंह बंद करने की कोशिश की गई थी, लेकिन उस समय हाइड्रोलिक मशीन पलट गई थी.

उससे पहले बीते 10 जुलाई को गैस के क्षतिग्रस्त कुएं को बंद करने का दूसरा प्रयास विफल हुआ था. तीसरे प्रयास में ढक्कन को बैठाने में सफलता मिली.

कंपनी की ओर से इसके बाद कहा गया था कि वे अब कुएं को ‘खत्म’ यानी किल करने का प्रयास करेंगे, जिससे गैस रिसाव को रोका जा सके और आग पर काबू पाया जा सके.

कुएं को खत्म या किल करने के लिए तरल से भरे एक भारी कॉलम को कुएं में डाला जाता है, जिससे इसमें हो रहे रिसाव को बिना किसी दबाव नियंत्रित करने के उपकरण के रोका जा सकता है.

इससे पहले बीते 22 जुलाई को सिंगापुर की एक कंपनी के तीन विदेशी विशेषज्ञों को ओआईएल और ओएनजीसी के विशेषज्ञों की मदद के लिए बुलाया गया था.

लेकिन तब कुएं में लगी आग को बुझाने के प्रयास के दौरान भीषण विस्फोट हुआ था जिसमें तीनों विशेषज्ञ घायल हो गए थे.

मालूम हो कि शुरुआत में कुएं में आग लगने की घटना के बाद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे.

पीएसयू ने बताया था कि वर्तमान में ईआरएम इंडिया, टेरी और सीएसआईआर-एनआईईएसटी जैसी कई एजेंसियों द्वारा गांवों और आस-पास के वन क्षेत्रों में विस्फोट के विभिन्न आकलन और प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)