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क्या है आरसीईपी और भारत के इससे अलग होने की वजह

हाल ही में 15 देशों ने आरसीईपी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समझौता माना जा रहा है. इस समूह का प्रबल दावेदार माने जा रहे भारत ने इससे अलग होने का निर्णय लेते हुए कहा कि इससे उसकी चिंताओं का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया है.

PRECIOUS CARGO: The OOCL Europe left July 20 from South Carolina for the Netherlands carrying a refrigerated container filled with human body parts. Here, it is docked at the Port of Newark in New Jersey in November, after it delivered the parts to Europe. REUTERS/Brendan McDermid

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: हाल ही में 10 आसियान देशों समेत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 15 देशों ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इस निर्णय के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) बन गया है.

इस समूह का प्रमुख भागीदार माने जा रहे भारत ने अपने मुद्दों एवं चिंताओं का संतोषजनक ढंग से समाधान न होने के कारण पिछले साल नवंबर में ही खुद को इससे अलग कर लिया था.

हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने अपनी घोषणा में कहा है कि भारत के लिए इस समझौते के साथ जुड़ने का विकल्प हमेशा खुला है, वह कभी भी इसमें शामिल हो सकता है.

इस मामले में विश्लेषकों और विपक्ष की अलग-अलग राय है. कुछ का कहना है कि भारत के लिए इस समझौते का खास महत्व नहीं है, वहीं इसके इतर एक राय यह है कि भारत ने इससे अलग होकर अपने द्विपक्षीय संबंधों को खराब किया है और भूमंडलीकरण के इस दौर में ये खुद को पीछे ले जाने वाला कदम है.

तो समझते हैं कि आरसीईपी क्या है और इससे अलग होने पर भारत पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.

आरसीईपी क्या है?

आरसीईपी का उद्देश्य इसमें शामिल प्रत्येक देश के उत्पादों और सेवाओं को एक-दूसरे के लिए इसे आसान बनाना था.

10 आसियान (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर, थाईलैंड, फिलीपींस, लाओस तथा वियतनाम) और छह अन्य देशों (चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड) ने नवंबर, 2012 में नोम पेह में 21वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान आरसीईपी वार्ताओं की शुरुआत की थी.

इन वार्ताओं को शुरू करने का मकसद एक आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्ता वाला और पारस्परिक लाभकारी आर्थिक भागीदारी करार करना था.

भारत अपने उत्पादों के लिए बाजार पहुंच का मुद्दा काफी जोरशोर से उठा रहा था. वह मुख्यतौर पर अपने घरेलू बाजार को बचाने के लिए कुछ वस्तुओं की संरक्षित सूची को लेकर भी मजबूत रुख अपनाए हुए था.

हालांकि कई उद्योगों को ऐसी आशंका थी कि भारत यदि इस समझौते पर हस्ताक्षर करता है, तो देश में चीन के सस्ते कृषि और औद्योगिक उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी. इन्हीं वजहों के चलते भारत ने खुद को इससे बाहर रखा है. 

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी बीते बुधवार को कहा कि भारत आरसीईपी से इसलिए अलग हो गया था क्योंकि उसमें शामिल होने से देश की अर्थव्यवस्था पर काफी प्रतिकूल प्रभाव होता.

जयशंकर ने कहा, ‘बड़ी बात यह है कि हमने देखा कि हमारी प्रमुख चिंताओं का समाधान नहीं किया गया है. उस वक्त फिर हमें फैसला लेना था कि प्रमुख चिंताओं का समाधान हुए बगैर आप व्यापार समझौते में शामिल होंगे या फिर उसे अपने हितों के विरुद्ध बताते हुए उससे अलग हो जाएंगे.’

सरकार का कहना है कि उन्होंने ऐसा निर्णय कृषि एवं डेरी सेक्टर के हितों को सुरक्षित रखने के लिए लिया है.

भारत के सामने ये संकट इसलिए था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और मलेशिया जैसे आरसीईपी में शामिल दूसरे देशों ने कृषि, खाद्य तेल और डेयरी उत्पादों के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की है.

इनकी तुलना में भारत आज भी कृषि क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा क्षमता विकसित करने के मामले में काफी पीछे है और यह जीविकोपार्जन अर्थव्यवस्था के ही दौर में है.

भारत के निर्णय के पीछे चीन कितना जिम्मेदार है

माना जा रहा है कि भारत का चीन के साथ सीमा विवाद आरसीईपी से अलग होने की एक प्रमुख वजह है.

वैसे तो इसमें शामिल होने पर भारत को पहले ही चीन से काफी खतरा था, लेकिन गलवान घाटी की घटना के बाद दोनों के संबंधों में दूरियां काफी बढ़ गई हैं.

पिछले कुछ महीनों में भारत ने जिस तरह से कई चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया है, वो आरसीईपी में शामिल होते हुए संभव नहीं हो सकता था.

हालांकि चीन ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) समझौते को ‘बड़े महत्व का मील का पत्थर’ का करार दिया है. विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि यह समझौता चीन के लिए आर्थिक प्रभाव से अधिक रणनीतिक महत्व का है.

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजिआन ने समझौते को लेकर एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘आठ साल की बातचीत के बाद आरसीईपी पर आधिकारिक रूप से समझौता हो गया. इसका मतलब है कि सबसे बड़ी आबादी और आर्थिक हिस्सेदारी को कवर करने वाला सबसे आशाजनक समझौता आधिकारिक तौर पर हो गया. यह बहुत महत्व का मील का पत्थर है.’

आरसीईपी समझौते में एक मुख्य मामला जिसका समाधान नहीं हो पाया, वो ये था कि आयात को लेकर क्या-क्या शर्तें एवं सुरक्षा प्रदान की जाएगी. चीन के संदर्भ में भारत इसी को लेकर चिंतित था.

भारत को इस बात का डर था कि आरसीईपी में शामिल होने पर अपने आयात शुल्कों में कटौती करनी पड़ेगी और इससे चीन को ही फायदा होता क्योंकि भारत जितना चीन को निर्यात करता है, उसके मुकाबले काफी ज्यादा आयात करता है.

आरसीईपी में शामिल चीन ही नहीं, बल्कि अन्य कई देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है, इसलिए आयात शुल्क में कटौती से अन्य देशों को ही फायदा होता.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, भारत यह भी चाहता था कि आरसीईपी के तहत निवेश से सबसे पसंदीदा राष्ट्र (मोस्ट-फेवर्ड नेशन) की प्रतिबद्धताओं को खत्म किया जाना चाहिए क्योंकि वो सीमा विवाद वाले देशों को वही सुविधाएं नहीं देना चाहता था, जो वह रणनीति सहयोगियों को देता है.

इसके अलावा भारत को यह भी लगता था कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से उसे संवेदनशील क्षेत्रों जैसे रक्षा इत्यादि में सभी आरसीपी सदस्यों के लिए रास्ते खोलने होंगे.

क्या इस फैसले से भारत पर प्रभाव पड़ेगा?

आरसीआईपी से बाहर होने पर भारत सामने एक प्रमुख चिंता ये खड़ी हुई है कि इस समूह में शामिल देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि समूह के 15 देश अब आपस में रिश्ते मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देंगे.

इसके चलते आरसीईपी द्वारा तैयार किए गए विशालकाय बाजार के साथ भारत के व्यापार के मौके कम हो सकते हैं. इस समूह में शामिल देशों की कुल जनसंख्या दो अरब से ज्यादा है, जो एक बहुत बड़ा व्यापार मंच बनाते हैं.

एक चिंता ये भी है कि इस फैसले के चलते हिंद-प्रशांत महासागर में ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान के संबंध प्रभावित हो सकते हैं. इसके चलते इन देशों के बीच हो रहे व्यापार में रुकावटें आ सकती है.

हालांकि व्यापार घाटे के संदर्भ में ये सही कदम बताया जा रहा है क्योंकि भारत का आरसीईपी के 15 सदस्यों में से 11 के साथ व्यापार घाटा है.

इसके परिपेक्ष्य में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपने व्यापारिक साझीदारों के लिए बड़ा बाजार तो उपलब्ध कराता है, लेकिन इससे उसे कोई खास लाभ नहीं हो रहा है.

कई शोध एवं अध्ययन बताते हैं कि भारत ने जिन देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) किया है, उसके बाद से निर्यात में ही कमी आई है और आयात बढ़ता रहा, जिसके परिणामस्वरूप व्यापार घाटा में वृद्धि हुई है.

नीति आयोग की एक रिपोर्ट भी बताती है कि एफटीए के कारण निर्यात के मुकाबली आयात ही ज्यादा हुए हैं.

एफटीए के तहत साझीदार देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वाले सामान पर शुल्क खत्म कर दिए जाते हैं जबकि अन्य देशों के लिए शुल्क जारी रहते हैं.

हालांकि ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि भारत के पास आरसीईपी में शामिल होने का विकल्प अभी भी खुला हुआ है. इसके अलावा कई अन्य समूहों के साथ भी भारत ने समझौता किया है या बातचीत का दौर जारी है, जिसमें आरसीईपी के भी देश शामिल हैं.

भारत ने वर्तमान में आसियान, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे सदस्यों के साथ समझौते किए हैं और ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड जैसे सदस्यों के साथ समझौते की प्रक्रिया चल रही है.

भारत-सिंगापुर सीईसीए की दो समीक्षाएं पूरी हो चुकी हैं, व्यापार वाणिज्य और पारगमन पर भारत-भूटान समझौता 2016 में नवीनीकृत किया गया था और 2016 में भारत-नेपाल संधि का विस्तार किया गया था.

माना जा रहा है कि आरसीईपी से बाहर रहने के बाद भी यदि भारत इन समझौतों को सफलतापूर्वक लागू कर पाता है, तो उसे व्यापार में काफी लाभ हो सकता है.