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सुप्रीम कोर्ट ने पीएम मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतरे बीएसएफ जवान की याचिका ख़ारिज की

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ खड़े हुए बीएसएफ के बर्ख़ास्त जवान तेज बहादुर यादव ने अपना नामांकन रद्द होने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी.

तेज बहादुर यादव. (फोटो साभार: फेसबुक)

तेज बहादुर यादव. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी लोकसभा सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ पर्चा दाखिल करने वाले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के बर्खास्त जवान तेज बहादुर का नामांकन रद्द करने का निर्वाचन अधिकारी का निर्णय मंगलवार को बरकरार रखा. शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी.

तेज बहादुर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसमें कोर्ट ने निर्वाचन अधिकारी द्वारा उनका नामांकन पत्र अस्वीकार किए जाने को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया था.

इस पीठ ने तेज बहादुर की अपील पर 18 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी. इस दौरान कोर्ट ने मामले की सुनवाई स्थगित करने से इनकार करते हुए कहा था कि यह ‘बहुत महत्वपूर्ण मामला’ है.

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामासुब्रमनियन की पीठ ने तेज बहादुर की ओर से पेश अधिवक्ता से सवाल किया, ‘हमें आपको स्थगन की छूट क्यों देनी चाहिए. आप न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहे हैं. आप बहस कीजिए.’

बहादुर के अधिवक्ता प्रदीप कुमार यादव द्वारा सुनवाई स्थगित करने या इस पर बाद में सुनवाई करने का अनुरोध करने पर पीठ ने कहा, ‘हम ऐसा नहीं कर सकते. यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है. इसमें प्रतिवादी प्रधानमंत्री हैं. हमने इस मामले को पढ़ा है. आप अपने मामले में बहस कीजिए.’

पीठ ने कहा कि इस मामले की सुनवाई कई महीने स्थगित की जा चुकी है और न्यायालय इसे अब और स्थगित नहीं करेगा.

इस मामले की सुनवाई के दौरान 18 नवंबर को तेज बहादुर के वकील ने उच्च न्यायालय के फैसले का जिक्र करते हुए शीर्ष अदालत में दावा किया था कि उसका नामांकन ‘दूसरी वजहों’ से खारिज किया गया था. उसका दावा था कि निर्वाचन अधिकारी ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 और 33(3) के प्रावधानों की मंशा के विपरीत जाकर उसका नामाकन पत्र रद्द किया था.

न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान तेज बहादुर के वकील से कहा था, ‘आपको यह प्रमाण पत्र संलग्न करना था कि आपको (बहादुर) सेवा से बर्खास्त नहीं किया गया है. आपने ऐसा नहीं किया. आप हमें बताएं कि जब आपका नामांकन पत्र रद्द हुआ था क्या आप एक पार्टी के प्रत्याशी थे.’

तेज बहादुर को साल 2017 में सीमा सुरक्षा बल से बर्खास्त कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने एक वीडियो में आरोप लगाया था कि सशस्त्र बल के जवानों को घटिया किस्म का भोजन दिया जाता है.

मालूम हो कि शुरू में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा दाखिल करने वाले तेज बहादुर यादव को 29 अप्रैल (2019) को समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया था. वाराणसी संसदीय सीट के लिए समाजवादी पार्टी ने शुरू में शालिनी यादव को अपना प्रत्याशी बनाया था.

निर्दलीय उम्मीदवार और समाजवादी पार्टी (सपा) उम्मीदवार रूप में पर्चा दाखिल करने के दौरान दोनों नामांकन पत्रों में अलग-अलग जानकारी देने को आधार बनाते हुए वाराणसी के जिला निर्वाचन अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने एक मई, 2019 को तेज बहादुर यादव का नामांकन खारिज कर दिया था.

अधिकारी ने बहादुर का नामांकन पत्र रद्द करते समय कहा था कि उनके नामांकन पत्र के साथ निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित प्रारूप में यह प्रमाण पत्र संलग्न नहीं है कि उन्हें भ्रष्टाचार या शासन के साथ विश्वासघात करने के कारण सशस्त्र बल से बर्खास्त नहीं किया गया है.

इस संबंध में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33 का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी से बर्खास्त किया जाता है और उसकी बर्खास्तगी को पांच साल नहीं बीते हैं, तो ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार के रूप में नहीं नामांकित किया जा सकता है.

हालांकि इसमें एक शर्त ये है कि यदि संबंधित व्यक्ति चुनाव आयोग द्वारा तैयार किए गए प्रारूप में इस बात का सर्टिफिकेट जमा कर देता है कि उन्हें भ्रष्टाचार या शासन के साथ विश्वासघात के कारण बर्खास्त नहीं किया गया है, तो उन्हें उम्मीदवार घोषित किया जा सकता है.

तेज बहादुर ने नामांकन पत्र रद्द करने के निर्वाचन अधिकारी के फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायलाय में चुनौती दी थी. उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज करते हुए निर्वाचन अधिकारी का फैसला बरकरार रखा था. इसके बाद सीमा सुरक्षा बल के इस बर्खास्त जवान ने शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)