भारत

प्रेम पर भाजपा का राजनीतिक प्रपंच

एक तरफ़ भारतीय संविधान वयस्क नागरिकों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, धर्म चुनने की स्वतंत्रता देता है, दूसरी तरफ़ भाजपा शासित सरकारें संविधान की मूल भावना के विपरीत क़ानून बना रही हैं.

A couple sits along the seafront promenade at dusk in Mumbai's suburbs May 16, 2012. REUTERS/Vivek Prakash

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

देश में भाजपा की राज्य सरकारें लव जिहाद के विरुद्ध दंडात्मक कानून बनाने जा रही हैं, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में ऐसा कानून पारित भी कर दिए गए हैं और हरियाणा की भाजपा नेतृत्व वाली मनोहर लाल खट्टर सरकार भी इस दिशा में बढ़ रही है.

भाजपा की विभिन्न राज्य सरकारों के इस दिशा में बढ़ते कदम की तमाम प्रबुद्ध वर्ग और विपक्षी दलों द्वारा आलोचना की जा रही है. इन लोगों का कहना है कि शादी एक निजी मामला है और इसे रोकने के लिए कानून लाना पूरी तरह से असंवैधानिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने जैसा है.

इन लोगों का आरोप है कि देश को विभाजित करने और सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने के उद्देश्य के साथ भाजपा ने ‘लव जिहाद’ नाम का शब्द गढ़ा है.

ये आशंकाएं निर्मूल और निराधार नहीं हैं. उन्होंने वही कहा है जो भारतीय संविधान की मूल भावना है. एक तरफ तो भारतीय संविधान वयस्क नागरिकों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, धर्म चुनने की स्वतंत्रता देता है, दूसरी ओर भाजपा शासित सरकारें संविधान की मूल भावना के विपरीत कानून बना रही हैं.

भाजपा का यह कदम संविधान के विरुद्ध तथा शुद्ध रूप से सांप्रदायिक राजनीतिक स्टंट है, जिसके माध्यम से वो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण चाहती है. इसके परिणाम भविष्य में काफी खतरनाक हो सकते हैं.

लव जिहाद क्या है? इसे समझना होगा. लव जिहाद कथित रूप से मुस्लिम पुरुषों के गैर-मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से प्रेम के प्रपंच अथवा ढोंग को कहा गया है, लेकिन लव जिहाद की कोई आधिकारिक या विधिक परिभाषा नहीं है.

इस शब्द का प्रयोग पहली बार 2009 में केरल और कर्नाटक में कैथोलिक ईसाई संगठनों की ओर से मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध किया गया, तब ही से यह शब्द राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण का केंद्र हुआ.

केरल पुलिस महानिदेशक जैकब पुन्नोज ने नवंबर 2009 में कहा था कि ऐसा कोई संगठन नहीं है, जिसके सदस्य केरल में लड़कियों को मुस्लिम बनाने के इरादे से प्यार करते थे.

केरल हाईकोर्ट के जस्टिस केटी शंकरन ने दिसंबर 2009 में पुन्नोज की रिपोर्ट को अस्वीकार करते हुए निष्कर्ष निकाला कि जबरदस्ती धर्मांतरण के संकेत हैं. अदालत ने कथित लव जिहाद मामलों में दो अभियुक्तों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पिछले चार वर्षों में इस तरह के तीन से चार हजार मामले सामने आए हैं.

कर्नाटक सरकार ने 2010 में कहा था कि हालांकि कई महिलाओं ने इस्लाम में धर्म परिवर्तन किया है, लेकिन ऐसा करने के लिए कोई संगठित प्रयास किए गए हों या लव जिहाद रहा हो, ऐसे साक्ष्य बिल्कुल नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश में लव जिहाद के बहुत सारे मुद्दे समय—समय पर उठाए गए, लेकिन गैर धार्मिक पक्षों के मध्य विवाह का उद्देश्य पूर्णत: धर्म परिवर्तन रहा हो, ऐसे कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आए.

जांच एजेंसियों ने भी माना कि कुछ पुरुषों के छल के छिटपुट मामले तो थे, लेकिन व्यापक साजिश के सबूत नहीं मिले. राजनीतिक प्रोपेगैंडा को इसमें जोड़कर देखना विषय का सही आकलन करना नहीं होगा.

वर्ष 2017 में केरल उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में लव जिहाद के आधार पर एक मुस्लिम पुरुष से हिंदू महिला के विवाह को अमान्य घोषित किया.

तब मुस्लिम पति की ओर से भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक अपील दायर की गई थी, जहां अदालत ने लव जिहाद के पैटर्न की स्थापना के लिए सभी समान मामलों की जांच करने के लिए एनआईए को निर्देश दिया था, जिसकी अभी कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई है.

यह अवधारणा कई लोगों के लिए राजनीतिक विवाद और सामाजिक चिंता का स्रोत बनी हुई है. हालांकि 2014 तक किसी संगठित लव जिहाद के विचार को भारतीय मुख्यधारा में व्यापक रूप से साजिश सिद्धांत के रूप में नहीं माना गया था.

अगर इस विषय को राजनीतिक लाभ—हानि से मुक्त रखा जाए तो यह मान लेना चाहिए कि लव जिहाद जैसी कोई अवधारणा अस्तित्व में नहीं है और न ही ये मोडस ऑपरेंडी (कार्य प्रणाली) भारत जैसे देश में सफल हो सकती है.

जहां तक लव जिहाद पर विशेष कानून बनाने की बात है तो यह पूर्णतया एक राजनितिक प्रोपेगैंडा या षड्यंत्र के सिवा कुछ भी नहीं है, क्योंकि देश में लव जिहाद के कोई प्रमाणिक आंकड़े नहीं हैं और न ही कोई परिभाषा है.

वहीं यदि कोई व्यक्ति गलत शपथ-पत्र प्रस्तुत करता है, उम्र-धर्म छिपाता है, शादीशुदा होने की बात छिपाकर शादी करता है, अपहरण करना, विश्वास का आपराधिक हनन करता है तो ये अपराध की श्रेणी में आता है और इसके लिए भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में पर्याप्त दंडात्मक प्रावधान हैं.

दो धर्म अथवा जाति अथवा वर्ग विशेष के मानने वाले वयस्क लड़की और लड़का यदि बिना धर्म बदले विवाह करना चाहते हैं तो कानूनी रूप से वे विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह कर सकते है.

इसके लिए उन्हें परिवार की सहमति की जरूरत भी नहीं है. वे अपने—अपने धर्म की मान्यताओं के साथ पति-पत्नी के रूप में जीवनयापन कर सकते हैं.

एक अवधारण यह भी है समाज को अंतरजातीय विवाह के साथ अलग-अलग धर्मों के बीच विवाह की मान्यता को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे समाज में जातीयता और धर्मांधता कमजोर होगी और मनुष्य का एक दूसरे की जाति और धर्म के प्रति सम्मान बढ़ेगा.

वैसे भी देखा जाए तो ये जाति और धर्म की बेड़ियां मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए ही होती हैं. समृद्ध परिवार के लड़के—लड़कियां किसी धर्म, जाति और समाज में विवाह करें तो भी सामान्यत: कोई मुद्दा नहीं बनता.

या गरीब परिवार यदि ऐसा कहता है तो भी कोई विशेष विवाद का कारण नही बनता. मध्यमवर्गीय या निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कई सामाजिक मापदंड बने हुए हैं. इस तरह का गैर वाजिब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श वहीं से प्रारंभ होता है.

भारत पहले से ही धार्मिक असहिष्णुता के दौर से गुजर रहा है. यदि इस आधारहीन मुद्दे को हवा दी गई तो हालात और ज्यादा गंभीर होंगे.

बेशक भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है, पर अंतत्वोगत्वा भाईचारा, शांति, सौहार्द और सद्भाव को बहुत नुकसान होगा.

(लेखक राजस्थान हाईकोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं.)