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सूचना आयोग ने छह राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ सुनवाई के लिए बड़ी बेंच गठित की

पार्टियों ने सीआईसी के उस आदेश का पालन नहीं किया जिसमें कहा गया था कि सभी राष्ट्रीय पार्टियां आरटीआई कानून के दायरे में आएं.

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भारतीय संसद (रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर ने सीआईसी के आदेशों का पालन नहीं करने वाले छह बड़े राजनीतिक दलों के खिलाफ शिकायतों को सुनने के लिए बड़ी पीठ का गठन किया है. मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) ने छह पार्टियों को आरटीआई कानून के दायरे में लाने का आदेश दिया था. लेकिन इन पार्टियों ने उस आदेश का पालन नहीं किया. यह बेंच इसी मामले की सुनवाई करेगी.

पीठ श्रीधर आचार्युलु की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पैनल का स्थान लेगी जो 22 जुलाई 2016 से मामले की सुनवाई कर रहा था और इसके एक सदस्य बिमल जुल्का ने काम के बोझ का हवाला देते हुए खुद को सुनवाई से अलग करने का निर्णय किया. उनके हटने के बाद माथुर ने अगले नोटिस तक मामले को स्थगित कर दिया.

आश्चर्यजनक रूप से आचार्युलु के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय पीठ के किसी भी सदस्य को नये पैनल में जगह नहीं मिली है. माथुर के अलावा नई पीठ में सूचना आयुक्त शरद सभरवाल, मंजुला पराशर और दिव्य प्रकाश सिन्हा शामिल होंगे.

आयोग की तरफ से जारी नोटिस में बताया गया कि नई पीठ 16 अगस्त से मामले पर सुनवाई शुरू करेगी.

पीठ ने भाजपा के तत्कालीन प्रमुख राजनाथ सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, बसपा प्रमुख मायावती, राकांपा के शरद पवार, भाकपा के सुधाकर रेड्डी और माकपा के प्रकाश करात को नोटिस जारी किया है.

छह दलों को आयोग की पूर्ण पीठ ने तीन जून, 2013 को आरटीआई कानून के दायरे में लाने का आदेश दिया था. जब यह किया गया तो ये नेता अपनी पार्टियों के प्रमुख थे और सोनिया गांधी, शरद पवार तथा रेड्डी अब भी अपने राजनीतिक संगठन के प्रमुख हैं.

कार्यकर्ता आरके जैन की शिकायत पर ये नोटिस जारी किए गए जिन्हें उनके आरटीआई आवेदन पर जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था. उन्होंने इन राजनीतिक दलों के बजट, संविधान, चुनाव आदि का ब्यौरा मांगा था.

2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य सूचना आयुक्त को आदेश दिया था कि इस मामले की सुनवाई छह महीने में पूरी करें. यह बेंच कई अन्य मामलों को भी इसी केस में क्लब करके सुनवाई करेगी.

सूचना आयुक्त का जून, 2013 के निर्णय को न तो हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, न ही उसे बदला गया, लेकिन राजनीतिक दलों ने आरटीआई आवेदनों पर विचार करने से इनकार कर दिया.