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‘लव जिहाद’ का इतिहास: कैसे एक ख़तरनाक, काल्पनिक विचार को संघ परिवार ने आगे बढ़ाया

कर्नाटक में ‘मोरल पुलिस’ का काम करने से लेकर उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे भड़काने तक, ‘लव जिहाद’ का राग छेड़कर हिंदू दक्षिणपंथियों ने अपने कई उद्देश्य पूरे किए हैं.

'लव जिहाद' के खिलाफ प्रण लेते विश्व हिंदू महासंघ के सदस्य. (फोटो: पीटीआई)

‘लव जिहाद’ के खिलाफ प्रण लेते विश्व हिंदू महासंघ के सदस्य. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत में ‘लव जिहाद’ का प्रेत एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है. पिछली बार 2013 में जब भारतीय जनता पार्टी ने इसे पूरे जतन से एक राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठाया था, तब इसका नतीजा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगों में 62 लोगों की मौत और उसके बाद 50,000 से ज्यादा मुसलमानों के विस्थापन के तौर पर निकला था.

पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण कर रख देनेवाले दंगों से पहले के महीनों में राज्य की भाजपा इकाई ने प्रयोग के तौर पर ‘लव जिहाद’ अभियान चलाया और क्षेत्र के सामाजिक सौहार्द को नष्ट कर दिया.

पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के नेतृत्व में 1970 के दशक से एक कृषि समुदाय के तौर पर साथ आने वाले जाट और मुसलमान एक दूसरे के जानी दुश्मन बन गए. परिणाम के तौर पर सामने आया सामाजिक बिखराव आज भी भगवा पार्टी को राजनीतिक लाभ पहुंचा रहा है.

यह वह वक्त था, जब गुजरात के बाहर कोई खास पहचान न रखने वाले अमित शाह को पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया गया. उनके नेतत्व से ऊर्जा पाकर भाजपा कार्यकर्ता तथाकथित ‘लव-जिहाद’ के खिलाफ अभियान चलाने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव-गांव गए.

‘लव-जिहाद’ का इस्तेमाल संघ परिवार द्वारा पहले से ही तटीय कर्नाटक में, जो ऐतिहासिक तौर पर हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है, हिंदुओं और मुस्लिमों का ध्रुवीकरण करने के लिए किया जा रहा था.

भाजपा कार्यर्ताओं और संघ परिवार से जुड़े अन्य लोगों ने जाटों और मुसलमानों के बीच अविश्वास पैदा किया. वे गांवों में गए और उन्होंने जाट समुदाय के बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकें कीं. उनका मकसद बूढ़े लोगों की पुरातनपंथी सोच और किसी भी प्रकार के प्रेम संबंधों को लेकर उनके परंपरागत विरोध का दोहन करना था.

सोशल मीडिया पर नवनिर्मित और बेहद सक्षम तंत्र से लैस होकर इन कार्यकर्ताओं ने यह दावा किया कि कुछ मदरसों को हिंदू औरतों का धर्मांतरण करवाने के लिए आतंकवादी संगठनों और इस्लामी देशों से पैसा मिल रहा है.

उन्होंने इस कहानी को इस तरह से पेश किया कि ये मदरसे ‘अच्छे दिखनेवाले नौजवान मुसलमानों’ की पहचान करते हैं और उन्हें हिंदू औरतों का पीछा करने की ट्रेनिंग देते हैं.

हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं के मुताबिक, ये मदरसे इन जवान मुसलमान लड़कों को आधुनिक तरीके से कपड़े पहनने की ट्रेनिंग देते हैं और उन्हें मोबाइल फोन की दुकानें खोलने और मोटरबाइक खरीदने के लिए पैसे देते हैं, जिसका इस्तेमाल वे हिंदू लड़कियों को फंसाने के लिए करते हैं.

इसके बाद वॉट्सऐप के जरिए कई फर्जी वीडियो फॉरवर्ड करे इस बेतुके सिद्धांत का हव्वा खड़ा किया गया.

इस अभियान का असर ऐसा था कि 2012 के अंत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक खाप पंचायत ने महिलाओं के मोबाइल फोन रखने पर ही पूरी तरह से पाबंदी लगा दी.

आखिर संघ परिवार द्वारा फैलाए गए अफवाहों के मुताबिक मुस्लिम युवाओं द्वारा चलाए जा रही मोबाइल फोन की दुकानें ही हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुष के पहली बार मिलने की जगहें थीं.

इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के आपस में मिले हुए जाटबहुल इलाकों की कई अन्य खाप पंचायतों ने इस फैसले का समर्थन किया.

इस तरह से 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगों से पहले अविश्वास का बीज बो दिया गया था.

ऐसे में एक मोटरसाइकिल को लेकर हिंदू और मुस्लिम पुरुषों के बीच हुए एक छोटे से झगड़े को, जिसमें एक मुस्लिम की जान चली गई थी, एक बड़े पैमाने के दंगे का रूप लेने में कोई वक्त नहीं लगा, जिसने इस इलाके को कई दिनों तक आग में झोंके रखा.

कैसे बना ‘लव जिहाद’ दंगा फैलाने का प्रभावशाली हथियार

कवाल गांव में इस झगड़े के चंद घंटों के भीतर ही एक मुस्लिम भीड़ ने दो जाटों की पीट-पीटकर हत्या कर दी, जो उनके मुताबिक मुस्लिम शख्स की हत्या के लिए जिम्मेदार थे.

लेकिन, जैसे-जैसे दिन गुजरता गया, संघ परिवार ने एक पुराना वीडियो फैलाना शुरू कर दिया, जिसमें तालिबान के सदस्यों को एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या करते देखा जा सकता था.

दावा किया गया कि यह कवाल गांव में लिंचिंग की घटना का वीडियो है. इस फर्जी वीडियो को इस अफवाह के साथ फैलाया गया कि मुस्लिमों को अपनी बहन का पीछा करने से रोकने पर दो जाटों को पीट-पीटकर मार डाला गया.

सांप्रदायिक तनाव को भड़काने के लिए संघ परिवार ने मारे गए दो जाट युवकों के दाह-संस्कार के लिए बड़ी रैली का आयोजन किया. दाह-संस्कार से लौटते हुए ट्रैक्टर और मोटरसाइकिलों पर सवार भीड़ कवाल गांव की मुस्लिम बस्तियों में घुस गई.

उन्होंने मुस्लिमों के घरों और दुकानों में तोड़-फोड़ और लूटपाट की और क्षेत्र की मस्जिदों को जला डाला. इस दौरान वे -जाओ पाकिस्तान वरना कब्रिस्तान, हिंदू एकता जिंदाबाद और एक के बदले एक सौ के नारे लगाते रहे.

सांप्रदायिक परियोजना अब भी अधूरी थी. जैसे-जैसे फर्जी वीडियो को चारों तरफ फैलाया जा रहा था, भाजपा के लव जिहाद’ अभियान के काफी प्रभाव में आ चुके कुछ जाट नेताओं ने एक महापंचायत यानी जाट समुदाय की एक आमसभा की मांग की, जिसका घोषित एजेंडा ‘आक्रमणकारी मुसलमानों से जाट सम्मान की रक्षा’ करना था.

ऐतिहासिक तौर पर ऐसी महापंचायतों में मुस्लिमों की भी थोड़ी-बहुत नुमाइंदगी हुआ करती थी, लेकिन अबकी बार ऐसा नहीं था.

कवाल हिंसा के बाद बुलाई गई महापंचायत में प्रभावशाली भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश और राकेश टिकैत के साथ भाजपा के हुकुम सिंह, संगीत सोम, सुरेश राणा जैसे के प्रमुख नेताओं ने शिरकत की.

उन्होंने मिलकर ‘अपनी औरतों’ की इज्जत बचाने का आह्वान किया. इस महापंचायत को बहू, बेटी बचाओ महासम्मेलन का नाम दिया गया.
जैसा अंत्येष्टि जुलूस के साथ हुआ था, महासम्मेलन में शामिल हुए लोगों ने वापस लौटते वक्त मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की कार्रवाई की.

मुस्लिम नेताओं ने इस हिंसा के जवाब में अपनी अपनी पंचायतें कीं. अगले कुछ दिनों में सांप्रदायिक हिंसा धीरे-धीरे मुजफ्फरनगर और पास के जिलों में फैल गई- जिसे तत्कालीन समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार रोकने में बुरी तरह से नाकाम रही.

विश्व हिंदू परिषद नेता अशोक सिंघल ने तब इस हिंसा का जायज ठहराया था- ‘जब समाज के लिए उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में लव जिहादियों द्वारा हिंदू औरतों और लड़कियों की इज्जत-आबरू खराब करने को बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं रह गया, तब बहू, बेटी बचाओ महापंचायत के तौर पर हालात को सुधारने की मुहिम अस्तित्व में आई..’

राजनीतिक परिणाम

‘लव जिहाद’ अभियान का नतीजा भारत के सबसे बड़े जनसंख्या बदलावों में से एक के तौर पर सामने आया.

उस समय फ्रंटलाइन पत्रिका में काम करते हुए जब मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगा प्रभावित कई गांवों का दौरा किया, तब सामाजिक-आर्थिक ढांचे में बदलाव को साफ देखा जा सकता था.

2013 में मुजफ्फरनगर के एक दंगा प्रभावित क्षेत्र में तैनात पुलिस. (फाइल फोटो: पीटीआई)

2013 में मुजफ्फरनगर के एक दंगा प्रभावित क्षेत्र में तैनात पुलिस. (फाइल फोटो: पीटीआई)

हिंदू बहुल गांवों में, मुसलमान अपने घरों और संपत्तियों को छोड़कर भाग गए थे और कहीं और जाकर बस गए थे. ऐसे ही, ज्यादातर मुस्लिम बहुल गांवों में, हालांकि इनकी संख्या कम थी, हिंदुओं की एक बड़ी आबादी भाग गई थी.

कवाल और उस जैसे कई अन्य गांवों में जबकि हजारों मुसलमानों को शरणार्थी कैंपों में रहने पर मजबूर होना पड़ा था, जाटों और सैनियों ने गैर

कानूनी ढंग से सभी मुस्लिम जमीनों और घरों पर कब्जा कर लिया था.

ध्रुवीकरण कुछ ऐसा था कि 2014 के संसदीय चुनाव में भाजपा ने धार्मिक आधार पर मतदाताओं को सफलतापूर्वक बांटकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी सीटें जीत लीं, जहां पहले इसकी उपस्थिति नगण्य थी.

चरण सिंह के बेटे अजित सिंह बेटे के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकदल का चुनावी नक्शे से नामोनिशान मिट गया, जबकि यह इलाका उनका गढ़ माना जाता था.

आरएसएस समर्थित अभियान

ठीक उसी समय जब मुजफ्फरनगर दंगों की इबारत गढ़ी जा रही थी, सितंबर, 2013 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कई पत्रकारों को एक सामान्य से दिखने वाले शीर्षक ‘कुछ तथ्य: मुस्लिम पुरुष/हिंदू स्त्री’ वाला एक ईमेल भेजा.

इस ईमेल में 73 नामी लोगों की सूची बनाई गई थी, जो मुस्लिम थे और जिन्होंने हिंदू स्त्री से विवाह किया था. लेकिन इसमें कहीं भी ‘लव जिहाद’ का कोई जिक्र नहीं था.

इस सूची में फिल्म निर्देशक के. आसिफ, मुजफ्फर अली, सुपरस्टार शाहरुख खान, आमिर खान, हिंदुस्तानी शास्त्रीय कलाकार उस्ताद अली अकबर खान और उस्ताद विलायत खान- के नाम थे, जिन्होंने हिंदू औरतों से शादी की हैं.

इस ईमेल में कहा गया था, ‘एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण डॉक्टर/मॉडल अदिति गोवित्रिकर ने डॉक्टर मुफ्फज़ल लकड़ावाला से शादी की. उनकी एक बेटी कियारा और एक बेटा ज़िहान हैं. गोवित्रिकर ने शादी के बाद के अपने नाम सारा मुफ्फज़ल लकड़ावाला के नाम से मिसेज इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और इसकी विजेता रहीं. वे दोनों अब अलग हो गए हैं. डॉक्टर मुफ्फज़ल ने बाद में मेजर जनरल टीके कौल की बेटी प्रियंका से शादी कर ली.’

इस ओर स्पष्ट इशारा करते हुए कि मुस्लिम एक से ज्यादा बार विवाह कर सकते हैं, इसमें आगे कहा गया, ‘शास्त्रीय गायक अली अकबर खान ने कई शादियां कीं. उनकी एक पत्नी राजदुलारी देवी थीं, जो खुद एक गायिका थीं. उनकी बेटी अनीसा टीवी प्रोड्यूसर राजीव चौधरी के साथ विवाहित हैं. आश्चर्यजनक ढंग से अली अकबर खान और उनकी मुस्लिम पत्नी ज़ुबैदा ने अपने बेटों को हिंदू नाम दिया: आशीष, ध्यानेश और प्रणेश. इनमें से आशीष ने खुद को हिंदू घोषित किया और अपनी मुस्लिम पत्नी फ़िरोजा देहलवी से अलग हो गए. आशीष के बेटे का नाम फराज़ और बेटी का नाम नुसरत है. ध्यानेश की बेटी सहाना एक हिंदू (श्री गुप्ता) से विवाहित हैं. ध्यानेश के बेटे का नाम शिराज खान है.’

इस सूची में आगे कहा गया, ‘गायिका सुनिधि चौहान ने 18 साल की उम्र में कोरियाग्राफर अहमद खान के भाई बॉबी खान के साथ भागकर शादी की. उनके परिवार ने इस शादी को कभी भी स्वीकार नहीं किया और उनसे रिश्ता तोड़ लेने की धमकी दी. एक साल बाद दोनों अलग हो गए और सुनिधि लौटकर अपने परिवार के पास आ गईं. वे अब एक हिंदू से विवाहित हैं.’

इसी तरह की बातें आगे कही गई थीं.

हिंदू जनजागृति समिति द्वारा जारी एक पोस्टर.

हिंदू जनजागृति समिति द्वारा जारी एक पोस्टर.

कहां से उपजा यह विचार

संघ परिवार ने तब से समय-समय पर अपने फायदे के लिए लव जिहाद अभियान का रणनीतिक तरीके से इस्तेमाल किया है. हालांकि, एक राजनीतिक विचार के तौर पर यह विचार पहले पहल तटीय कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ा जिले और उत्तरी केरल के कुछ हिस्सों में एक सीमांत दक्षिणपंथी संगठन हिंदू जनजागृति समिति (हिजस) के अभियानों में सामने आया.

हिजस हाल तक खुलकर खुद को सनातन संस्था से जोड़ती थी, जो 2009 गोवा बम धमाके जैसे कई आतंकी मामलों में नामजद है और कम्युनिस्ट नेता गोविंद पनसारे, सामाजिक कार्यकर्ता और तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर और पुरालेखवेत्ता (एपिग्राफिस्ट) और लिंगायत विद्वान एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या से जिसके तार जुड़े बताए जाते हैं.

हिजस तटीय कर्नाटक के शहरी इलाकों में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक पहरेदारी के अभियानों में सक्रिय रही है.

यह तब सुर्खियों में आई जब इसके कार्यकर्ताओं ने भारतीय संस्कृति के पश्चिमीकरण के खिलाफ अपने अभियान के तहत पार्कों, पबों और कॉलेजों में युगलों पर हमला करने की कई घटनाओं को अंजाम दिया.

2007 के आते-आते तक इसने इसी अभियान को सांप्रदायिक रंग दे दिया, जब इसके नेताओं ने कई सभाओं में लव जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल करना शुरू किया और यह सिद्धांत आगे बढ़ाना शुरू किया कि मुस्लिम पुरुष एक सोची-समझी साजिश के तहत हिंदू औरतों को फंसाते हैं, उनसे शादी करते हैं और उन्हें एक इस्लामी परियोजना के तहत इस्लाम में धर्मांतरित करते हैं. ॉइस संगठन के मुताबिक इनका असली मकसद भारत में हिंदुओं को अल्पसंख्यक समूह बना देना है.

अपनी वेबसाइट पर हिजस ने मुस्लिम युवाओं को शिकार पर निकले ‘सेक्स वुल्फ’ के समान बताया. बिना किसी सबूत के यह दावा भी किया गया कि सिर्फ कर्नाटक में ही 30,000 औरतों का इस्लाम में धर्मांतरण करवाया जा चुका है, जबकि दक्षिण कन्नड़ा में हर रोज लगभग तीन महिलाएं ‘लव जिहाद’ का शिकार होती हैं.

लेकिन अपने दावों के पक्ष में कोई भी सबूत न होने के कारण हिजस का अभियान उस तरह से परवान नहीं चढ़ सका, जैसी संघ परिवार की इच्छा थी.

लेकिन साल 2009 के कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश ने इस पद को वैधता देने का काम किया, जिसमें ‘लव जिहाद मुहिम’ की कर्नाटक और केलर पुलिस द्वारा संयुक्त जांच कराने के लिए कहा गया.

यह आदेश एक वयस्क महिला, जिसने कोर्ट में खुद कहा था कि उसने मुस्लिम पुरुष से शादी की और अपनी इच्छा से इस्लाम में धर्मांतरण करावाया, के अभिवाकों द्वारा दायर किए गए ‘हीबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका के जवाब में आया था.

दक्षिण कर्नाटक के चमाराजनगर की निवासी उस महिला के बयान के बावजूद, उसे कोर्ट द्वारा जांच रिपोर्ट आने तक अपने अभिभावकों के साथ रहने का निर्देश दिया गया.

इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक ढंग से कोर्ट ने इस इस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को राज्यभर की गुमशुदा औरतों के मामलों से जोड़ दिया. कोर्ट का कहना था कि ये गुमशुदा औरतें भी ‘लव जिहाद’ का शिकार हो सकती हैं.

एक दक्षिणपंथी टैबलॉयड ने कोर्ट के आदेश के बाद पहली बार ‘लव जिहाद’ पदावली का इस्तेमाल किया, जिसे कर्नाटक के कई अन्य दैनिक अखबारों ने लपक लिया और इस तरह से इस विचार को लोगों के बीच पहुंचाने का काम किया.

इसी समय के आसपास हिजस ने यह दावा करते हुए कि मुस्लिम यूथ फोरम और कई अन्य इस्लामिक वेबसाइटें युवाओं को ‘लव जिहाद’ का प्रशिक्षण दे रहे हैं, अपने सांप्रदायिक अभियान को और तेज कर दिया.

इन आरोपों की जांच केरल पुलिस ने की और उसे इन आरोपों में कोई दम नजर नहीं आया. बाद में केरल हाईकोर्ट ने यह कहा कि अंतरधार्मिक शादियां सामान्य बात है और उसे अपराध के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. हाईकोर्ट ने जांच को भी बंद करा दी.

दिलचस्प तरीके से 2012 में भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई द्वारा ‘लव जिहाद’ को एक राजनीतिक रणनीति के तौर पर उठाए जाने तक- इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां पितृसत्तात्मक इज्जत और जाति-बिरादरी की भावना गहरे तक जमी हुई है- हिजस ने ‘लव जिहाद’ पर नरम रवैया अपनाए रखा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ‘लव जिहाद’ अभियान तटीय कर्नाटक की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक था. यहां संघ परिवार कार्यकर्ताओं ने इस विचार का इस्तेमाल हिंदुत्व के पुराने प्रोपगेंडा को तूल देने के लिए किया, जो मुसलमानों को गोकशों, बच्चे पैदा करने की वासनामय मशीन, अपराधियों और काला बाजारियों के तौर पर पेश करता है.

इस संवाददाता ने मुज़फ्फरनगर में संघ के कई कार्यकर्ताओं से बात की, जो इस विचार को आगे बढ़ा रहे थे कि मुसलमानों का मानना है कि काफिरों के साथ विवाह करके उनके साथ शारीरिक संबंध बनाना, उन्हें जन्नत में लेकर जाएगा और अगर काबू में नहीं किया गया, तो मुसलमान जल्दी ही संख्या में हिंदुओं को पीछे छोड़ देंगे.

इस तरह की बिना किसी आधार की अफवाहें 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भी फैलाई गई थीं.

आज वर्तमान स्वरूप में ‘लव जिहाद’ अपने पहले के अनौपचारिक अवतार से कहीं बड़ा विभाजनकारी अभियान है.

इस विचार ने हिंदू पुरुषों- जो जीवनभर खुद अपने गहरे पैठे हुए, बहुपरतीय डरों से जूझते रहते हैं- को गोलबंद करने की सबसे प्रभावशाली हिंदुत्व की रणनीति के तौर पर रूपांतरित कर लिया है.

उनमें से ज्यादातर को ‘लव जिहाद’ में इस हकीकत से इनकार करने और मुस्लिमों और हिंदू दोनों ही समुदायों की महिलाओं के खिलाफ अपनी असुरक्षाओं को दिशा देने की संभावना नजर आती है.

ध्यान बंटाने के लिए भाजपा ने बनाया एजेंडा

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक की भाजपा सरकारों ने ‘लव जिहाद’ के प्रोपगेंडा को हवा देकर इस उग्र मर्दवादी सांप्रदयिक राजनीति को नई ऊंचाई तक तक ले जाने और सांस्थानीकृत करने का काम किया है.

इसके खिलाफ कानून बनाने की घोषणा हो, या राजनीतिक भाषणों में मुस्लिमों पर हमला करने के लिए इस अपमानजनक विचार को उठाना या हत्या के एक वीभत्स मामले को सांप्रदायिक रंग देना- इन सभी ने ‘लव जिहाद’ को निरंतर चर्चा में रहने वाला विषय बना दिया है- भगवा पार्टी एक पूरी तरह से बहुमतवादी समाज पर अपना शिकंजा कसने और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के अपने आजमाए फॉर्मूले पर लौट आई है.

जिस तत्परता से भाजपा नेतृत्व वाली सरकारें एक साथ इस मसले को उठा रही है, उससे साफ है कि यह सब पहले से तय है.

इसकी वजह से कम से कम, फिलहाल कुछ समय के लिए, अपने शासनकाल के सबसे कठिन दौर से गुजर रही केंद्र की मोदी सरकार बढ़ती महामारी, आर्थिक संकट और काफी तेजी से बढ़ रही बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रहने की चौतरफा असफलताओं की तरफ से जनता का ध्यान भटकाने में कामयाब रही है.

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