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रोशनी क़ानून पर पुनर्विचार याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, हाईकोर्ट से फ़ैसला लेने कहा

रोशनी क़ानून निरस्त करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर पुनर्विचार याचिकाएं सुनने से मना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो समानांतर कार्यवाही नहीं चल सकतीं. सभी याचिकाकर्ताओं को पुनर्विचार करने वाली पीठ के पास जाना चाहिए और उच्च न्यायालय को इन सभी को सुनना चाहिए.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय से कहा कि रोशनी कानून निरस्त करने के नौ अक्टूबर के निर्णय पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाओं पर फैसला करे.

गौरतलब है कि साल 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला सरकार सरकारी ज़मीन पर काबिज़ लोगों को उसका मालिकाना हक़ दिलाने के लिए रोशनी क़ानून लेकर आई थी.

साल 2014 में कैग ने इसे 25 हज़ार करोड़ का घोटाला क़रार दिया. अब जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने रोशनी क़ानून को असंवैधानिक बताते हुए सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं.

जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने जम्मू कश्मीर प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के इस आश्वासन पर विचार किया कि इस मामले में शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने वालों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी क्योंकि वे ‘सरकारी जमीन हथियाने वाले या अनधिकृत लोग’ नहीं है.

वर्ष 2001 में लागू रोशनी कानून का मकसद एक ओर बिजली परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन पैदा करना और दूसरी ओर सरकारी भूमि पर बसे लोगों को मालिकाना हक देना था.

जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय ने नौ अक्ट्रबर को रोशनी कानून को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित करते हुए इस कानून के तहत भूमि आबंटन के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था.

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘सुनवाई के दौरान हमें पता चला कि केंद्र शासित जम्मू कश्मीर और कुछ व्यक्तियों ने जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं जिन पर दिसंबर, 2020 के अंतिम सप्ताह में सुनवाई होनी है. इस तथ्य के मद्देनजर हम इन मामलों की सुनवाई जनवरी, 2021 के अंतिम सप्ताह के लिए स्थगित कर रहे हैं.’

मेहता ने पीठ को बताया कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की है और कहा है कि प्रशासन उन आम आदमियों के खिलाफ नहीं हैं जो सही हैं और जिन्होंने भूमि हथियाई नहीं है.

पीठ ने अपने आदेश में आगे कहा, ‘हम यह स्पष्ट करते हैं कि इस न्यायालय में विशेष अनुमति याचिकाएं लंबित होना उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई में बाधक नहीं होगा. अगर इस न्यायालय में याचिका दायर करने वाला कोई याचिकाकर्ता जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर करना चाहे तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है.’

शीर्ष अदालत में बृहस्पतिवार को छह याचिकाएं सूचीबद्ध थीं और मेहता के मौखिक कथन के अनुसार ब्रॉडवे एंटरप्राइसेज प्रा लि, निसार हुसैन, दानिश अमन, हाकिम सुहैल, मुहम्मद मुजफ्फर शॉल, तेजिन्दर सिंह सेठी और कुछ अन्य याचिकाकर्ता इस संरक्षण के दायरे में आयेंगे.

वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि परस्पर विरोधी आदेशों से बचने के लिए अपीलकर्ताओं को इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए उच्च न्यायालय जाना चाहिए.

पीठ ने टिप्पणी की, ‘सभी याचिकाकर्ताओं को पुनर्विचार करने वाली पीठ के पास जाना चाहिए और उच्च न्यायालय को इन सभी को सुनना चाहिए.. हम इस बारे में निर्देश देंगे.’

पीठ ने कहा, ‘उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिकाएं 21 दिसंबर के लिए सूचीबद्ध हैं. उच्च न्यायालय ने यथास्थिति बहाल कर रखी है और इसके बाद उच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिकाओं को सूचीबद्ध किया है.’

पीठ का कहना था, ‘दो समानांतर कार्यवाही कैसे चल सकती हैं? यह मामला पुनर्विचार याचिका के रूप में उच्च न्यायालय में लंबित है.’

मेहता ने कहा कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि अतिक्रमण करने वाले और भूमि हथियाने वाले उच्च न्यायालय के आदेश से छूट का दावा नहीं कर सकते.

उन्होंने पीठ से कहा, ‘भूमि हथियाने वालों को बख्शा नहीं जा सकता और साथ ही वैध संपत्ति मालिकों को बचाया जाएगा.’

एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने कानून को निरस्त करके गलत किया और उच्च न्यायालय ने रोशनी कानून से लाभान्वित लोगों को सुना भी नहीं.

इस पर पीठ ने कहा, ‘क्या आपको पता है कि उच्च न्यायालय में कुछ पुनर्विचार याचिकाएं लंबित हैं और इनमें से कुछ को संरक्षण प्रदान किया जा चुका है.’

सॉलिसिटर जनरल ने इन अपील का जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया.


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शीर्ष अदालत ने कहा कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने भी पुनर्विचार याचिका दायर की है जिसमे भू स्वामियों की दो श्रेणियां- अवैध अतिक्रमण करने वाले और असली मालिक-बनाई गई हैं.

रोहतगी ने पीठ से कहा कि इन अपील का मकसद यही है कि वैध मालिकों को उनकी जमीन के कब्जे से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए.

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि इस फैसले में अधिकृत भू स्वामियों का जिक्र नहीं है.

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश वासुदेव ने कहा कि पुनर्विचार तो कुछ लोगों तक सीमित है और शीर्ष अदालत को पुनर्विचार याचिका पर निर्णय होने तक इस मामले को विलंबित रखना चाहिए.

पीठ ने कहा, ‘हम उच्च न्यायालय को निर्देश दे रहे हैं कि उसके पास लंबित पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की जाए.’

पीठ ने इस मामले को जनवरी में सूचीबद्ध करते हुए मेहता से कहा कि उस समय तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए.

इस बारे में कोई आदेश पारित नहीं करने का अनुरोध करते हुए मेहता ने कहा, ‘मैं यहां पर आपके सामने हूं और कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी.’

मेहता ने कहा, ‘इस बारे में कोई भी आदेश भ्रम पैदा करेगा. कृपया इसे सोमवार के लिए सूचीबद्ध कर लें.’ शीष अदालत ने कहा कि इस मामले में जनवरी के अंतिम सप्ताह में सुनवाई की जाएगी.

उच्च न्यायालय ने सात दिसंबर को रोशनी कानून निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए प्रशासन की याचिका पर सुनवाई अगले सप्ताह के लिए स्थगित कर दी थी.

यह याचिका राजस्व विभाग में विशेष सचिव नजीर अहमद ठाकुर ने चार दिसंबर को दायर की थी.

न्यायालय के लगभग दो महीने पुराने फैसले में संशोधन के अनुरोध वाली याचिका में कहा गया कि इससे बड़ी संख्या में आम लोग अनायास ही पीड़ित हो जाएंगे जिनमें भूमिहीन कृषक और ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं जो स्वयं छोटे-से टुकड़े पर घर बनाकर रह रहे हैं.

याचिका के मुताबिक, लाभार्थियों में से आम लोगों और जमीन पर कब्जा जमाने वाले अमीर लोगों के बीच फर्क करने की आवश्यकता है. साथ ही भूमिहीन मजदूरों अथवा ऐसे लोगों को आवंटित भूमि का कब्जा बरबरार रखने की अनुमति का पक्ष लिया गया जोकि खुद ही उस जमीन पर घर बनाकर रह रहे हैं.

रोशनी कानून वर्ष 2001 में लागू किया गया था, जिसके तहत राज्य में करीब 20.55 लाख कनाल (करीब 1,02,750 हेक्टेयर) सरकारी जमीन पर रहने वाले लोगों को इसका मालिकाना हक देने की योजना थी और यह मालिकाना हक देने के लिए सिर्फ 15.85 प्रतिशत भूमि ही मंजूर की गई थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)