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एमनेस्टी ने भारत में बैंक खातों पर रोक को कामकाज बंद करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की शीर्ष अधिकारी ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों पर अमेरिकी संसद की सुनवाई के दौरान आरोप लगाया कि एक साल तक भारत सरकार द्वारा जारी धमकियां, एमनेस्टी इंडिया के दफ़्तरों पर हमले, कर्मचारियों और बोर्ड के सदस्यों से पूछताछ आदि के बाद यह कदम उठाया गया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया का बेंगलुरु स्थित दफ़्तर. (फोटो: पीटीआई)

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया का बेंगलुरु स्थित दफ़्तर. (फोटो: पीटीआई)

वॉशिंगटन: मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक शीर्ष अधिकारी ने आरोप लगाया है कि भारत में संगठन के बैंक खातों से लेन-देन पर रोक लगाए जाने के बाद उसे वहां से अपने सभी कर्मचारियों को हटाने और सभी मानवाधिकार कार्यों को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

एमनेस्टी इंटरनेशनल यूएसए में ‘एडवोकेसी एंड गवर्नमेंट अफेयर्स’ की राष्ट्रीय निदेशक जोआन लिन ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों पर अमेरिकी संसद की सुनवाई के दौरान ये आरोप लगाए.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सुनवाई के दौरान लिन ने बताया कि बैंक खातों पर रोक लगाए जाने के कारण एमनेस्टी इंडिया को 2020 में अपने सारे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देना पड़ा और तमाम मानवाधिकार कार्यों को रोकना पड़ा.

उन्होंने बताया कि एक साल तक सरकार द्वारा जारी धमकियां, एमनेस्टी इंडिया के दफ्तरों पर हमले, कर्मचारियों और बोर्ड के सदस्यों से पूछताछ आदि के बाद यह कदम उठाया गया.

लिन ने कहा, ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एमनेस्टी इंटरनेशनल को बंद करने पर मजबूर करके दुनिया भर में नागरिक समाज को एक खतरनाक संदेश पहुंचाया गया.’

वहीं, रिपब्लिकन कांग्रेस के एक सदस्य ने इसे एक दुखद परिणाम बताया.

अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य क्रिस्टोफर स्मिथ ने कहा, ‘यह बहुत ही निराशाजनक परिणाम है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को बाहर का रास्ता दिखा दिया.’ उन्होंने भारत के हालात पर और जानकारी भी मांगी.

बता दें कि बीते सितंबर महीने में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में अपना काम बंद किया था और इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया था.

एमनेस्टी ने यह कदम प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उसके खातों को फ्रीज किए जाने के बाद उठाया था.

कथित तौर पर विदेशी चंदा विनियमन कानून (एफसीआरए) के उल्लंघन के आरोपों में 5 नवंबर, 2019 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा एक एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद ईडी ने पिछले साल इस मामले में अलग से जांच शुरू की थी.

एमनेस्टी ने आरोप लगाया था कि सरकार उसे परेशान कर रही है. हालांकि, एमनेस्टी के आरोपों पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा था कि मानवीय कार्यों और सत्ता से दो टूक बात करने के बारे में दिए गए सुंदर बयान और कुछ नहीं, बल्कि संस्था की उन गतिविधियों से सभी का ध्यान भटकाने का तरीका है, जो भारतीय कानून का सरासर उल्लंघन करते हैं.

भारत के गृह मंत्रालय ने अक्टूबर में कहा था कि संगठन का यह दावा कि उसे चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया गया, दुर्भाग्यपूर्ण है और बढ़ा-चढ़ा कर कही गई बात है जो सच्चाई से कोसों दूर है.

मालूम हो कि ह्यूमन राइट्स वाच सहित 15 अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी कर एमनेस्टी इंटरनेशनल को भारत में अपना काम बंद करने के लिए मजबूर किए जाने की आलोचना की थी.

इन्होंने अपने बयान में आगे कहा था, ‘हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने एमनेस्टी इंडिया पर विदेशी फंडिंग के लिए कानून तोड़ने का आरोप लगाया है. इस आरोप को समूह ने राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है और सबूत पेश किया कि सरकार के गलत कामों और ज्यादतियों को मानवाधिकार संगठनों और समूहों ने चुनौती दी तब उन्होंने दुर्भावनापूर्ण तरीके से कानूनी प्रताड़ना शुरू कर दी.’

इसके अलावा एमनेस्टी इंटरनेशनल के भारत में काम बंद करने पर यूरोपीय संघ (ईयू) ने चिंता जताते हुए कहा था कि वह दुनिया भर में एमनेस्टी इंटरनेशनल के काम को बहुत महत्व देता है.

यूरोपीय संघ की प्रवक्ता नबीला मसराली ने भारत सरकार से संगठन को देश में काम करने की अनुमति देने की अपील की थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)