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केरल के पत्रकार की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ पत्रकार संगठन की याचिका पर जनवरी में होगी सुनवाई

यूपी पुलिस ने बीते अक्टूबर में हाथरस जा रहे केरल के एक पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन समेत चार युवकों को गिरफ़्तार किया था. राज्य सरकार ने कोर्ट में दावा किया है कि कप्पन पत्रकार नहीं, बल्कि अतिवादी संगठन पीएफआई के सदस्य हैं. केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

माकपा नेता सीताराम येचुरी के साथ केरल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के सदस्य. (फोटो: पीटीआई)

माकपा नेता सीताराम येचुरी के साथ केरल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के सदस्य. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक दलित युवती से कथित सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद वहां जाते समय मथुरा में केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन की गिरफ्तारी पर सवाल उठाने वाली ‘केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स’ (केयूडब्ल्यूजे) की याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट जनवरी के तीसरे सप्ताह में सुनवाई करेगा.

सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामासुब्रमणियन की पीठ ने सोमवार को पत्रकार संघ को इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त शपथ-पत्र का जवाब दायर करने का अवसर देते हुए मामले की आगे की सुनवाई के लिए अगले साल की तिथि तय की.

पीठ ने केयूडब्ल्यूजे की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया कि शीतकालीन अवकाश के बाद न्यायालय का कामकाज पुन: आरंभ होने पर जनवरी के तीसरे सप्ताह के बजाय पहले सप्ताह के लिए मामले को सूचीबद्ध किया जाए.

पीठ ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिये सुनवाई के दौरान कहा कि पहले दो सप्ताह में अन्य काम होते हैं (जिनमें नए मामलों की सुनवाई होती है).

इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यायालय से कहा था कि कप्पन की गिरफ्तारी से संबंधित मामले में अब तक की जांच से बेहद चौंकाने वाली जानकारियां मिली हैं.

पीठ के समक्ष सरकार ने कहा, ‘कप्पन का दावा है कि वह केरल के एक दैनिक अखबार के पत्रकार के रूप में काम करते हैं जबकि यह अखबार दो साल पहले ही बंद हो चुका है.’

पीठ ने याचिकाकर्ता संस्था से जानना चाहा कि क्या वह हाईकोर्ट जाना चाहेंगे. इस पर संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि वह शीर्ष अदालत में ही इस मामले में बहस करेंगे और याचिकाकर्ता कप्पन की पत्नी तथा अन्य को भी इसमें शामिल करेंगे.

सिब्बल ने कहा, ‘हाईकोर्ट ने इसी मामले में एक अन्य आरोपी की बंदीप्रत्यक्षीकरण (हीबियस कॉर्पस) याचिका पर एक महीने का समय दिया है और इसलिए मैं यहीं पर बहस करना चाहता हूं. मुझे यहीं पर सुनिए.’

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाल ही में अपने हलफनामे में दावा किया था कि कप्पन पत्रकारिता की आड़े में जातीय कटुता और कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने की योजना से हाथरस जा रहे थे.

इसके जवाब में याचिकाकर्ता संगठन ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में पुलिस के इस दावे को ‘पूरी तरह गलत और झूठा’ बताया कि सिद्दीकी कप्पन पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया का कार्यालय सचिव हैं. संगठन ने दावा किया है कि कप्पन सिर्फ पत्रकार के रूप में ही काम करते हैं.

बता दें कि, हाथरस के एक गांव में 14 सितंबर एक दलित युवती से कथित रूप से सामूहिक बलात्कार हुआ था. इस घटना में बुरी तरह जख्मी युवती की बाद में सफदरजंग अस्पताल में मृत्यु हो गई थी.

मृतका का रात में ही उसके परिजनों की कथित तौर पर सहमति के बगैर ही अंतिम संस्कार कर दिया गया था जिसे लेकर जनता में जबर्दस्त आक्रोश व्याप्त हो गया था.

इसके बाद पांच अक्टूबर को हाथरस जाते समय रास्ते में पत्रकार सिद्दीक कप्पन को गिरफ्तार किया गया था. वह  कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार की पीड़ित दलित युवती के घर जा रहे थे.

पुलिस ने कहा था कि उन्होंने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से संबंध रखने वाले चार लोगों को मथुरा में गिरफ्तार किया है, जिनके नाम मल्लापुरम के कप्पन सिद्दीक, मुजफ्फरनगर के अतीकुर रहमान, बहराइच के मसूद अहमद और रामपुर के आलम हैं.

इन गिरफ्तारियों के चंद घंटे बाद ही केरल पत्रकारों के संगठन ने सिद्दीक की पहचान केरल के मल्लापुरम निवासी सिद्दीक कप्पन के रूप में की और कहा कि वह दिल्ली स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

उनके खिलाफ मांट थाने में आईपीसी की धारा 124 ए (राजद्रोह), 153 ए (दो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने) 295 ए (धार्मिक भावनाएं आहत करने), यूएपीए की धारा 65, 72 और आईटी एक्ट की धारा 76 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

दरअसल, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि ईडी को पीएफआई से जुड़े एकाउंट में सौ करोड़ रुपये डाले जाने की बात मालूम चली है, इसमें से पचास करोड़ मॉरीशस से आए हैं और अब एजेंसी इसके स्रोत और उद्देश्य की जांच कर रही है.

हालांकि, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हाथरस गैंगरेप को लेकर विरोध प्रदर्शन करवाने के लिए 100 करोड़ की फंडिंग सामने आने की बात को झूठ बताया था.

पीएफआई पर पहले भी इस साल के शुरू में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देशव्यापी विरोध के लिए धन मुहैया कराने के आरोप लगा था.