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भीमा-कोरेगांव: निषेधाज्ञा लागू, वर्षगांठ पर युद्ध स्मारक के नज़दीक बाहरियों के जाने पर रोक

हर साल एक जनवरी को दलित वर्ष 1818 की जंग की वर्षगांठ मनाते हैं, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के जवानों ने दलित सैनिकों के साथ मिलकर पुणे के पेशवा की सेना को पराजित किया था. पुणे के पेरने गांव में भीमा-कोरेगांव की जंग की स्मृति में ‘जय स्तंभ’ बना है, वर्षगांठ पर यहां स्मृति कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

भीमा-कोरेगांव में बना विजय स्तंभ. भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में पेशवा बाजीराव द्वितीय पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने जीत दर्ज की थी. इसकी याद में कंपनी ने विजय स्तंभ का निर्माण कराया था, जो दलितों का प्रतीक बन गया. कुछ विचारक और चिंतक इस लड़ाई को पिछड़ी जातियों के उस समय की उच्च जातियों पर जीत के रूप में देखते हैं. हर साल 1 जनवरी को हजारों दलित लोग श्रद्धाजंलि देने यहां आते हैं. (फोटो साभार: विकीपीडिया)

जय स्तंभ. (फोटो साभार: विकीपीडिया)

पुणे: महाराष्ट्र में पुणे जिला प्रशासन ने पेरने गांव और उसके आसपास धारा 144 लगाने का आदेश जारी किया है, जहां भीमा-कोरेगांव की जंग की स्मृति में ‘जय स्तंभ’ बना हुआ है. प्रशासन के आदेश के अनुसार, बाहरी लोगों के इस युद्ध स्मारक के पास पर रोक रहेगी.

हर साल एक जनवरी को दलित वर्ष 1818 की जंग की वर्षगांठ मनाते हैं, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के जवानों ने दलित सैनिकों के साथ मिलकर पुणे के पेशवा की सेना को पराजित किया था. इस मौके पर यहां स्मृति कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

दलित इस जीत को उत्पीड़ित समुदायों के आत्म-सम्मान वापस पाने की शुरुआत के रूप में मनाते हैं.

हालांकि जिले के अधिकारी ने कहा कि कोविड-19 हालात के चलते एक जनवरी से पहले इलाके में लोगों की आवाजाही पर पाबंदी लगाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 लागू कर दी जाएगी.

उन्होंने कहा कि 30 दिसंबर मध्यरात्रि से दो जनवरी 2021 तक इलाके में धारा 144 लागू रहेगी और बाहरी लोगों के युद्ध स्मारक के आसपास के गांवों में प्रवेश करने पर रोक रहेगी.

इससे पहले प्रशासन ने लोगों से महामारी के चलते घरों में रहकर ही श्रद्धांजलि देने की अपील की थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पेरने गांव के अलावा इस आदेश के तहत लोनीखंड थाना क्षेत्र में आने वाले तुलापुर, बकोरी, वाधू खुर्द, केसनंद, कोलवाड़ी, डोंगरगांव, फूलगांव और शिक्रपुर थाना क्षेत्र के तहत आने वाले भीमा कोरेगांव, डिगराजवाड़ी, सनासवाड़ी, वाधू बुदरुक, पिंपल जगताप, वाजेवाड़ी अप्ती, वाडेगांव आदि गांवों में भी इस अवधि तक बाहरियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है.

जय स्तंभ के पास या इन गांवों में बुक स्टॉल, फूड स्टॉल, बैनर, बोर्ड, होर्डिंग आदि लगाने के अलावा जनसभा, रैली और मार्च निकालने की भी अनुमति नहीं है.

जिला प्रशासन ने चेतावनी दी है कि इस संबंध में सोशल मीडिया अफवाह पर फैलाते हुए या गलत जानकारी साझा करते हुए किसी को पाया गया तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

जो लोग जिला कलेक्टर के आदेश का उल्लंघन करेगा उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 188 और महामारी अधिनियम की धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

मालूम हो कि एक जनवरी 2018 को वर्ष 1818 में हुई कोरेगांव-भीमा की लड़ाई को 200 साल पूरे हुए थे. इस दिन पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव में दलित समुदाय के लोग पेशवा की सेना पर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की जीत का जश्न मनाते हैं.

2018 में इस दिन दलित संगठनों ने एक जुलूस निकाला था, जिस दौरान हिंसा भड़क गई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. पुलिस का आरोप है कि 31 दिसंबर 2017 को हुए एल्गार परिषद सम्मेलन में भड़काऊ भाषणों और बयानों के कारण भीमा-कोरेगांव गांव में एक जनवरी को हिंसा भड़की.

अगस्त 2018 को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंजाल्विस को गिरफ़्तार किया था.

महाराष्ट्र पुलिस का आरोप है कि इस सम्मेलन के कुछ समर्थकों के माओवादी से संबंध हैं. इससे पहले महाराष्ट्र पुलिस ने जून 2018 में एल्गार परिषद के कार्यक्रम से माओवादियों के कथित संबंधों की जांच करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत को गिरफ्तार किया था.

केंद्र ने 24 जनवरी को इस मामले को पुणे पुलिस से लेकर एनआईए को सौंपी थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)