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योगी सरकार के अंतरधार्मिक विवाहों को निशाना बनाने के पीछे मनु के आदर्श फैलाने की मंशा है

योगी आदित्यनाथ सरकार के नए क़ानून का उद्देश्य केवल ध्रुवीकरण नहीं बल्कि स्त्रियों को उनके अधिकारों और अपने लिए निर्णय लेने की उनकी क्षमता से उन्हें वंचित करना भी है.

योगी आदित्यनाथ (फोटो साभार: ट्विटर//@myogiadityanath)

योगी आदित्यनाथ (फोटो साभार: ट्विटर//@myogiadityanath)

योगी आदित्यनाथ, भाजपा के तमाम मुख्यमंत्रियों में हिंदुत्व के एजेंडा के प्रति सबसे अधिक कटिबद्ध हैं. वे विकास की बात तो करते हैं लेकिन उनकी सरकार ने केवल अल्पसंख्यकों और दलितों को अपने हमलों का निशाना बनाया है, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लगातार गहरा किया है, किसानों और मजदूरों के अधिकारों का हनन किया है.

उनके शासनकाल में महिलाओं रोज़ अकल्पनीय हिंसा की शिकार बनाई जा रही हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और उनको न्याय दिलाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है.

गायों की सुरक्षा के नाम पर आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनते ही मीट के समूचे धंधे को ही तबाह कर दिया. पशुओं का व्यापार बंद हो गया और चमड़ा उद्योग भी ठप पड़ गया.

मुसलमानों की ज़िंदगी और आजीविका पर विपरीत असर तो पड़ा ही, उनमें से सैकड़ों को रासुका जैसे कठोर कानूनों के अंतर्गत जेलों में बंद किया गया है, कुछ को जान से मारा भी गया.

यह सब केवल तस्करी करने या जानवर काटने के शक के आधार पर किया गया है. लेकिन लाखों दलितों की जीविका भी बिल्कुल नष्ट कर दी गई. किसानों का पशु व्यापार तो बिल्कुल बंद ही हो गया है, आवारा पशु उनकी फसलों का नाश भी कर रहे हैं.

ऐसा नहीं कि जानवरों का कटना बंद हो गया है. मीट के निर्यात के बड़े कारखानों मे काम धड़ल्ले से हो रहा है. इनके मालिक भी बड़ी संख्या में भाजपा के नेता हैं.

जानवरों से संबंधित जिस कमाई में लाखों गरीबों का हिस्सा होता था, वह अब कुछ ही बड़े पूंजीपतियों के हाथों में जा रही है. गोरक्षा के दावों के पीछे छुपा बड़े खेल को गरीब दलित, मजदूर और किसान समझ ही नहीं पा रहे हैं.

मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच होने वाली शादियां आदित्यनाथ को विशेष रूप से क्रोधित करती हैं. मार्च 2017 में उनके मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद मेरठ मे इस तरह के एक दंपति पर उनकी अपनी हिंदू युवा वाहिनी की तरफ से हमला किया गया था.

फिर इसी साल 2 मई को बुलंदशहर की एक हिंदू महिला एक मुस्लिम पुरुष के साथ चली गई, उसके बाद मचे बवाल के दौरान एक मुस्लिम पुरुष, जो इन लोगों को जानता ही नहीं था, को मार डाला गया.

ज़ाहिर है कि इन हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई और फिर तो इस तरह के कई हमले हुए.

2020 के अगस्त के महीने मे कानपुर से कई अंतरधार्मिक विवाहों की खबरें आने लगीं. आदित्यनाथ ने ज़िले के अधिकारियों को फटकार लगाई और उन्हें इस ‘लव जिहाद’ के अभियान को रोकने के सख्त निर्देश दिए.

हिन्दी के कई अखबार विवाद में कूद पड़े और उन्होने आग लगाने वाले ‘खुलासे’ किए. इसमें उन्हें आईएसआई का हाथ दिखाई दिया.

हवाला के माध्यम से आने वाली विदेशी मुद्रा का राज़ भी उन्होंने खोला और इस बात को साबित करने में जुट गए कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को फंसाने की एक साजिश पर काम कर रहे थे.

यह भी कहा गया कि यह लड़के खुद को हिंदू भी बताते थे. बजरंग दल ने कई उग्र प्रदर्शन किए और प्रशासन को एसआईटी जांच बिठाने के लिए मजबूर कर दिया गया.

इस एसआईटी की रिपोर्ट नवंबर में आई और उसके नतीजों के बारे मे आईजी ने एक प्रेस वार्ता के माध्यम से सूचना दी कि कहीं भी किसी साजिश के प्रमाण नहीं मिल पाए थे और अधिकतर लड़कियां जो बालिग थी, अपनी मर्ज़ी से उन लड़कों के साथ गईं थी और उन्हीं के साथ रहना चाहती हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ‘लव जिहाद’ जैसी किसी चीज़ का सबूत नहीं मिल पाया.

इसी बीच 24 सितंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस त्रिपाठी ने एक अजीब फैसला सुना दिया. उनसे सुरक्षा की गुहार लगाने एक हिंदू पुरुष और मुस्लिम महिला पहुंचे थे.

उनकी गुहार को अनसुना करते हुए त्रिपाठी जी ने फैसला यह सुना दिया कि शादी करने की नीयत से अगर धर्म परिवर्तन होता है तो फिर वह शादी ही अवैध है.

आमतौर पर जब मुस्लिम महिला की शादी हिंदू पुरुष से होती है, तब संघ परिवार उसे पसंद करता है. फिर भी आदित्यनाथ ने अपने मतलब की बात को इस फैसले से निकालकर घोषणा कर दी कि अब अगर मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं के साथ शादी रचाएंगे तो उन्हें कानूनी तौर पर दंडित किया जाएगा और उनका ‘राम नाम सत्य भी कर दिया जाएगा.’

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

संयोग से अगले महीने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो अलग खंडपीठों ने जस्टिस त्रिपाठी से बिल्कुल अलग तरह के निर्णय दिए.

2 नवंबर को एक समलैंगिक दंपति सुरक्षा की मांग लेकर जब न्यायालय के सामने आया, तो न्यायाधीश महोदय ने कहा कि चूंकि उनका रिश्ता कानूनी है इसलिए उन्हें प्रशासन और पुलिस की ओर से पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए.

11 नवंबर को एक अंतरधार्मिक दंपति जब न्यायालय के सामने सुरक्षा की मांग लेकर आया, तो न्यायाधीशों ने बहुत ही स्पष्ट फैसला सुनाया. उन्होने कहा,

‘हम प्रियंका खरवार और सलामत को हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं बल्कि दो बालिग व्यक्तियों के रूप में देखते हैं जो अपनी इच्छा से एक साथ, शांतिपूर्ण तरीके से खुशी से रह रहे हैं…न्यायालय और खास तौर से संवैधानिकअदालतों पर भारत के संविधान की धारा 21 द्वारा इस बात की ज़िम्मेदारी डाली गईं है कि वे व्यक्ति की ज़िंदगी और आज़ादी को सुरक्षित करें.

अपनी इच्छानुसार, किसी भी धर्म के किसी भी व्यक्ति के साथ रहना व्यक्ति की आज़ादी और जीवन के अधिकारों मे निहित है. व्यक्तिगत रिश्तों मे हस्तक्षेप करना दो व्यक्तियों के चुनाव करने की आज़ादी के अधिकार मे अतिक्रमण होगा… दो बालिग व्यक्तियों जो अपनी स्वेच्छा से एक साथ रह रहे हैं, उनके रिश्ते के प्रति किसी व्यक्ति या परिवार या राज्य को भी आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है… ’

आदित्यनाथ के लिए संवैधानिक नियमों की कोई अहमियत ही नहीं है. हिंदू धर्म को त्यागकर धर्म परिवर्तन करना और हिंदू महिलाओं व मुस्लिम पुरुषों के बीच विवाह होना संघ परिवार और उनकी नज़रों में इस तरह के भयानक पाप हैं, जिनकी सज़ा भी उतनी ही भयानक होनी चाहिए.

और इसी सोच को अंजाम देने के लिए 28 नवंबर को उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन निरोधक अध्यादेश पारित किया गया. तब से अंतरधार्मिक विवाह करने वाली हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों को अमानवीय यातनाएं दी जा रही है.

इनमें ऐसे लोग भी हैं, जिनकी शादी अध्यादेश के पारित होने से पहले ही हो चुकी थीं. पति-पत्नियों को ज़बरदस्ती एक दूसरे से अलग कर दिया गया है.

मुस्लिम पतियों और उनके रिश्तेदारों को मारपीट कर जेल में ठूंसा गया है. एक गर्भवती महिला का कहना है कि उसके साथ लोगों ने धक्का-मुक्की की और अस्पताल मे ज़बरदस्ती उसका गर्भपात कर दिया गया.

एक दूसरी गर्भवती महिला है जिसे अस्पताल के अंदर उसके परिवार ने अपने निगरानी में ले लिया है और गर्भ गिराने पर तुले हुए हैं. कई महिलाओं को उनके रिश्तेदारों द्वारा घसीटे जाने, कई युवकों की लात-जूतों की मार खाती तस्वीरें सामने आई हैं.

इस बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुछ राहत पहुंचाने का काम किया है. अध्यादेश पारित होने के एक दिन बाद नदीम नाम के व्यक्ति के खिलाफ पुलिस ने इसके उल्लंघन के जुर्म में एफआईआर दर्ज की थी. 18 दिसंबर को न्यायालय ने उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी.

उनके वकील ने अध्यादेश को गैर-कानूनी घोषित करने की याचिका भी न्यायालय के सामने रखी और न्यायाधीशों ने प्रदेश की सरकार से इस पर जवाब मांगा है. सुनवाई के लिए 7 जनवरी तय हुई है.

उसी दिन एक अन्य न्यायालय में भी इस अध्यादेश को चुनौती दी गई और अब दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ होगी.

लेकिन 7 जनवरी तक सरकार को ज़ुल्म ढाने के लिए काफी समय मिल गया है. और ऐसा करने मे आदित्यनाथ की सरकार कोई कसर बाकी छोड़ नहीं रही है.

नदीम के मामले मे उच्च न्यायालय के फैसले के बाद एक मुस्लिम पति और उसके भाई की जमानत होने के बाद सरकार पूरी तरह से मुस्लिम पतियों और उनके परिवारों पर बरस पड़ी है.

मैनपुरी के एक मामले में पति के साथ उसके 4 रिश्तेदार जेल भेज दिए गए हैं और अन्य रिश्तेदारों के बारे मे सूचना देने वाले को 25000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया गया है. हिंदू पत्नियों को तो ज़बरदस्ती सुरक्षा गृहों या उनके परिवारों के हवाले करने की कार्यवाहियां जारी हैं.

आदित्यनाथ के दमनकारी कदमों से कई मुसलमान युवकों का उत्पीड़न किया जा रहा है, लेकिन इनके चलते कई हिंदू महिलाओं पर असहनीय हमले भी किए जा रहे हैं.

फिर भी बैरी बना समाज, दुश्मन बने घर वाले, धमकी देने वाले बजरंग दल के लोग, अन्याय पर उतारू पुलिस-प्रशासन, इन सबका अद्भुत हिम्मत और निष्ठा के साथ यह हिंदू महिलाएं मुक़ाबला कर रही हैं, जिसके लिए उनकी दाद दी जानी चाहिए.

अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को सुरक्षित रखने की लड़ाई वे केवल अपने लिए ही नहीं तमाम महिलाओं के लिए लड़ रही हैं.

इतिहास का अध्ययन बताता है कि जीवनसाथी का चुनाव करने के महिलाओं के अधिकार को दुनिया भर में नियंत्रित किया गया है. लेकिन हमारे समाज में इसका विरोध सबसे ज़्यादा हिंसात्मक तरीके से हुआ और आज भी हो रहा है.

हमारे संविधान ने महिला अधिकारों के लिए लंबे और कठिन संघर्षो के बाद इस अधिकार को मान्यता दी थी, लेकिन आज भी इस अधिकार के फायदा उठाना अधिकतर भारतीय महिलाओं के लिए कठिन और खतरनाक है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

आज भी भारतीय समाज वर्णाश्रम धर्म की गिरफ्त में है और इस सामाजिक प्रणाली को ज़िंदा रखने के लिए महिलाओं का अपनी जाति के अंतर्गत शादी करना अनिवार्य है.

कितनी विडंबना है कि एक ऐसी प्रणाली को ज़िंदा रखने के लिए, जो उनकी और अधिकतर अन्य भारतीयों की असमानता को बनाए रखता है, महिलाओं को अपने अधिकारों की बलि चढ़ानी पड़ती है.

यही नहीं, वे अपने इस कर्तव्य को निभाएंगी, इसको सुनिश्चित करने के लिए उन्हें तमाम बंधनों में जकड़ दिया जाता है. उनके अन्य अधिकारों के आधार पर जीना भी दूभर कर दिया जाता है.

वर्णाश्रम धर्म और उसको मजबूती और धार्मिक मान्यता प्रदान करने वाली मनुस्मृति के प्रति अपनी श्रद्धा को आरएसएस ने संविधान के पारित होने के तुरंत बाद 1949 में ही घोषित कर दिया था.

संविधान के प्रति उसकी अवहेलना और मनुस्मृति के प्रति उसकी श्रद्धा उसे महिलाओं के अधिकारों का सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी बनाता है.

समाज के बड़े हिस्से मे मनुवादी सोच का प्रभाव, खास तौर से उसके द्वारा महिलाओं और कामकाजी और शोषित वर्गों मे शामिल जातियों के अधिकारों पर किए गए आक्रमण को वे पसंद करते हैं.

समाज के अंदर व्यापक पैमाने पर मौजूद मनुवादी विचारधारा संघ परिवार को संवैधानिक अधिकारों का हनन करने में मदद करती है. उसके यह हमले केंद्र और कई राज्यों मे भाजपा की सरकारें बनने के बाद बहुत तेज़ और विस्तृत हुए हैं.

मनुस्मृति द्वारा उन महिलाओं के बच्चों को बहुत ही घृणित माना गया है, जो अपने से निचले दर्जे के पुरुषों से शादी करती हैं. म्लेछों के साथ पैदा किए गए बच्चों के बारे में तो ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसे दोहराना संभव नहीं है.

यही नहीं, इस तरह की शादियां करने वाली महिलाओं को बुरी तरह से प्रताड़ित करना, मार डालना, कुत्तों को खिला देना उचित ठहराया गया है. उस जमाने में मौजूद हूण और यवन लोगों को म्लेच्छ कहा जाता था और उन्हें समाज से बिल्कुल बाहर करके देखा जाता था. बाद में मुसलमानों के लिए यही शब्द इस्तेमाल में आया.

संघ परिवार वर्णाश्रम धर्म मे किसी प्रकार की त्रुटि को स्वीकार नहीं करता है, इसीलिए वह नहीं मानता कि इस्लाम और ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले करोड़ों कामकाजी जातियों के हिंदुओं ने ऐसा वर्णाश्रम धर्म के उत्पीड़न और अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए किया था.

इस तथ्य को तमाम लोग जिनमें विवेकानंद भी शामिल है, स्वीकार ही करते हैं और इन अत्याचारों और उत्पीड़न की बहुत ही कटु शब्दों में आलोचना भी करते हैं. लेकिन संघ परिवार इस सच्चाई से इनकार कर धर्म परिवर्तन का कारण घूस और धौंस को ठहराता है.

जहां भी उसकी सरकार बनती है, वहां वह धर्म-परिवर्तन के खिलाफ कानून बना डालता है जैसे कि वह अपने ही अतीत पर लगे कलंक को मिटाने पर आमादा है.

मनुस्मृति महिलाओं और उनकी भूमिका के बारे में बहुत स्पष्ट है. महिलाओं को हमेशा किसी पुरुष के नियंत्रण में रहना चाहिए. उनके पास संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. चूंकि वे सही निर्णय लेने के काबिल ही नहीं हैं, इसलिए उनको हर समय नियंत्रित और घेरे के अंदर रखना ज़रूरी है.

संघ परिवार का ‘लव जिहाद’ के बारे में प्रचार अभियान भी हिंदू औरतों को बुद्धू, आसानी से बेवकूफ बनने वाली और बच्चों जैसे भोली ठहराता है. बिल्कुल मनुस्मृति की तरह!

और, इतनी सदियों के बाद, दोनों का लक्ष्य एक है- हिंदू महिलाओं को अपने अधिकारों से वंचित रखकर उन्हें अपने प्राथमिक कर्तव्य का पालन करने के लिए मजबूर करना और वह है वर्णाश्रम धर्म की पवित्रता को बचाए रखना.

पूरे संघ परिवार में आदित्यनाथ मनु के क़ानूनों के सबसे कठोर और निर्मम समर्थक हैं. उत्तर प्रदेश में महिलाओं के अधिकारों, आजीविका और सुरक्षा पर सबसे भयानक हमले देखने को मिलते हैं. जनवादी अधिकारों, मजदूरों और किसानों के अधिकारों पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं.

इन कड़वी सच्चाइयों को छिपाने के लिए पूर्वधारणाओं, घृणा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दीवारों को लगातार ऊंचा किया जा रहा है. प्रभावशाली संघर्षों की शुरुआत इन दीवारों को गिराकर ही शुरू होगी.

(सुभाषिनी अली पूर्व सांसद और माकपा की पोलित ब्यूरो सदस्य हैं.)

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