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कोरोना को लेकर भारत का रवैया दिखाता है कि ‘साइंस सुपरपावर’ बनने का सपना अभी बहुत दूर है

कैसे कोई देश एक ‘साइंस सुपरपावर’ हो सकता या ऐसा होने की इच्छा भी रख सकता है, अगर इसका राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह से और शायद जानबूझकर, यह न समझता हो कि विज्ञान किस शय का नाम है.

(फोटोः रॉयटर्स)

(फोटोः रॉयटर्स)

नोवल कोरोना वायरस बहुत तेजी से फैला, यूं तो यह लोगों के जरिये फैलता है और लोग सरहदों से बंधे हुए हैं, मगर इस  वायरस पर सरहदों की बंदिश काम नहीं आई और चीन की कोविड-19 महामारी बहुत जल्दी वैश्विक महामारी में तब्दील हो गई.

ठीक इसी तरह से इस बारे में बात करने की कोई तुक नहीं है कि इस वैश्विक महामारी को किसी खास अवधि- इस मामले में साल 2020 की घटना के तौर पर सीमित करके देखा जाए. इस वायरस जनित रोग का नाम ही इसका गवाह है: कोविड-19, जिसकी खोज 2019 में हुई लेकिन इसका कहर मुख्य तौर पर 2020 में बरपा और आने वाले महीनों में भी इसका कहर जारी रहेगा.

हालांकि, जब यह वायरस आसानी से समय और जगह की सीमाओं को लांघ रहा है, इसके प्रभाव को भी इसी तरह टुकड़ों में बांटकर देखना उपयोगी हो सकता है. इस तरह से हमें इन टुकड़ों पर इसके प्रभावों की तुलना और उनमें अंतर मालूम करने का मौका मिल सकता है. क्योंकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत कई मायनों में विसंगतियों के साथ था.

मिसाल के लिए, जब मैंने यह सुना कि सीरम इंस्टिट्यूट के कोविशील्ड कोविड वैक्सीन कैंडिडेट ट्रायल में हिस्सा लेने वाले एक शख्स ने कंपनी पर 5 करोड़ का मुकदमा किया है, तो मेरे दिमाग में पहला ख्याल यही आया कि ‘आखिर भारत में कोई भी एक चीज योजना मुताबिक क्यों नहीं चल सकती? क्यों हर चीज में कुछ न कुछ झमेला होना जरूरी है?’

कोविड-19 महामारी के इस दौर में पत्रकारों को लगातार मुस्तैद रहना पड़ा और वे कभी भी चैन से नहीं बैठ पाए- इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहा कि एक अक्षम शासन ने उन्हें इस स्थिति में डालने का काम किया.

हालांकि पिछले दस महीनों के दौरान कई पत्रकारों और संपादकों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण मौके पर जिस श्रेष्ठ पत्रकारिता का प्रदर्शन किया और सत्ताधारी पार्टी और इसके सिपाहियों के उग्र प्रतिरोध के बावजूद जिस बुद्धिमानी से वैज्ञानिक विचारों और फैसलों को सामाजिक और

यह उनके काम का ही नतीजा था कि महामारी की आड़ में नाकामियों को छिपाने की सरकार की कोशिशों पर से जल्दी ही परदा उठ गया.

लेकिन, एक हकीकत यह है कि इनमें से कई रपटों की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी- क्योंकि वे ऐसे कदमों और नीतियों का नतीजा थीं, जिन्हें जल्दी ही सुधारा जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अक्सर इसलिए क्योंकि सरकारी अधिकारियों ने झूठ बोला था.

सीरम इंस्टिट्यूट का मामला ऐसी ही विफलता का एक ताजा उदाहरण है, खासतौर पर यह देखते हुए कि ट्रायल में शामिल हुए अन्य कैंडिडेट्स भी संभावित रूप से वैक्सीन से संबंधित नकारात्मक प्रभावों के बारे में जानकारी न दिए जाने को लेकर कंपनी और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं.

अन्य उदाहरणों में मनिपाल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को बंद करना, शुरुआती सीरो प्रीविलेंस सर्वे के नतीजे, एंडीबॉडी टेस्टिंग किटो की मंजूरी, ड्रग एवं वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल से संबंधित ब्यौरे, महामारी विशेषज्ञों की रायों को नजरअंदाज करना, लॉकडाउन और रोकथाम को लेकर फैसले, आयुष मंत्रालय द्वारा जारी की गई अनेक अधिसूचनाएं, रेड और ऑरेंज जोन को लेकर भ्रम, प्रेस कॉन्फ्रेंसों में बेवकूफी भरे बयान, जिनमें महामारी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश शामिल है और सबसे यादगार ढंग से हाइड्रॉक्सोक्लोरोक्वीन, रेमडेसिविर, फैवियापिर, आइटोलाइजुमैब, तोसिलिजुमैब को इनके कारगर होने के पक्ष में पर्याप्त सबूत हुए बगैर मंजूरी देना शामिल है.

इन रपटों की तह तक जाने के लिए पत्रकारों को झूठ और धोखे के दलदल को पार करना पड़ा. द वायर  ने 1 जुलाई के अपने संपादकीय में लिखा था: ‘भले ही उल्लंघन कितना भी बड़ा क्यों न हो, आज कोई भी आईसीएमआर से कोविड के खिलाफ केंद्र की रणनीति से किसी भी बिंदु पर अपना अलग मत रखने की उम्मीद नहीं करता है.’

तब से काउंसिल को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीजीसीआई) का भी साथ मिल गया है. 4 दिसंबर को अगले डीजीसीआई डॉ.. वीजी सोमानी ने एक वेबिनार के दौरान भारत के ड्रग स्वीकृति और गुणवत्ता नियमों के बारे में बात कर रहे थे.

उन्होंने वैक्सीन ट्रायल को लेकर काफी ब्यौरेवार ढंग से नए ड्रग्स एवं क्लीनिकल ट्रायल नियमों, 2019 के विभिन्न प्रावधानों के बारे में बताया.

देखने वालों को यह समझ में आ गया होगा कि डॉ.क्टर सोमानी सीरम इंस्टिट्यूट के विवाद के कारण इस विषय पर बोल रहे थे, लेकिन अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने इस घटना और इस पर सरकार के पक्ष को लेकर किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.

उनके बाद आईसीएमआर की डॉ.. शीला गोडबोले का नंबर आया, जिन्होंने क्लीनिकल ट्रायल डिजाइन और ड्रग सेफ्टी के बीच के संबंधों पर बोला.

क्या उन्हें इस बात की जानकारी थी कि तब सिर्फ दो दिन पहले बाइकॉन लिमिटेड के शोधकर्ताओं ने साल 2020 के अपने विवादास्पद आइटोलाइजुमैब ट्रायल का प्री-प्रिंट पेपर अपलोड किया था? और यह पेपर साफ तौर पर दिखाता है कि ट्रायल डिजाइन ने आइटोलाइजुमैब के असरदार होने के संबंध में कंपनी के कई लोगों के निष्कर्षों, जिनमें कंपनी की एमडी किरण मजूमदार शॉ द्वारा एक प्राइम टाइम टीवी डिबेट शो पर किया गया दावा भी शामिल है, का बिल्कुल भी समर्थन नहीं किया था.

डॉ.. जे. नागराज राव के शब्दों में कहें तो, ‘आइटोलाइजुमैब के प्रभावी होने को लेकर 41 पन्नों का प्री-प्रिंट पेपर हमें सबूत के होने या न होने के मामले में ठीक उसी जगह पर वापस लाकर छोड़ देता है, जहां हम जुलाई में थे.’ यह जानकारी हवा की तरह आई और गायब कर दी गई, मानो इसका कोई महत्व ही न हो.

आयुर्वेद को बढ़ावा देने का मामला

हैरानी की बात है कि कैसे एक देश एक ‘साइंस सुपरपावर’ हो सकता है- या ऐसी कोई इच्छा भी रख सकता है, अगर इसका राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह से और शायद जानबूझकर विज्ञान किस शय का नाम है, यह न समझता हो.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी द्वारा उपचार की एक पद्धति, जिसे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ‘मिक्सोपैथी’- आयुर्वेदिक और ऐलोपैथिक विचारों, तकनीकों और मेथड का मिश्रण- कहता है, को आगे बढ़ाने की इरादा इसका जीता-जागता प्रमाण है.

आयुर्वेद को लेकर या कहें कि आयुर्वेद के उनके अपने विचार को लेकर- यहां पार्टी का इरादा विज्ञान की वैधता पर चढ़कर मेडिकल प्रैक्टिस की मुख्यधारा में शामिल होना है. लेकिन यह वास्तव में दक्षिणपंथी प्रोपगेंडा द्वारा जान फूंके गए और भस्मासुर की तरह है.

भाजपा के सोने को भी मिट्टी बना देने वाले हाथ के कारण आयुर्वेद की हो रही दुगर्ति में कुछ भी अनोखा नहीं है. कोविड-19 महामारी के दौरान पार्टी ने जिन चीजों पर हाथ रखा वे बिगड़ ही गईं.

आईसीएमआर की मदद से कोविड-19 वैक्सीन कैंडिडेट कोवैक्सीन का निर्माण कर रही हैदराबाद की फार्मास्यूटिकल कंपनी भारत बायोटेक इसका एक प्रमुख उदाहरण है.

जुलाई के अंत में आईसीएमआर के प्रमुख डॉ. बलराम भार्गव ने कोवैक्सीन के तीसरे चरण की शुरूआत होने से ठीक पहले यह घोषणा कर दी कि ये परीक्षण भारत के स्वतंत्रा दिवस (15 अगस्त) तक समाप्त हो जाने चाहिए- या सरकार की सख्ती के लिए तैयार रहना चाहिए.

आईसीएमआर ने बाद में यह बयान वापस ले लिया, जिससे एक गैरजरूरी खबर को आगे  दिया गया- हालांकि यह फिर कुछ बार सामने आई, एक बार तो अभी कुछ दिन पहले ही.

हरियाणा के मुख्यमंत्री अनिल विज ने 6 दिसंबर को उनके कोरोना पॉजिटिव होने की घोषणा की. उससे दो हफ्ते पहले उन्होंने क्लीनिकल ट्रायल के तहत या तो कोवैक्सीन कैंडिडेट या प्लैसैबो कैंडिडेट का टीका लिया था.

विज के ट्वीट के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने संवाददाताओं के साथ एक अजीब नोट साझा किया- ‘संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडी वैक्सीन का दूसरा डोज लेने के बाद दिनों की निश्चित संख्या के गुजरने के बाद ही विकसित होती है. यह दो डोज वाला वैक्सीन है. मंत्री जी ने वैक्सीन का एक ही डोज लिया है.’

जीएस मुदुर ने बाद में द टेलीग्राफ में लिखा, ‘हरियाणा के एक मंत्री के ट्वीट और उसके बाद आया एक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के ट्वीट उनकी पहचान कोविड-19 वैक्सीन के कैंडिडेट का डोज लेनेवाले के तौर पर करता है. इसने विशेषज्ञों को उलझन में डाल दिया है जिन्होंने इन्हें (दोनों के बयानों को) या तो गैरजिम्मेदाराना बयान या क्लीनिकल ट्रायल प्रोटोकॉल का उल्लंघन करार दिया.’

वर्तमान भारत सरकार साफतौर पर सतत तरीके से सही होने और खुद को सबसे ऊपर देखने के लिए संकल्पबद्ध है. इससे कम कुछ भी उसे मंजूर नहीं है. इस लक्ष्य को पाने के लिए यह झूठ बोलती है, धोखा देती है और जब सामने आकर यह कहने की बारी आती है कि इससे गलती हुई, यह छिपती है.

जब कोई गलती होती है, या यहां तक कि अगर कुछ ऐसा होता है जो पूरी तरह से इसके नियंत्रण से बाहर है, यह झूठ बोलकर समस्या के अस्तित्व को ही नकाराने की कोशिश करती है. जिसका मकसद यह जताना होता है कि ऐसी कोई समस्या थी ही नहीं या इसने सभी दुश्वारियों के बावजूद समस्या का हल खोज लिया है.

और हर बार सरकार का झूठ पकड़ में आ गया है. अपवादस्वरूप सरकार ने एक बार वास्तव में माफी मांगी, जब इसने यह स्वीकार किया कि इसने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने आरोग्य सेतु को लेकर गलत जानकारी दी थी.

इस साल भारत के ‘साइंस सुपरपावर’ बनने की इच्छा फार्मास्यूटिकल और बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर पर केंद्रित थी. मगर दुखद है कि हमने जैसा प्रदर्शन किया, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि सुपरपावर होने की बात तो छोड़िए, हम सही रास्ते पर भी नहीं दिखते हैं.

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