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दस्तावेज़ दर्शाते हैं कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में मनमानी बरती गई, बिना आवेदन एक का चयन

विशेष रिपोर्ट: पिछले साल नवंबर महीने में मुख्य सूचना आयुक्त और तीन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हुई थी. इससे जुड़े दस्तावेज़ दर्शाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद सर्च कमेटी ने बिना स्पष्ट प्रक्रिया और मानक के नामों को शॉर्टलिस्ट किया था. प्रधानमंत्री पर दो किताब लिख चुके पत्रकार को बिना आवेदन के सूचना आयुक्त बना दिया गया.

(फोटो: रॉयटर्स/पीआईबी)

(फोटो: रॉयटर्स/पीआईबी)

नई दिल्ली: सूचना का अधिकार कानून को उचित तरीके से लागू करने और आरटीआई मामलों के निपटारे के लिए बनी सर्वोच्च अपीलीय संस्था केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति एक बार फिर से विवादों के घेरे में है.

पिछले साल नवंबर, 2020 में मुख्य सूचना आयुक्त और तीन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज चयन प्रक्रिया में अनियमतताएं एवं मनमाना रवैये को दर्शाते हैं.

आलम ये है कि बिना आवेदन के ही एक सूचना आयुक्त की नियुक्ति की गई है, जिन्होंने ‘मोदी मॉडल’ को लेकर दो किताबें लिखी हैं और उन्हें मौजूदा सरकार की विचारधारा का करीबी माना जाता है.

इतना ही नहीं सीआईसी में छह सूचना आयुक्तों को नियुक्ति के लिए सरकार ने प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने बिना कोई कारण बताए सिर्फ तीन सूचना आयुक्तों की ही नियुक्ति की. नतीजतन आयोग में अभी भी तीन पद खाली हैं और अपीलों एवं शिकायतों का भार लगातार बढ़ता ही जा रहा है.

दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि इस समिति में शामिल लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी की आपत्तियों को नहीं सुना गया, जिसे लेकर उन्होंने असहमति पत्र (डिसेंट नोट) दिया था.

सर्च कमेटी ने अपने दायरे से बाहर जाकर काम किया

केंद्रीय सूचना आयोग में छह आयुक्तों की नियुक्ति के लिए पिछले साल जुलाई, 2020 में सरकार ने अपनी वेबसाइट और अखबारों में विज्ञापन निकाला था. इसे लेकर कुल 355 व्यक्तियों ने आवेदन किया था.

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री के निर्देश पर एक सर्च कमेटी बनाई जाती है, जिसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव को करनी होती है. इस कमेटी का कार्य कुल आवेदनों में उचित व्यक्तियों को शॉर्टलिस्ट करना है, जिसके आधार पर चयन समिति किसी सूचना आयुक्त के नियुक्ति की सिफारिश करती है.

वैसे तो आरटीआई एक्ट, 2005 में कहीं भी ‘सर्च कमेटी’ का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सहायता के लिए इसका गठन किया जाता है.

हालांकि दस्तावेजों से पता चलता है कि इस कमेटी ने सूचना आयुक्त के पद के लिए नामों को शॉर्टलिस्ट करने में मनमाना रवैया अपनाया और अपने दायरे से बाहर जाकर कार्य किया.

इसके मिनट्स ऑफ मीटिंग के मुताबिक, आवेदनकर्ताओं में से शॉर्टलिस्ट करने के बजाय ‘सर्च कमेटी ने अपने सदस्यों द्वारा सुझाए गए नामों पर भी विचार किया’ और कुल सात लोगों को शॉर्टलिस्ट किया, जिसमें इंडिया टुडे पत्रिका के पूर्व डिप्टी एडिटर उदय महुरकर का भी नाम शामिल था, जिन्होंने आवेदन ही नहीं किया था.


Minutes of Meeting by The Wire

मिनट्स में ये नहीं बताया गया है कि आखिर किस आधार पर आवेदन नहीं करने वाले व्यक्ति का भी नाम सुझाया गया है. इसके साथ ही इसमें इन बातों का विवरण भी उपलब्ध नहीं है कि जिन आवेदनकर्ताओं के नामों को खारिज किया गया या चुना गया, उसका आधार या मानक क्या है?

सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता एवं जवाबदेही बरतने को लेकर फरवरी, 2019 में दिए अपने बेहद महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था… 

आवेदनकर्ताओं को शार्टलिस्ट करने के लिए सर्च कमेटी द्वारा अपनाए गए मानदंड को सार्वजनिक किया जाना उचित होगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शॉर्टलिस्टिंग निष्पक्ष और तर्कसंगत मानदंडों के आधार पर की गई है.

हालांकि फाइलों की गहन जांच से पता चलता है कि विचार-विमर्श में शॉर्टलिस्टिंग के लिए ऐसा कोई तर्कसंगत मापदंड दर्ज नहीं किया गया है. कमेटी की बैठक के मिनट्स में सिर्फ इतना लिखा है कि आवेदनकर्ताओं के समग्र अनुभव और पद की अनुकूलता पर विचार करने के बाद सर्च कमेटी ने इन नामों को शॉर्टलिस्ट किया है.

जबकि कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि सर्च कमेटी आवेदनकर्ताओं की सूची के बाहर से नामों को सुझा सकती है.

सरकार ने 13 दिसंबर 2019 को इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अनुपालन रिपोर्ट में कहा था कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए पात्रता मापदंड आरटीआई एक्ट की धारा 12 (5) में दी गई है, जिसके मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन तथा शासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाला प्रख्यात व्यक्ति होना चाहिए.

विशेष रूप से सर्च कमेटी को लेकर कहा गया, ‘यह सर्च कमेटी के ऊपर निर्भर है कि वे प्राप्त आवेदनों में से नामों को शॉर्टलिस्ट करने लिए तौर-तरीकों को विकसित करें.’

‘मोदी मॉडल’ पर किताब लिखने वाले की नियुक्ति

बहरहाल, सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए सर्च कमेटी की सिफारिश ही अंतिम निर्णय नहीं होता है, इस पर आखिरी मुहर चयन समिति लगाती है. इस समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (अध्यक्ष), गृह मंत्री अमित शाह (अरुण जेटली के निधन के बाद इन्हें लाया गया) और लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल थे.

सर्च कमेटी द्वारा शॉर्टलिस्ट किए गए सात नामों में से चयन समिति ने 24 अक्टूबर 2020 को हुई बैठक में 2:1 के बहुमत से तीन लोगों- हीरालाल समारिया, सरोज पुन्हानी और उदय महुरकर (जिन्होंने आवेदन नहीं किया था) को चुना, जबकि आयोग में छह पद खाली थे. इसके चलते सीआईसी में अभी भी तीन पद खाली हैं. आयोग में 10 सूचना आयुक्त और एक मुख्य सूचना आयुक्त होना चाहिए.

इसमें से समारिया और पुन्हानी दोनों नौकरशाह रह चुके हैं.

समारिया श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के सचिव के रूप में रिटायर हुए थे और उन्होंने आंध्र प्रदेश सरकार में भी विभिन्न पदों पर कार्य किया है. पुन्हानी डिप्टी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) थीं और उन्होंने शिक्षा मंत्रालय के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग के सचिव के रूप में भी काम किया है.

वहीं उदय महुरकर इंडिया टुडे मैगजीन के डिप्टी एडिटर थे. रिकॉर्ड के मुताबिक इनका पत्रकारिता में 36 सालों का अनुभव है. साल 1983 में इंडियन एक्सप्रेस के सब-एडिटर के रूप में कार्य शुरू करने वाले महुरकर ने ‘मोदी मॉडल’ पर दो किताबें Marching with a Billon और Centrestage लिखी हैं.

सीआईसी की वेबसाइट पर लिखा है कि महुरकर ‘मोदी मॉडल गवर्नेंस’ में एक्सपर्ट हैं और उन्होंने अपनी किताबों में पीएम मोदी के विजन को बखूबी दर्शाया है. इसके अलावा उन्हें ‘कट्टरपंथी इस्लामिक आंदोलन और समाज पर इसके प्रभाव’ विषय पर महारथ हासिल करने वाला बताया गया है.

इसके साथ ही उदर महुरकर के बारे में लिखा है कि उन्होंने ‘क्रांतिकारी वीर सावरकर को लेकर एक नया नैरेटिव विकसित किया, जो कि उन्हें भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का संरक्षक के रूप में स्थापित करता है.’

चयन समिति के एक सदस्य द्वारा डिसेंट नोट

मुख्य सूचना आयुक्त और तीन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए चयन समिति के एक सदस्य कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने अपना असहमति पत्र (डिसेंट नोट) दिया था. छह पेज के इस नोट में सर्च कमेटी की कार्यप्रणाली समेत कई आधारभूत विषयों पर सवाल उठाया गया है.

चौधरी ने अपने पत्र में कहा कि आरटीआई एक्ट, 2005 एक बेहद महत्वपूर्ण कानून है, जो कि सरकार में जवाबदेही और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है. इसलिए सूचना आयोग में बढ़ते लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए योग्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति करना और महत्वपूर्ण कार्य हो जाता है.

उन्होंने कहा, ‘लेकिन जिस तरीके से सर्च कमेटी ने कार्य किया है, वो महज खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं है. यह आरटीआई एक्ट के मूल उद्देश्य के ही बिल्कुल उलट है. ये बेहद चिंताजनक है कि सर्च कमेटी इस बात का कोई कारण या तर्क नहीं दे पाई कि क्यों अन्य के मुकाबले शॉर्टलिस्ट किए कैंडीडेट ज्यादा योग्य हैं.’


Adhir Ranjan Chowdhury Diss… by The Wire

चौधरी ने कहा, ‘सर्च कमेटी द्वारा खारिज किए गए आवेदनों को देखने से पता चलता है कि ये लोग भी, अगर ज्यादा नहीं, तो उतने ही योग्य हैं जितना कि चुने गए लोग. सर्च कमेटी ने चुनने या खारिज करने में कोई मानक या ग्रेडिंग का इस्तेमाल नहीं किया है.’

कांग्रेस नेता ने कहा कि ऐसा करना फरवरी, 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले का उल्लंघन है, जिसमें सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने को कहा गया था. उन्होंने कहा, ‘कुल मिलाकर ये पूरी प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण थी.’

महुरकर की नियुक्ति को लेकर आश्चर्य जताते हुए अधीर रंजन चौधरी ने अपने पत्र में कहा है कि आखिर ऐसा कैसे किया जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने आवेदन ही न किया हो और उसकी नियुक्ति की सिफारिश कर दी है. ऐसा करना आवेदन मंगाने के पूरे उद्देश्य को ही फेल कर देता है.

इसे लेकर चौधरी ने कहा कि सर्च कमेटी का अध्यक्ष होने के नाते कैबिनेट सचिव को ये बताना चाहिए कि आखिर उन्होंने उदय महुरकर का नाम क्यों शॉर्टलिस्ट किया, जबकि ये बिल्कुल स्पष्ट है कि वे सत्ताधारी दल और उसकी विचारधारा के समर्थक हैं.

कांग्रेस नेता ने डिसेंट नोट में लिखा, ‘कैबिनेट सचिव को विशेष वजह और उनके ऊपर डाले गए दबाव को बताने की जरूरत है, जिसके चलते बिना आवेदन के ही उन्हें महुरकर का नाम सुझाना पड़ा, जो कि साफ-साफ चयन प्रक्रिया में पक्षपात को दर्शाता है.’

चौधरी ने कहा कि चूंकि आरटीआई एक्ट आम आदमी का कानून है, इसलिए राजनीतिक पक्षपात और संस्थागत बर्बादी कर इसे कमजोर नहीं किया जा सकता है.

सूचना आयोग में बाबुओं का ही बोलबाला

आरटीआई कानून की धारा 12(5) के तहत विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, संचार मीडिया, प्रशासन या शासन के क्षेत्र से लोगों की नियुक्ति बतौर सूचना आयुक्त किया जाना चाहिए. हालांकि मोदी सरकार सिर्फ नौकरशाहों या बाबुओं को ही तरजीह दे रही है.

आलम ये है कि वर्तमान समय में सीआईसी में मुख्य सूचना आयुक्त समेत आठ सूचना आयुक्त हैं, जिसमें से सात लोग पूर्व नौकरशाह या सरकार में किसी न किसी पद पर कार्य कर चुके व्यक्ति हैं.

दस्तावेजों से पता चलता है कि जुलाई, 2020 में निकाले गए विज्ञापन के जवाब में सूचना आयुक्त के पद के लिए कानून के क्षेत्र से 110 लोगों, विज्ञान से सात, समाज सेवा से 16, प्रबंधन से 37, पत्रकारिता से 23, मास मीडिया से 11 और प्रशासन एवं गवर्नेंस ने 151 लोगों ने आवेदन किया था.

हालांकि सर्च कमेटी ने छह अक्टूबर 2020 को हुई अपनी बैठक में इसमें से सिर्फ नौकरशाहों के नामों की ही सिफारिश की.

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(स्रोत: कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग)

इस समस्या पर विशेष ध्यान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सूचना आयुक्त विविध क्षेत्र से होने चाहिए, सिर्फ सरकारी बाबू नहीं. कोर्ट ने कहा था, ‘हम एक अजीब चलन देख रहे हैं कि चुने गए लोग सिर्फ एक श्रेणी (सरकारी कर्मचारी) से आ रहे हैं. ये समझना मुश्किल है कि आखिर कैसे एक ही श्रेणी के लोगों को हमेशा अन्य श्रेणियों की तुलना में अधिक योग्य और लायक माना जा रहा है.’

न्यायालय ने कहा, ‘यहां तक उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने वाली सर्च कमेटी में भी केवल नौकरशाह ही होते हैं, इसके कारण चयन के वक्त पक्षपात होने की संभावना लाजमी है.’

कोर्ट ने कहा कि सीआईसी में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को शामिल करने के प्रावधान का उद्देश्य ही ये था कि अन्य वर्गों को भी इसमें प्रतिनिधित्व दिया जाएगा. यह सीआईसी की विराट छवि को दर्शाएगा.

मौजूदा और पूर्ववर्ती सरकारों की इस बात को लेकर आलोचना होती रही है कि वे जान-बूझकर इस पद के लिए पूर्व नौकरशाहों को चुनते हैं, क्योंकि ऐसे लोगों के साथ सरकार को काम करने में आसानी होती है, आमतौर पर उनका झुकाव सरकार को बचाने के प्रति होता है और वे सूचना देने से बच भी जाते हैं.

सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा समय पर नियुक्तियां नहीं करने की वजह से लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है. स्थिति ये है कि जब भी आयोग में कोई पद खाली होता है तो जब तक कोई कोर्ट नहीं जाता है, नियुक्ति नहीं होती है.

सीआईसी में एक जनवरी 2021 तक कुल 38,332 मामले लंबित थे, जिसमें से 32,909 अपीलें और 5,423 शिकायतें लंबित थीं.