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गौ विज्ञान पर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा करवाएगा कामधेनु आयोग, पाठ्यक्रम में किए अजीब दावे

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग आम लोगों में देसी गायों के बारे में रुचि पैदा करने के लिए छात्रों और नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन गौ विज्ञान परीक्षा आयोजित करेगा. इसके लिए जारी पाठ्यक्रम में आयोग ने देसी-विदेशी गायों में अंतर बताते हुए अजीब दावे किए हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने मंगलवार को कहा कि देसी गायों और इसके फायदे के बारे में छात्रों और आम लोगों के बीच रुचि पैदा करने के लिए वह 25 फरवरी को राष्ट्रीय स्तर की स्वैच्छिक ऑनलाइन गौ विज्ञान परीक्षा का आयोजन करेगा.

अपनी तरह की इस पहली परीक्षा की घोषणा करते हुए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (आरकेए) के अध्यक्ष वल्लभभाई कथीरिया ने कहा कि वार्षिक तरीके से परीक्षा का आयोजन होगा.

बिना किसी शुल्क के कामधेनु गौ विज्ञान प्रचार प्रसार परीक्षा में प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज स्तर के छात्र और आम लोग हिस्सा ले पाएंगे.

मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत आने वाले कामधेनु आयोग की स्थापना केंद्र ने फरवरी 2019 में की थी और इसका लक्ष्य गायों के संरक्षण, संवर्द्धन के लिए काम करना है.

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘देसी गायों के बारे में छात्रों और नागरिकों के बीच जन जागरूकता पैदा करने के लिए कामधेनु आयोग ने गौ विज्ञान पर राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित करने का निर्णय किया है.’

उन्होंने कहा कि आयोग गौ विज्ञान पर अध्ययन सामग्री उपलब्ध करवाने की तैयारी कर रहा है.

अखिल भारतीय स्तर की किसी परीक्षा की गंभीरता के उलट आयोग ने कहा, ‘केंद्रीय शिक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यों के शिक्षा मंत्री, सभी राज्यों के गोसेवा आयोगों के अध्यक्ष सभी राज्यों के जिला शिक्षा अधिकारी, सभी स्कूलों के प्रधानाचार्य, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, एनजीओ और गाय दान करने वाले इस विस्तृत प्रक्रिया में शामिल होंगे.’

आयोग के अध्यक्ष कथीरिया ने बताया कि परीक्षा में वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे और आयोग की वेबसाइट पर पाठ्यक्रम के बारे में ब्योरा उपलब्ध कराया जाएगा. परीक्षा के नतीजों की तुरंत घोषणा कर दी जाएगी और प्रमाणपत्र दिए जाएंगे. होनहार उम्मीदवारों को पुरस्कार और प्रमाणपत्र दिए जाएंगे.

आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि गाय और संबंधित मुद्दों पर पीठ और अनुसंधान केंद्र की स्थापना के लिए विश्वविद्यालयों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है.

हालांकि इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि सरकारी विद्यालयों का प्रशासन इस परीक्षा में भाग लेने के लिए विद्यार्थियों को कैसे प्रोत्साहित करेगा, लेकिन समय के हिसाब से इस परीक्षा की तिथि तब है जब बच्चे पहले से ही करीब नौ महीनों से स्कूलों से दूर हैं.

आयोग ने इसके लिए स्टडी मटेरियल जारी किया है. 54 पृष्ठों वाली इस पीडीएफ फाइल को आयोग की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है. दिलचस्प पहलू इसमें गायों को लेकर किए गए विभिन्न दावे हैं.

RKA syllabus by The Wire

देसी और विदेशी गायों के बीच अंतर बताते हुए बिना किसी संदर्भ को समझाए हुए इसमें कहा गया है कि स्वास्थ्य संबंधी मामलों से लेकर हर तरह से देसी गाय श्रेष्ठ होती है.

जर्सी गाय के बारे में लिखा गया है कि इसके दूध की गुणवत्ता नहीं होती बस मात्रा ज्यादा होती है. इसमें आगे लिखा है कि भारतीय गायों के दूध का रंग ‘हल्का पीला होता होता है क्योंकि इसमें सोने के कण होते हैं.’ (जैसा जर्सी गाय में नहीं होता.) सोना एक धातु है और जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के निष्कर्ष इस बारे में कुछ अलग ही कहते हैं.

आयोग की इस बुकलेट में यह भी कहा गया था देसी गायें सफाई-पसंद होती हैं और इतनी समझदार भी कि वे किसी गंदी जगह पर नहीं बैठती हैं, जबकि जर्सी गायें अलसी होती हैं और जल्दी बीमार होती हैं.

गायों को होने वाली बीमारी के लिए गाय को ही जिम्मेदार बताना हैरानी-भरा है. आगे जर्सी गाय के बारे में कहा गया है, ‘यह भी देखा गया है कि ज्यादा साफ़-सफाई न रखने के कारण ही उन्हें संक्रमण होते हैं.’

इसी तरह के 38 बिंदुओं द्वारा इस अंतर को समझाने की कोशिश की गई है, यहां भी कुछ अटपटे दावे हैं जैसे यह कि ‘जब भी कोई अनजान व्यक्ति देसी गाय के नजदीक आता है, यह फौरन खड़ी हो जाती है.’ वहीं बेअदब जर्सी गाय ‘किसी भी तरह की कोई भावना प्रदर्शित नहीं करती है.’

इस पाठ्यक्रम में लगातार यह कहा गया है कि गाय से प्राप्त होने वाले तत्वों से लगभग सभी बीमारियों का इलाज हो सकता है. जगह-जगह बताया गया है कि कैसे गाय से मिल रही चीजों का इस्तेमाल फसल बचाने आदि के लिए किया जा सकता है.

एक जगह गोबर के फायदे बताते हुए कहा गया है कि ‘साल 1984 में भोपाल में गैस लीक होने से 20 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. जिन लोगों के घरों की दीवारें गोबर से लीपी हुई थीं, इससे प्रभावित नहीं हुए थे.’

यह आश्चर्यजनक है कि गौ ‘विज्ञान’ का यह पाठ्यक्रम इस तरह के आधे सच्चे-झूठे दावों से भरा हुआ है.

आयोग का दावा, क्लीनिकल ट्रायल में आयुर्वेद से कोविड-19 के 800 मरीजों को ठीक किया

आरकेए के अध्यक्ष वल्लभभाई कथीरिया ने यह दावा किया कि देशभर के चार शहरों में किए गए क्लीनिकल परीक्षण में ‘पंचगव्य और आयुर्वेद’ उपचार के माध्यम से कोविड-19 के 800 मरीजों को ठीक किया गया.

कथीरिया ने कहा कि जून और अक्टूबर 2020 के बीच राज्य सरकारों और कुछ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की साझेदारी में राजकोट और बड़ौदा (गुजरात), वाराणसी (उत्तर प्रदेश) और कल्याण (महाराष्ट्र) में 200-200 मरीजों पर ‘क्लीनिकल ट्रायल’ किए गए थे.

मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत आने वाले आरकेए का गठन केंद्र द्वारा फरवरी, 2019 किया गया था.

कथीरिया ने पत्रकारों से कहा, ‘कामधेनु आयोग क्लीनिकल ट्रायल में भागीदार था… जल्द ही, हम आयुष मंत्रालय को इन परीक्षणों के डाटा सौंपने जा रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि उपचार की खुराक में ‘पंचगव्य’ (गोमूत्र, गाय का गोबर, दूध, घी और दही का मिश्रण), जड़ी-बूटी ‘संजीवनी बूटी’ और हर्बल मिश्रण ‘काढ़ा’ शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि परीक्षण आयुष मंत्रालय के मानदंडों के अनुसार किए गए थे. उन्होंने कहा कि कोविड-19 से संक्रमित लोग अपनी इच्छा से परीक्षणों में शामिल हुए थे और आवश्यक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे.

उन्हें संबंधित स्थानों पर मेडिकल कॉलेजों में भर्ती कराया गया, जहां परीक्षण किए गए.

कथीरिया ने कहा कि उदाहरण के लिए, वाराणसी में चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस-बीएचयू) और राजकोट में आयुर्वेद क्योर कोविड केंद्र में भर्ती कोविड-19 रोगियों पर परीक्षण किए गए.

यह पूछे जाने पर कि क्या आयुर्वेदिक उपचार एक निवारक उपाय था, उन्होंने कहा, ‘यह रोगनिवारक था. उन्हें कोई एलोपैथी दवा नहीं दी गई थी.’

गौरतलब है कि भारत के औषधि नियामक ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा निर्मित ऑक्सफोर्ड कोविड-19 टीके ‘कोविशील्ड’ और भारत बायोटेक के स्वदेश में विकसित टीके ‘कोवैक्सीन’ के देश में सीमित आपात इस्तेमाल को रविवार को मंजूरी दे दी थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)