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दिल्ली सरकार के सर्वे में खुलासा- दो लाख से अधिक बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित

दिल्ली सरकार ने 2018 से 2019 के बीच लगभग एक करोड़ से अधिक लोगों पर सर्वे किया गया. पूर्वी दिल्ली के मंडावली में जुलाई 2018 में तीन नाबालिग लड़कियों की कथित भुखमरी से मौत के बाद राज्य सरकार ने यह सर्वे कराने का आदेश दिया था.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्लीः दिल्ली सरकार द्वारा नवंबर 2018 से नवंबर 2019 के बीच कराए गए सर्वे से कई आंकड़े सामने आए हैं, जिनमें यह पता चला है कि राजधानी में दो लाख से अधिक बच्चे अभी भी स्कूली शिक्षा से वंचित हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सर्वे राजधानी के लगभग 1.02 करोड़ लोगों पर किया गया, जिसके जरिये धर्म, जाति, आय, शिक्षा, बीमारी, टीकाकरण की स्थिति और रोजगार सहित शहर की सामाजिक-आर्थिक संरचना का पता चला. इस रिपोर्ट को नवंबर 2020 में अंतिम रूप दिया गया.

ये जानकर हैरानी होगी कि देश की राजधानी में आज भी दो लाख बच्चे स्कूल जाने से वंचित हैं. इनमें से 64,813 बच्चे गरीबी के चलते स्कूल जाने में असमर्थ हैं. सर्वे में इसके साथ-साथ और भी कई आंकड़े सामने आए हैं.

दरअसल पूर्वी दिल्ली के मंडावली में जुलाई 2018 में तीन नाबालिग लड़कियों की कथित भुखमरी से मौत के बाद राज्य सरकार ने यह सर्वे कराने का आदेश दिया था.

इस पीड़ित परिवार के पास कोई राशन कार्ड नहीं था और सरकारी जांच में पता चला था कि लड़कियों की मौत के बाद स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र ने संबंधित दस्तावेजों से छेड़छाड़ की थी.

2011 की जनगणना के मुताबिक, दिल्ली की आबादी 1.67 करोड़ है. केंद्रीय डेटाबेस से जुड़े हुए मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर 6,000 से अधिक फील्ड वर्कर्स ने यह सर्वे किया.

सर्वेक्षण से पता चला कि छह से 17 साल की उम्र के 221,694 बच्चे स्कूली शिक्षा प्रणाली से बाहर हो गए, जिनमें से 131,584 बच्चों ने स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ दी, जबकि 90,110 बच्चे कभी स्कूल ही नहीं गए.

सर्वे में कहा गया कि 6-17 वर्ष की आयुवर्ग के बच्चों के स्कूल नहीं जाने का सबसे बड़ा कारण वित्तीय संकट (29.2 फीसदी) रहा. 13.5 फीसदी बच्चे घरेलू कामकाज में संलग्न रहे, जबकि 12.17 फीसदी बच्चों ने इच्छा के अनुरूप शिक्षा के स्तर को हासिल किया. वहीं, 9.37 फीसदी बच्चे आर्थिक गतिविधियों में लगे रहे.

दिल्ली की कुल आबादी में से 11.04 फीसदी 0 से छह साल की आयुवर्ग के बच्चे हैं, जिनमें से आधे से अधिक यानी 55.40 फीसदी बच्चे आंगनवाड़ी केंद्र गए. 18 या इससे अधिक उम्र की 47.15 फीसदी गर्भवती महिलाएं इन केंद्रों में जाती पाई गईं. ये आंगनवाड़ी, केंद्र सरकार के एकीकृत बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत संचालित हैं.

सर्वेक्षण से पता चला कि दिल्ली में 47.31 फीसदी परिवार 10,000 से 25,000 रुपये प्रतिमाह खर्च करते हैं, जबकि 42.5 फीसदी परिवारों ने मासिक आधार पर 10,000 या इससे अधिक रुपये खर्च किए. हर महीने 25,000 से 50,000 रुपये खर्च करने वाले परिवार 8.44 फीसदी हैं और केवल 1.66 फीसदी घर ही हर महीने 50,000 रुपये से अधिक खर्च करते हैं. दिल्ली में 2019-20 में प्रति व्यक्ति आय 3.89 लाख रुपये (32,000 रुपये महीने से अधिक) थी, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग तीन गुना अधिक है.

20.05 लाख घरों में से 21 फीसदी से अधिक घरों में डेस्कटॉप या लैपटॉप का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें से 80.15 फीसदी के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं था.

सर्वे से यह भी पता चला है कि शहर की आबादी में से 72.78 फीसदी लोगों ने सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरी में इलाज का लाभ उठाया, जबकि बाकी निजी अस्पतालों पर निर्भर रहे.

शहर की आबादी में से लगभग 2.60 फीसदी लोग किसी न किसी तरह की पुरानी बीमारी से पीड़ित थे और 36.33 फीसदी को मधुमेह था. वहीं, 21.75 फीसदी लोगों में दिल संबंधी (हाइपरटेंशन और रक्त प्रवाह संबंधी) बीमारियां रहीं और 9.17 फीसदी को श्वास संबंधी बीमारियां थीं.

इस सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि 0-5 वर्ष की आयुवर्ग के लगभग एक-चौथाई बच्चों का कभी टीकाकरण भी नहीं हुआ. 0-5 आयुवर्ग के 9.5 लाख बच्चों में से 2.13 लाख बच्चों का कभी टीकाकरण नहीं हुआ.

सर्वेक्षण से पता चला है कि दक्षिण पूर्वी जिले के 37.75 फीसदी लोगों के घरों तक पानी की उपलब्धता थी, जबकि शाहदरा जिले के 90 फीसदी घरों में यह सुविधा नहीं थी. वहीं, शहर में इसका कुल औसत 70.98 फीसदी है. दक्षिण पूर्वी जिले के 1.86 लाख घरों में से लगभग 43.28 फीसदी घर बोतलबंद पानी पर निर्भर थे. वहीं, कुल मिलाकर 1.01 लाख घर पानी के टैंकरों पर निर्भर थे.

वहीं, दिल्ली के 20.5 लाख घरों में से 18.7 लाख घरों में शौचालय था, जबकि 1.22 लाख घर सामुदायिक शौचालयों पर निर्भर थे और 11,497 परिवार खुले में शौच करने वाली श्रेणी में थे.

बता दें कि जिन तीन नाबालिग लड़कियों की वजह से सरकार को यह सर्वेक्षण करना पड़ा. वे मंडावली की आंगनवाड़ी संख्या 62 में एक कमरे में रहती थीं.

सरकारी जांच में पाया गया था कि अधिकारियों ने लड़कियों की मौत के बाद उनके नाम स्थानीय आंगनवाड़ी के रिकॉर्ड में दर्ज कराए थे.