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मध्य प्रदेश: ‘ज़हरीली शराब से 24 मौतों के बाद सरकार जागी, पहले कार्रवाई करती तो कोई मरता नहीं’

ग्राउंड रिपोर्ट: मुरैना ज़िले के मानपुर, छैरा समेत आसपास के कुछ गांवों में बीते हफ़्ते ज़हरीली शराब से 24 लोगों की मौत हो गई. इसके बाद ज़िले के ही तीन अन्य गांवों में पांच और लोगों की जान गई. ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में फल-फूल रहे अवैध शराब के धंधे के बारे में कई शिकायतें कीं, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया.

मृतक रामजी लाल राठौर का परिवार. (सभी फोटो: दीपक गोस्वामी)

मृतक रामजी लाल राठौर का परिवार. (सभी फोटो: दीपक गोस्वामी)

करीब 1000-1200 लोगों की आबादी वाले मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के मानपुर गांव में हर ओर मातम पसरा हुआ है. गांव में एक भी ऐसी गली नहीं है जहां मौत ने दस्तक न दी हो.

हर दूसरा-तीसरा घर मातम मना रहा है. जहां नजर घुमाओ वहीं लोग झुंड में बैठे शोक व्यक्त करते देखे जा सकते हैं. किसी ने अपना भाई खोया है तो किसी ने अपना पति, पिता या बेटा.

जो लोग बच गए हैं, वे मुरैना और ग्वालियर के अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं. जिसके चलते गांव में उनके घर-परिवार भी एक तरह से इस डर में डूबे हैं कि कहीं अगले ही पल मौत की दस्तक उनके घर में भी न पहुंचे.

और यह सब हुआ उस जहरीली शराब के कारण जिसे 10-11 जनवरी को ग्रामीणों ने गांव के ही एक घर से खरीदकर पीया था.

छैरा व मानपुर गांव में अवैध तरीके से बेची जा रही इस शराब से अब तक मुरैना जिले में 26 लोगों की मौत हो चुकी है और चार लोग अपनी आंखों की रोशनी खो चुके हैं. 12 मौतें अकेले मानपुर गांव में हुई हैं, जबकि मानपुर से ही सटे छैरा, पहावली, पावली, बिलैयापुरा, पड़ावली आदि गांवों में भी अलग-अलग मौकों पर 12 मौतें हुई हैं.

मुरैना पुलिस अधीक्षक सुनील पांडे के मुताबिक, शराब विक्रय का केंद्र छैरा गांव रहा, जहां से मुकेश किरार नामक मुख्यारोपी जानलेवा रसायनों के सहारे बनाई गई शराब को मानपुर सहित अलग-अलग गांवों में पहुंचाता था.

छैरा से ही सप्लाई हुई शराब पीने से मुख्य घटना के करीब आठ दिन बाद मुरैना के ही रंचौली गांव में भी दो मौतें हो चुकी हैं.

मौतों का सिलसिला सोमवार 11 जनवरी को मानपुर गांव से शुरू हुआ था. जब हम मानपुर गांव पहुंचे तो घुसते ही सबसे पहला घर मृतक रामजी लाल राठौर का मिला.

घास-फूस के तीन छोटे-छोटे झोपड़ों में रहने वाला 12 लोगों का यह परिवार मजदूरी करके भरण-पोषण करता है. परिजन बताते हैं कि सोमवार को रामजी शराब पीकर आए थे. रात को जब लगातार उल्टियां होने लगीं तो उन्हें मुरैना अस्पताल ले गए , जहां से उन्हें ग्वालियर रैफर कर दिया गया. ग्वालियर में जाकर उन्होंने दम तोड़ दिया.

गांव के लगभग हर पीड़ित परिवार की यही कहानी है. अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर हैं एवं सभी को दम तोड़ने से पहले उल्टियां, सीने में दर्द, पेट दर्द या अत्यधिक नींद आने की समस्या हुई थी.

कुछ ही कदम की दूरी पर मृतक दिलीप शाक्य की शोक सभा लगी हुई थी. वहां मौजूद ग्रामीणों ने ‘द वायर’ को गांव में शराब बेचने के आरोपी रामवीर राठौर का वह घर और दुकान (गुमटी) भी दिखाई जहां से शराब का विक्रय होता था.

यह घर दिलीप शाक्य के घर के ठीक सामने था. दिलीप ने यहीं से शराब ली थी. न सिर्फ दिलीप ने बल्कि उसके बड़े भाई वीरेंद्र ने भी रविवार रात को यहीं से शराब खरीदकर पी थी. दिलीप दम तोड़ चुका है और वीरेंद्र ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल (जेएएच) में भर्ती हैं.

दिलीप और वीरेंद्र के भतीजे आकाश शाक्य बताते हैं, ‘दिलीप की तबीयत सोमवार दोपहर से बिगड़ना शुरू हुई तो हम शाम चार बजे से एम्बुलेंस को फोन लगा रहे थे, लेकिन कई बार फोन लगाने के बाद भी एम्बुलेंस रात दस बजे पहुंची. अगर एम्बुलेंस समय पर आ जाती तो दिलीप की जान बच सकती थी.’

कुछ ऐसा ही हमें एक अन्य मृतक ध्रुव सिंह के भाई मुरारीलाल ने भी बताया. वे बताते हैं, ‘मेरा भाई भी रविवार को शराब पीकर आया था और तब से लगातार सोता रहा. उसे जगाने पर भी जाग नहीं रहा था. फिर जब सोमवार शाम को सोते वक्त ही उसकी तबीयत बिगड़ी तो हमने एम्बुलेंस के लिए सीएम हेल्पलाइन तक फोन लगाए लेकिन रात तक एम्बुलेंस नहीं आई. तब हम ट्रैक्टर में डालकर उसे मुरैना ले गए . उन्होंने ग्वालियर रैफर कर दिया, जहां उसने दम तोड़ दिया.’

मृतक दिलीप शाक्य की पत्नी और बेटियां.

मृतक दिलीप शाक्य की पत्नी और बेटियां.

दिलीप के पिता रामचंद्र शाक्य बताते हैं, ‘जब गांव में लोग मरने लगे और हर ओर चीख-पुकार व अफरा-तफरी मच गई तो सोमवार रात को दो पुलिस वाले आए, तब जाकर एम्बुलेंस गांव पहुंची. उसके बाद सभी शराब पीने वालों को, फिर वे बीमार हुए हों या न हुए हों, चुन-चुनकर गाड़ियों में भर-भरकर अस्पताल पहुंचाया गया. ’

बता दें कि मुरैना जिला मुख्यालय से महज बीस किलोमीटर की दूरी पर मानपुर गांव स्थित है. फिर भी एम्बुलेंस का छह घंटों तक पीड़ितों की मदद के लिए न पहुंच पाना, व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है जिसके चलते पीड़ितों को समय पर इलाज नहीं मिल सका.

मामले में व्यवस्था की लापरवाही तो हर स्तर पर देखी गई जिसके चलते ही 26 परिवार उजड़ गए जबकि अस्पताल में भर्ती पीड़ितों के परिवार उजड़ने के डर से भयग्रस्त हैं.

ग्रामीण बताते हैं कि क्षेत्र में लंबे समय से अवैध शराब बनाने और बेचने का धंधा चल रहा था. जिसकी कई बार बागचीनी पुलिस थाने में शिकायत भी की, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई. जिसका नतीजा रहा कि गांव की गली-गली में सस्ती अवैध शराब ने अपनी घुसपैठ कर ली.

ग्रामीणों के मुताबिक, सरकारी ठेके पर देशी शराब की बोतल 100-120 रुपये में मिलती है जबकि अवैध शराब की बोतल घर बैठे ही 30 से 50 रुपये में मिल जाती है. इसके चलते एक तरफ तो लोगों में शराब की लत को बढ़ावा मिला, तो दूसरी तरफ अवैध और नकली शराब का कारोबार फलने-फूलने लगा.

वीरेंद्र शाक्य की पत्नी रेखा कहती हैं, ‘जब घर के सामने ही सस्ती शराब बिक रही हो तो आदमी तो ज्यादा पिएगा ही. अगर दूर मिलती तो जाकर लाने में आलस भी करता. अगर इस गांव में जगह-जगह नकली शराब नहीं बिक रही होती तो शायद ये दिन नहीं देखना पड़ता.’

परसादी शाक्य और रमेश शाक्य दोनों सगे भाई हैं. फिलहाल दोनों ही ग्वालियर के जेएएच अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हैं. एक पैर से विकलांग परसादी लाल शराब के असर से अब अपनी आंखों की रोशनी भी खो चुके हैं.

दोनों की पत्नियों मुन्नी और मीरा से हमारी बात हुई. रेखा की तरह ही वे भी कहती हैं, ‘उनके पास पैसे भी नहीं होते थे तो दुकान वाला ये कहकर उधार दे देता था कि जब कमाकर लाए, तब दे देना. अब अगर यही शराब छैरा के सरकारी ठेके पर मिलती तो जिस दिन पैसा नहीं होता, उस दिन वो पी ही नहीं पाते.’

गांव की बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि वीरेंद्र की पत्नी रेखा ने तो अपने पति की शराब की लत छुड़ाने के लिए खुद को आग तक लगा ली थी, लेकिन तब भी उसके पति ने शराब नहीं छोड़ी.

परसादी और रमेश की मां सोनोबाई बताती हैं, ‘शराब के पीछे यहां औरतों की अपने पतियों के साथ खूब लड़ाइयां होती थीं. खूब रोकते-टोकते थे उन्हें, पर वे मानते नहीं थे. मरने को तैयार रहते हैं लेकिन शराब नहीं छोड़ेंगे. जब घर के सामने ही सस्ते में और उधारी में बिक रही हो तो छोड़ते भी तो कैसे?’

अस्पताल में दिलीप शाक्य के भाई वीरेंद्र शाक्य भी जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं. घर पर उनकी पत्नी और बच्चे उनके लिए दुआ कर रहे हैं.

अस्पताल में दिलीप शाक्य के भाई वीरेंद्र शाक्य भी जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं. घर पर उनकी पत्नी और बच्चे उनके लिए दुआ कर रहे हैं.

इन्हीं कारणों के चलते शराब की इस गिरफ्त से गांव को छुड़ाने के लिए कई बार ग्रामीणों ने अपने स्तर पर अनेक पहल भी कीं. मुरारी लाल गांव के पूर्व सरपंच हैं. उनके 50 वर्षीय भाई ध्रुव सिंह और 25 वर्षीय भतीजे कमल किशोर भी जहरीली शराब का शिकार होकर दम तोड़ चुके हैं.

जब उनके घर पहुंचे तो माहौल गमगीन था और ग्रामीणों व परिजनों के बीच बैठकर वे शोक मना रहे थे. उन्होंने बताया, ‘नकली शराब के खिलाफ सबने गांव में खूब आवाज उठाई. कई बार पुलिस थाने में शिकायत भी की. पंचायत जोड़ी, लेकिन जब पहले ही सांठ-गांठ हो तो पुलिस भी कुछ नहीं करती.’

अन्य ग्रामीण भी यही बताते हैं. वे कहते हैं, ‘आज पुलिस, प्रशासन और सरकार शराब माफियाओं के यहां खूब छापेमारी कर रहे हैं. सिर्फ हमारे ही गांव में नहीं, पूरे जिले और प्रदेश से छापेमारी की खबरें आ रही हैं लेकिन पहले जब हमने बागचीनी थाने में कई बार शिकायत की तो कोई कार्रवाई नहीं हुई. उल्टा हमें ही थाने में बिठा लिया जाता था. पहले ही कार्रवाई कर लेते तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता.’

बता दें कि जब से मुरैना में जहरीली शराब के कारण मौतों का सिलसिला शुरू हुआ है, राज्य सरकार के निर्देश पर प्रदेश भर में अवैध शराब निर्माण और विक्रय के खिलाफ अभियान छिड़ गया है.

विभिन्न जिलों में अब तक करोड़ों रुपये की अवैध शराब और निर्माण सामग्री जब्त की जा चुकी है. शराब माफिया के खिलाफ युद्धस्तर पर की जा रही इस कार्रवाई में जब्त शराब और निर्माण सामग्री की विशाल मात्रा बताती है कि राज्य में कितने बड़े पैमाने पर अवैध शराब का धंधा अपने पैर जमाए हुए था, लेकिन जिम्मेदार अफसर कार्रवाई करने के लिए शायद ऐसी ही किसी अनहोनी का इंतजार कर रहे थे.

उल्लेखनीय है कि मुरैना से पहले मई माह में रतलाम में भी 10 लोग जहरीली शराब के चलते जान गंवा चुके हैं. वहीं, अक्टूबर माह में भी उज्जैन में 14 लोगों ने दम तोड़ा था.

तब भी सरकार की ओर से शराब माफिया को जड़ से उखाड़ फेंकने की बातें कही गई थीं और खूब छापेमारी की गई थी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तब अपर गृह सचिव राजेश राजौरा की अध्यक्षता में मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था लेकिन नतीजा वही रहा, ढाक के तीन पात.

क्योंकि, अगर उस घटना से सबक लिया होता तो मुरैना में 29 लोगों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती. मुरैना के मामले में भी राजेश राजौरा की ही अध्यक्षता में उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई गई थी, जिसने 18 जनवरी को अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप भी दी है लेकिन उस पर क्या कार्रवाई हुई है किसी को नहीं पता.

इस संबंध में द वायर  ने राजेश राजौरा से भी संपर्क साधा लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

पुलिस ने मामले में जिन सात लोगों को आरोपी बनाया है. उनमें से छह की गिरफ्तारी हो गई है, जबकि एक अब तक फरार है लेकिन पुलिस अब तक यह पता नहीं लगा पाई है कि जहरीली शराब का निर्माण कहां हो रहा था?

पुलिस अधीक्षक सुनील पांडे बताते हैं, ‘गिरफ्तार आरोपियों में मुख्य आरोपी मुकेश किरार भी है जिसे हम 20 जनवरी को ही चेन्नई से पकड़कर लाए हैं. वह पुलिस रिमांड पर है. उससे पूछताछ के बाद मिले सुरागों के सहारे हम पूरे कांड की जड़ तक पहुंचने की कोशिश करेंगे, तभी तस्वीर साफ हो पाएगी कि इस शराब का निर्माण कहां हो रहा था और निर्माण के लिए जरूरी ओपी (ओवरप्रूफ स्प्रिट) अल्कोहल कहां से आ रहा था?

बहरहाल, गिरफ्तार आरोपियों में एक रामवीर राठौर भी है. रामवीर राठौर ने स्वयं भी वह जहरीली शराब पी थी. नतीजतन वह भी ग्वालियर के जेएएच अस्पताल में भर्ती है और अपनी आंखों की रोशनी खो चुका है.

रामवीर की ही बेची जहरीली शराब के कारण उसके एक बड़े भाई की भी मौत हो चुकी है. रामवीर के भतीजे रामसेवक राठौर बताते हैं, ‘हमने रामवीर के परिवार से सालों पहले रिश्ता तोड़ लिया था और कई बार गांव वालों से दबाव भी बनवाया कि वह शराब बेचना छोड़ दे लेकिन वह हमें अपशब्द बोलकर हमारी गरीबी का मजाक बना देता था.’

वे आगे बताते हैं, ‘साल भर पहले ग्रामीणों ने होली पर गांव के सती माता मंदिर पर सौगंध ली थी कि न यहां कोई शराब बनाएगा, न बेचेगा और न पिएगा. 5,000 का जुर्माना भी रखा था. लेकिन, दबंगों के आगे किसी की नहीं चली क्योंकि हमें पुलिस से मदद नहीं मिली.’

आरोपी रामवीर राठौर इसी गुमटी से शराब बेचा करता था.

आरोपी रामवीर राठौर इसी गुमटी से शराब बेचा करता था.

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में महीनों तक पुलिस का चक्कर नहीं लगता था जिसके चलते नकली शराब और जुए-सट्टे का धंधा यहां फलता-फूलता रहा. पुलिस तब ही आती थी जब कोई वारदात हो जाती थी. इसलिए ग्रामीणों की मांग है कि छैरा गांव में एक पुलिस चौकी बनाई जाए.

इसके अलावा भी पीड़ित परिवारों की और भी मांगे हैं. जैसा ऊपर बताया कि सभी के आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं इसलिए मृतकों के परिवार को उम्मीद है कि शासन की तरफ से उनकी आर्थिक मदद की जाएगी.

मदद की उम्मीद में मृतक सरनाम सिंह का परिवार भी है. सरनाम किराए की जमीन पर खेती किया करते थे. जब खेती का काम नहीं होता था तो दिहाड़ी पर मजदूरी करने जाते थे.

सरनाम मृत्यु से पहले दो बेटियों का तो विवाह कर गए थे लेकिन तीन बेटियां अभी अविवाहित हैं और सातवीं, नवीं व दसवीं कक्षा की छात्रा हैं. जबकि एक लड़का है जो तीसरी कक्षा का छात्र है.

सरनाम के परिवार के सामने अब बच्चों को पढ़ाने और विवाह करने का संकट आन खड़ा हुआ है. सरनाम के 70 वर्षीय वृद्ध पिता अमरसिंह कहते हैं, ‘चार-छह हजार की अगर मदद भी हो जाएगी तो उससे क्या होता है? बच्चियों के नाम कुछ पैसा डाल देते तो उनका ब्याह-शादी हो जाता.’

गौरतलब है कि सभी मृतकों के परिजनों को अब तक कलेक्टर की ओर से दस-दस हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिली है, जबकि राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गांव के दौरे के दौरान अपनी ओर से मृतकों के परिवारों को 50-50 हजार रुपये देने की घोषणा की है.

भविष्य सिर्फ सरनाम के बच्चों का ही दांव पर नहीं है. सरनाम की तरह ही दिलीप शाक्य की भी छह बेटियां और एक बेटा है जिनकी उम्र एक से 14 साल तक के बीच है. इसी तरह अस्पताल में भर्ती वीरेंद्र शाक्य के भी चार बेटियां और एक बेटा है जिनकी उम्र 10 से 16 साल के बीच है. एक अन्य मृतक जीतेंद्र जाटव की भी पांच बेटी और एक बेटा हैं. वे सब भी नाबालिग हैं.

मृतक सरनाम के 70 वर्षीय पिता रामसेवक यह सोच-सोचकर चिंतित हैं कि अब सरनाम की तीन बेटियों और बेटों का पालन-पोषण कैसे होगा.

मृतक सरनाम के 70 वर्षीय पिता रामसेवक यह सोच-सोचकर चिंतित हैं कि अब सरनाम की तीन बेटियों और बेटों का पालन-पोषण कैसे होगा.

अधिकांश मृतक विवाहित ही हैं और आर्थिक कमजोर तबके से हैं जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं. इसलिए परिजनों की मांग है कि सरकार अवैध शराब की बिक्री नहीं रोक पाई, इसलिए अब मुआवजे के तौर पर मृतकों के बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाए और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए. हालांकि, अब तक सरकार की तरफ से ऐसी कोई भी घोषणा नहीं की गई है.

मानपुर गांव के ही अंकित सिंह बीएससी तक पढ़ चुके हैं और आगरा में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. उनके पिता धर्मेंद्र सिंह की जान भी जहरीली शराब ने ली है.

वे बताते हैं, ‘दो साल पहले ही मां चल बसी थीं. अब पापा भी छोड़कर चले गए . मेरा छोटा भाई 12वीं का छात्र है. हम दोनों अनाथ हो गए हैं. मेरे पास कोई काम नहीं है. मेरे और भाई के भविष्य का क्या होगा?’

वे आगे कहते हैं, ‘मेरे पिता तो कभी-कभार ही शराब पीते थे. उनकी मौत के लिए पुलिस, प्रशासन और सरकार ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उनकी सरपरस्ती से ही यहां जहरीली शराब का धंधा फल-फूल रहा था. इसलिए मुझे सरकारी नौकरी दी जाए ताकि मैं अपना और अपने भाई का भविष्य संवार सकूं.’

ऐसी ही मांग ध्रुव सिंह के बेटे सचिन चौहान और छैरा गांव के मृतक रमेश वाल्मिक के बेटे आकाश की भी है.

बता दें कि छैरा गांव निवासी सफाईकर्मी रमेश वाल्मिक की मौत मानपुर की मुख्य घटना के तीन दिन बाद 14 जनवरी को हुई थी. मानपुर में हुई मौतों के बाद जब प्रशासन ने छैरा में शराब बेचने वालों पर कार्रवाई की तो उन्होंने शराब खेतों और तालाबों में छिपा दी थी.

पुलिस ने छापे मारकर वह जहरीली शराब जब्त तो कर ली लेकिन कुछ बोतल वहीं छूट गई थीं जो छैरा निवासी पंजाब किरार, रमेश वाल्मिक और यूपी से आए रमेश के रिश्तेदार कैलाश के हाथ लग गईं.

मुफ्त की शराब के लालच में आकर तीनों ने जहरीली शराब का सेवन कर लिया और गुरुवार 14 जनवरी को सभी ने दम तोड़ दिया.

मायूसी में डूबे 18 वर्षीय आकाश बताते हैं, ‘पिछले दिनों ही कर्ज लेकर बहन की शादी की थी. जिसे पटाने में पिता की मदद करने के लिए मैं और छोटा भाई विकास शहर जाकर मजदूरी करने लगे थे. पिता जी अब नहीं रहे. सरकार बस मुझे एक नौकरी दे दे, नहीं तो घर बेचना पडेगा.’

आर्थिक सहायता और भरण-पोषण के मसले पर प्रशासन का पक्ष जानने के लिए द वायर  ने मुरैना कलेक्टर बी. कार्तिकेयन से संपर्क साधने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

वहीं शासन का पक्ष रखते हुए भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री और प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘इस मसले पर सरकार के निर्णय की मुझे जानकारी नहीं है लेकिन हमारी सरकार द्वारा चलाई जा रही संबल योजना के अंतर्गत दुर्घटना में मृत्यु होने पर गरीब परिवार को चार लाख रुपये देने का प्रावधान है. साथ ही गरीब परिवारों के लिए राशन और निशुल्क शिक्षा का भी प्रावधान है.’

बहरहाल, ग्रामीणों को डर इस बात का भी है कि इस घटनाक्रम के बाद भी दोषियों का कुछ नहीं बिगड़ेगा और मामला ठंडा पड़ते ही जहरीली शराब का कारोबार फिर से शुरू हो जाएगा.

बात सही भी है क्योंकि उज्जैन की घटना के बाद भी यही हुआ था. तब संबंधित थाना प्रभारी समेत चार पुलिसकर्मियों को निलंबित करके खानापूर्ति कर दी गई थी. उसके बाद धीरे-धीरे शराब माफिया के खिलाफ भी मुहिम ठंडी पड़ गई.

घटना के संबंध में कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा अब तक मुरैना कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, जौरा एसडीओपी, उपनिरीक्षक आबकारी विभाग, जिला आबकारी अधिकारी को हटा दिया गया है. बागचीनी थाने के पूरे स्टाफ को भी निलंबित कर दिया गया है.

वहीं, प्रदेश में फलते-फूलते अवैध शराब के धंधे के लिए जानकार प्रदेश सरकार की आबकारी नीति को जिम्मेदार ठहराते हैं क्योंकि पूर्व कांग्रेस सरकार ने आबकारी नीति में बदलाव किया था. जिसके तहत एक पूरे जिले में शराब बेचने का ठेका केवल एक ठेकेदार को दिया जाता है.

सरकार का लक्ष्य था, अधिक से अधिक राजस्व की प्राप्ति. बढ़ा हुआ राजस्व सरकार को मिला भी लेकिन इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई और ठेकेदार मनमाने दाम वसूलने लगा.

बता दें कि पूरे देश में सबसे महंगी शराब मध्य प्रदेश मे ही बेची जा रही है. जब भाजपा की सरकार आई तो उसने भी कांग्रेस की ही आबकारी नीति को अपना लिया. फिर कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन के कारण जब प्रदेश भर के ठेकेदारों को नुकसान उठाना पड़ा तो उन्होंने उस नुकसान की भरपाई करने के लिए एमआरपी से अधिक दामों में शराब बेचना शुरू कर दिया.

जब 75 रुपये की एमआरपी वाला देशी शराब का क्वार्टर 100-120 रुपये में बेचा जाने लगा तो अवैध शराब निर्माताओं की चांदी हो गई. उन्होंने नकली शराब का उत्पादन बढ़ा दिया और कम आमदनी वाला गरीब तबका भी 40-50 रुपये में उपलब्ध नकली शराब हाथों-हाथ खरीदने लगा.

उच्च स्तरीय जांच समिति के अध्यक्ष राजेश राजौरा ने भी मीडिया से बात करते हुए यह स्वीकारा कि प्रदेश में शराब के बढ़े हुए दामों के चलते ही अवैध शराब का धंधा फल-फूल रहा है और आबकारी नीति में बदलाव करने की जरूरत है.

इस घटना के बाद जिस स्तर पर प्रदेश भर में अवैध शराब पकड़ी जा रही है, उससे आबकारी विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में आ गई है कि वह अब तक कर क्या रहा था?

राजेश राजौरा ने भी आबकारी विभाग और उसके उड़नदस्ते की कार्यशैली की आलोचना की है. इस संबंध में जब प्रदेश आबकारी आयुक्त राजीव चंद्र दुबे से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया है.

पूरे मामले पर सरकार का पक्ष रखते हुए रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘सरकार ने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की है जिसमें पुलिसकर्मी भी शामिल हैं और उच्च अधिकारियों के भी स्थानांतरण किए हैं. प्रदेशभर में शराब माफियाओं के खिलाफ धरपकड़ अभियान जारी है. वहीं, यदि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृति होती है तो उसके लिए उच्च अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे दोषी माने जाएंगे.’

वे आगे बताते हैं, ‘ये घटना क्यों घटी? अवैध शराब क्यों बन रही है? उसे रोकने के लिए क्या उपाए किए जा सकते हैं? इन प्रश्नों के समाधान के लिए भी सरकार दीर्घकालिक योजना पर काम कर रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटना न हो.’

इस बीच ग्वालियर के जेएएच अस्पताल में भर्ती मरीजों से मिलने की अनुमति अस्पताल प्रबंधन ने नहीं दी. अस्पताल अधीक्षक डॉ. आरकेएस धाकड़ ने बस मरीजों के स्वास्थ्य की जानकारी देते हुए बताया है, ‘एल्कोहल पॉइजनिंग में कई मर्तबा कुछ लेट प्रजेंटेशन डिजीज सामने आते हैं, जैसे कि अब पीडितों के दिल, गुर्दों और आंखों में समस्याएं देखी जा रही हैं. इसलिए कह नहीं सकते कि कब तक उन्हें देखरेख में रखा जाएगा.’

बहरहाल, मानपुर गांव के लोग बताते हैं कि मौतों का आंकड़ा कई गुना अधिक बढ़ सकता था लेकिन रविवार-सोमवार के दरमियान ही शराब बेचने वाले रामवीर राठौर की मां का निधन हो गया था, जिसके चलते उसकी शराब की गुमटी बंद थी. केवल उसके करीबियों को ही उस दिन उसने घर से शराब मुहैया कराई थी.

ग्रामीण बताते हैं कि अगर रामवीर की मां का निधन न हुआ होता और गुमटी खुली होती तो सिर्फ मानपुर में ही नहीं, आसपास के गांवों में भी अनेकों मौतें और हो गई होतीं क्योंकि आसपास के गांवों के लोग भी रामवीर के यहां से ही शराब खरीदते थे.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)