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कृषि क़ानून: जिस संगठन के प्रमुख को सुप्रीम कोर्ट की समिति में चुना गया, उससे जुड़े रहे हैं सीजेआई बोबडे

वकील के तौर पर काम करने के दौरान जस्टिस एसए बोबडे शेतकारी संगठन से जुड़े थे, जिसके प्रमुख अनिल घनवट कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे किसानों से बात करने के लिए बनाई गई सुप्रीम कोर्ट की समिति में हैं. घनवट बोबडे के संगठन से अलग होने के बाद उभरे, पर वरिष्ठ किसान नेताओं ने उनके चयन पर सवाल उठाए हैं.

सीजेआई एसए बोबडे. (फोटो: पीटीआई)

सीजेआई एसए बोबडे. (फोटो: पीटीआई)

नागपुर: भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे का शेतकारी संगठन से नजदीकी संबंध रहे हैं, जिसके अध्यक्ष अनिल घनवट को पिछले दिनों तीन नए कृषि कानूनों पर प्रदर्शन कर रहे किसानों और सरकार के बीच मध्यस्थता करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति का सदस्य चुना गया है. हजारों किसान, खासतौर पर पंजाब और हरियाणा के सरकार से नए कानूनों को वापस लिए जाने की मांग के साथ दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर दो महीनों से अधिक से प्रदर्शन कर रहे हैं.

हालांकि सीजेआई की ओर से किसी भी तरह के प्रत्यक्ष हितों के टकराव की झलक नहीं मिलती है, लेकिन इस समिति की संरचना को लेकर यह सवाल जरूर उठे हैं कि इसमें शामिल नामों का चयन किस आधार पर किया गया है.

किसान संगठनों ने इस समिति से यह कहते हुए बात करने से इनकार कर दिया है कि इसके सदस्य तीनों नए विवादस्पद कानूनों का खुले तौर पर समर्थन कर चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह मान और शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवट, अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के दक्षिण एशिया के पूर्व निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को नामित किया था.

सदस्यों को लेकर हुई आलोचना के बाद सीजेआई बोबडे की पीठ ने कहा था कि किसी व्यक्ति की कृषि कानूनों को लेकर पूर्व में की गई कोई टिप्पणी या विचार उसे अपात्र बताने का आधार नहीं हो सकता, वकीलों के अनुसार यह वही तर्क है जो हितों के टकराव के बने-बनाए सिद्धांत को लेकर दिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता जय देहाद्रि कहते हैं, ‘सीजेआई की समिति की संरचना हितों के टकराव के मूल दो बिंदुओं पर खरी नहीं उतरती है. सदस्यों के पूर्व विचार असल में उनके वास्तविक और प्रत्यक्ष पूर्वाग्रह को दिखाते हैं और आदर्श तौर पर किसी भी समिति, जो ये कानून संवैधानिक हैं या नहीं, को लेकर फैसला करती है में नहीं होना चाहिए. यह आश्चर्यजनक है कि सीजेआई ने ऐसा होना दिया. शायद उन्हें इसके बारे में बहुत बाद में मालूम चला.’

किसानों के कानूनों के पक्ष में होने के आरोपों के बाद मान ने खुद को समिति से अलग कर लिया था, बाकी सदस्य अब भी समिति में हैं.

वकील के तौर पर बोबडे की पृष्ठभूमि

1980 के दशक में एक नौजवान वकील के बतौर जस्टिस बोबडे संगठन से काफी करीब से जुड़े हुए थे और इसके संस्थापक शरद जोशी के दोस्त भी थे, जो नागपुर में अक्सर उनके घर में ठहरा करते थे.

नागपुर में रहने वाले कृषि कार्यकर्ता और शरद जोशी के शेतकारी संगठन के सदस्य रह चुके विजय जावंधिया ने द वायर  को बताया, ‘1983-86 के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने शरद जोशी और जीवनराव चांडक जैसे हमारे नेताओं पर एक प्रदर्शन के बाद रासुका लगा दी थी. हमारे वरिष्ठ नेता नागपुर जेल में थे. राम जेठमलानी हमारे नेताओं की हाईकोर्ट में पैरवी करने के लिए नागपुर आए थे और यहां शरद बोबडे के घर रुके थे. तबसे बोबडे परिवार का शेतकारी संगठन से नाता जुड़ा. उनके (शरद बोबडे के) पिता किसानों के मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील थे और उन्होंने कपास किसानों के मुद्दों पर जनहित याचिका भी दायर की थी. मैं उस मामले का पक्षकार था.’

उन्होंने आगे बताया, ‘बोबडे परिवार का शेतकारी संगठन के प्रति जुड़ाव इसके बाद भी बढ़ता रहा. संगठन दिवालिया याचिकाएं दायर कर रहा था, तब राम जेठमलानी ने सलाहकार के तौर पर हमारा सहयोग किया और शरद बोबडे ने विदर्भ क्षेत्र में हर तरह की मदद की. उस समय उनका नागपुर वाला घर संगठन के नेताओं का घर बन गया था. उन्होंने अपने काम के लिए एक पैसा तक नहीं लिया. उन्होंने हमारे साथ बिल्कुल एक कार्यकर्ता की तरह काम किया.’

जावंधिया 1986-87 में महाराष्ट्र में संगठन के अध्यक्ष रहे हैं और साल 1982 के करीब उन्होंने ऑल इंडिया किसान कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक और अध्यक्ष की जिम्मेदारी उठाई है.

महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनसे पहले राज्य की सत्ता संभालने वाले देवेंद्र फडणवीस, दोनों ही सीजेआई बोबडे को सम्मानित करते हुए उनकी किसानों को लेकर प्रतिबद्धता की तारीफ कर चुके हैं.

1993 से संगठन, जो तब तक बिना सदस्यों और संविधान के एक अनौपचारिक संस्था की तरह काम कर रहा था, विभिन्न टुकड़ों में बंटने लगा. जावंधिया, चंद्रकांत वानखेड़े, राजू शेट्टी, सदाभाऊ खोट और गजानन अमदाबादकर जैसे लोग संगठन से अलग हो गए. कुछ ने अपना कोई संगठन बना लिया, तो कुछ जावंधिया की तरह स्वतंत्र तौर पर काम करते रहे.

जावंधिया और शरद जोशी के बीच मुक्त-बाजार नीतियों को लेकर गंभीर मतभेद था. जोशी हमेशा बाजार के पक्ष में रहते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को खत्म करना चाहते थे. जावंधिया कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की समिति के सदस्य अनिल घनवट आज भी इसी नीति को मानते हैं.

जावंधिया ने संगठन तो छोड़ दिया लेकिन आज भी वे खुद को शेतकारी संगठन का सदस्य कहते हैं और कृषि क्षेत्र के एक कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं. वे याद करते हुए बताते हैं, ‘जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, तब हमने नागपुर में उनके सम्मान में एक समारोह आयोजित किया था और इस कार्यक्रम के अध्यक्ष शरद बोबडे थे. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री वीपी सिंह उस रात नागपुर में ही रुके थे और रात का खाना बोबडे के घर ही खाया था.

जावंधिया ने आगे बताया, ‘शरद जोशी जब भी नागपुर आया करते तब मेरे यहां ही रहते लेकिन 1993 में जब उन्होंने मुक्त बाजार का समर्थन किया, तब मैंने शेतकारी संगठन से दूरी बना ली. इसके बाद जब वो नागपुर आते, तब शरद बोबडे के यहां ठहरते. मेरे भी बोबडे साहब से निजी संबंध हैं, आज भी उन्हें दोस्त तो कह ही सकता हूं.’

यह पूछे जाने पर कि क्या उन दिनों में शरद बोबडे और अनिल घनवट के बीच कोई नाता था, जावंधिया ने कहा कि 1993 के करीब वे घनवट को शेतकारी संगठन के स्थानीय कार्यकर्ता के बतौर जानते थे.

बोबडे का संगठन से अलग होना

नागपुर में शरद जोशी के एक अन्य संगठन स्वतंत्र भारत पक्ष के एक पूर्व कार्यकर्ता ने द वायर  से गोपनीयता की शर्त पर बात की और दावा किया कि बोबडे ने जज बनने के बाद शेतकारी संगठन से खुद को अलग कर लिया था.

उन्होंने बताया, ‘उन्होंने घनवट के साथ कभी काम नहीं किया.’ यही बात घनवट भी दोहराते हैं.

अनिल घनवट ने द वायर  से बात करते हुए कहा, ‘शरद जोशी के भारत की अधिकतर नामी-गिरामी हस्तियों के साथ नजदीकी रिश्ते थे. मुझे इस (बोबडे के शेतकारी संगठन से जुड़ाव) बारे में मालूम नहीं था. मुझे शरद बोबडे नाम के किसी शख्स के बारे में तब पता चला, जब वे देश के सीजेआई बने. मैं 1995 में शेतकारी संगठन का पूर्णकालिक सदस्य बना था. मैंने कभी ये नाम नहीं सुना और न ही संगठन में कभी इसका जिक्र हुआ. मेरे पास तो उनका फोन नंबर भी नहीं है.’

गजानन अमदाबादकर संगठन की महाराष्ट्र इकाई के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. 2004 में उन्होंने संगठन छोड़कर राजू शेट्टी के साथ स्वाभिमानी शेतकारी संगठन बनाया था.

उन्होंने भी बोबडे के शरद जोशी के साथ सक्रिय रूप से काम करने की पुष्टि की. उन्होंने बताया, ‘यह सच है कि शरद बोबडे शेतकारी संगठन से जुड़े हुए थे, उनके पिता भी संगठन के करीबी थे.’

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें बोबडे और घनवट का साथ काम करना याद है, उन्होंने बताया, ‘नहीं, अनिल संगठन में बहुत बाद में उभरे, जब अधिकतर प्रभावशाली नेता संगठन छोड़ चुके थे. बोबडे का जुड़ाव संगठन से तब खत्म हुआ जब शरद जोशी गुजर गए और संगठन भी कुछ अप्रासंगिक हो गया. शरद बोबडे का योगदान यह था कि वे शेतकारी संगठन के कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर मुकदमे लड़ा करते थे. जब संगठन ने अपनी प्रासंगिकता खो दी, तब उनकी भूमिका भी ख़त्म हो गई.’

फिर भी घनवट के समिति में चयन पर सवाल तो हैं

अमदाबादकर का कहना है कि घनवट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति में जगह इसलिए मिली क्योंकि वे नए विवादित कृषि कानूनों का समर्थन कर चुके थे और एक कृषि संगठन के प्रमुख हैं.

जावंधिया का भी यही कहना है कि उन्हें जब समिति के गठन और किसानों के प्रतिनिधियों के मुक्त बाजार के खुले तौर पर समर्थक होने के बारे में मालूम चला तो वे ‘चकित’ रह गए.

जावंधिया ने कहा, ‘यह समिति किसान-समर्थक तो हो ही नहीं सकती. पी.साईनाथ क्यों नहीं हैं इसमें? क्योंकि सरकार उनको बर्दाश्त नहीं कर सकती. लेकिन फिर भी यह एक अंदाज़ा ही है. मुझे लगता है कि घनवट और पूरे शेतकारी संगठन का इस पूरे मुद्दे को लेकर जो रवैया है वो राजनीतिक अवसरवादिता है. जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, तब शरद जोशी ने उनके लिए एक राष्ट्रीय कृषि नीति का मसौदा तैयार किया था. सिंह ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, लेकिन जोशी ने इसे ‘आधिकारिक नीति’ बताते हुए 25 जनवरी 1991 प्रकाशित किया. इस नीति में साफ तौर पर सरकार के दखल की सिफारिश की गई थी, लेकिन जैसे ही नरसिम्हा राव की सरकार आई, जोशी फ्री इकोनॉमी (मुक्त अर्थव्यवस्था) के समर्थक बन गए. उससे बड़ी राजनीतिक अवसरवादिता क्या होगी? यह दिखाता है कि उनकी नीतियां सरकार बदलने के साथ ही बदल जाती हैं. शरद जोशी किसानों के आंदोलन का हिस्सा बनने से पहले नौकरशाह थे और आखिर में उन्हें कृषि कार्यकर्ता के तौर पर नौकरशाह से अधिक ही मिला. यही वजह है कि किसानों का आंदोलन विचलित हो गया.’

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें घनवट के समिति में होने और सीजेआई के उनके संगठन से रहे जुड़ाव को लेकर कोई हितों का टकराव नजर आता है, जावंधिया ने कहा, ‘शरद बोबडे ने इस मामले की सुनवाई की शुरुआत में बहुत अच्छा स्टैंड लिया था और सरकार से मुश्किल सवाल पूछे थे. उनकी इन कानूनों को कुछ समय स्थगित रखने को लेकर की गई टिप्पणियों से मुझे राहत-सी महसूस हुई थी लेकिन अब आप इस समिति के सदस्यों को देखिए. मैं हैरान हूं कि ऐसे लोगों को समिति में क्यों रखा गया. मैं इस समिति से खुश नहीं और सीजेआई इससे बेहतर कर सकते थे. जो लोग नए कानूनों के खिलाफ राय रखते हैं, उन्हें समिति में जगह मिलनी चाहिए थी. लेकिन मैं उन्हें (सीजेआई) संदेह का लाभ दे रहा हूं. हो सकता है कि सरकार असहमत होने वालों को स्वीकार नहीं करती और इसीलिए ऐसी समिति बनाई गई.’

शेतकारी संगठन से जुड़ाव को लेकर देश के मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल के जरिये सवालों की सूची भेजी गई है, जिस पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है. कोई भी जवाब मिलने पर उसे रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)