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उत्तर प्रदेश की राजनीति से नौकरशाहों का पुराना नाता है

हाल ही में गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते माने जाने वाले अरविंद कुमार शर्मा वीआरएस लेकर भाजपा में शामिल हुए और दूसरे ही दिन उन्हें विधान परिषद के टिकट से निर्विरोध प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया.

यूपी भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के साथ पूर्व आईएएस अरविंदकुमार शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

यूपी भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के साथ पूर्व आईएएस अरविंदकुमार शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश में नौकरशाहों का राजनीति प्रेम नया नहीं है. कुछ नौकरशाह अपनी पूरी सेवाएं देने के बाद रिटायर होकर नेता बनने के चक्कर में लुढ़क जाते है, तो कुछ शीर्ष पर पहुंच जाते हैं.

कुछ अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा की तरह चट मंगनी पट ब्याह की शैली में अवतरित होते हैं तो कुछ टिकट मिलने के प्रयास में ही लगे रहते हैं.

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते आंखों के तारे नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा उत्तर प्रदेश में अवतरित हुए. चट से वीआरएस लिया, पट से भाजपा में शामिल हुए और दूसरे ही दिन विधान परिषद के टिकट से निर्विरोध उत्तर प्रदेश विधान परिषद के माननीय सदस्य बन गए.

अरविंद कुमार शर्मा मऊ के काजाखुर्द गांव के रहने वाले हैं. एक समय में मऊ में कांग्रेस के लोकप्रिय नेता कल्पनाथ राय हुआ करते थे, जो वहां के विकास के लिए जाने जाते थे.

गुजरात कैडर, मुख्यमंत्री कार्यालय तथा केंद्र में प्रधानमंत्री कार्यालय में रहकर शर्मा मऊ के लिए कुछ नहीं कर सके. अब राजनीति की नई पारी में उनकी परीक्षा होनी है.

शीर्ष नेतृत्व उन्हें यूं ही प्रदेश में स्वैच्छिक सेवानिवृति दिलाकर नहीं लाया है. भविष्य की राजनीति में वह हिंदुत्व के एजेंडा के साथ विकास का एजेडा भी सेट करना चाह रहा है और उसके जरिये से उत्तर प्रदेश की सरकार को भी देखना चाह रहा है. इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर उन्हें महत्वपूर्ण पद दिए जाने की उम्मीदों को पंख लग चुके हैं.

अरविंद्र कुमार शर्मा के भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने सवाल उठाया था ‘शर्मा को बताना चाहिए कि वे अब तक सरकारी सेवा कर रहे थे या एक पार्टी की सेवा में लगे थे.’

भाजपा में शामिल होने पर शर्मा ने कहा कि ‘मुझे निर्देश दिया गया था भाजपा में शामिल होने का….’ हालांकि यह निर्देश किसने दिया था इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया.

नौकरशाहों का उत्तर प्रदेश के लिए राजनीतिक प्रेम पुराना है. आजादी के बाद प्रदेश में संभवतः पहला वाकया रहा होगा जब अयोध्या में दिसंबर 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी जाने के बाद फैजाबाद के डीएम केकेके नायर आईसीएस (कृष्ण करूणाकरण नायर)निलंबन और बहाली के बाद सेवामुक्ति लेकर 1952 में जनसंघ में शामिल हो गए थे.

उनकी पत्नी हिंदू महासभा के टिकट पर पडे़ासी जिले से सांसद चुनकर लोकसभा पहुंच गई थीं. नायर पहले प्रयास में खुद तो हार गए थे लेकिन उनकी पत्नी और उनका ड्राइवर चुनाव जीत गया था. नायर 1967 में जनसंघ के टिकट पर बहराइच से लोकसभा पहुंच गए थे.

अयोध्या में 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के आरोप में तत्कालीन एसएसपी आईपीएस देवेंद्र बहादुर राय (डीबी राय) निलंबन और बर्खास्तगी के बाद अगले ही चुनाव में फैजाबाद के पड़ोसी जिले सुल्तानपुर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा के सांसद चुन लिए गए.

श्रीचन्द्र दीक्षित आईपीएस अधिकारी और फैजाबाद के एसपी एवं प्रदेश की पुलिस महानिदेशक(1984) रहे. अस्सी के दशक में भाजपा में शामिल हुए विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष हुए और राममंदिर आंदोलन के दौरान उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही.

कारसेवकों को 1990 में विवादित परिसर में पहुंचाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही. भाजपा से वे वाराणसी से सांसद निर्वाचित हुए. यह सीट पहली बार भाजपा ने जीती.

पूर्व आईपीएस और विहिप नेता अशोक सिंघल के भाई बीपी सिंघल भी भाजपा में शामिल होने के बाद राज्यसभा भेजा गया था.

मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश की मुख्य सचिव रहीं नीरा यादव के पति महेंद्र सिंह यादव आईपीएस से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर भाजपा में शामिल हुए और विधायक निर्वाचित हुए थे.

वैसे तो नौकरशाहों की राजनीति से कोई पार्टी मुक्त नहीं है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में नौकरशाहों को महत्वपूर्ण जगहें और प्रतिनिधित्व मिला है. दो दशकों में इसकी गति में तेजी आ गई है.

मायावती सरकार के दौरान अतिप्रिय अधिकारियों में पन्नालाल पूनिया आईएएस तथा बृजलाल आईपीएस थे. पूनिया प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री रहे, तो बृजलाल पुलिस महानिदेशक के पद से रिटायर हुए.

आश्चर्य यह हुआ कि पूनिया ने कांग्रेस की शरण में चले गए और एक दलित चेहरा बनकर बाराबंकी से लोकसभा टिकट पाकर सांसद बन गए और बृजलाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए और अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए. बाद में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया.

आईएएस अधिकारी रहे देवी दयाल रिटायर होने के बाद कांग्रेस में शामिल होकर लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन वे लोकसभा नहीं पहुंच सके.

कांग्रेस में शामिल होने वालों की भी अच्छी खासी तादाद रही है. आईएएस रहे राजबहादुर, ओमप्रकाश ने रिटायर होकर कांग्रेस की सदस्यता ली. एपीसी रहे आईएएस अधिकारी अनीस अंसारी ने भी रिटायर होने के बाद कांग्रेस की सदस्यता ली.

आईपीएस अधिकारी रहे अहमद हसन ने रिटायर होकर समाजवादी पार्टी का रास्ता पकड़ा तो उसी के हो गए. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री, विधान परिषद सदस्य और परिषद में अब नेता विपक्ष की भूमिका में हैं.

लोकसभा 2019 के चुनाव के ऐन वक्त पर इस्तीफा देकर पीसीएस अधिकारी रहे श्याम सिंह यादव बहुजन समाज पार्टी की सदस्यता लेते ही लोकसभा का टिकट पाकर लोकसभा के सांसद हो गए.

तकनीकी सेवा के पूर्व अधिकारी पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता के रूप में सेवानिवृत्त हुए त्रिभुवन राम (टीराम) बसपा में शामिल होकर विधायक बन गए. बाद में भारतीय जनता पार्टी की शरण में चले गए.

एसके वर्मा, आरपी शुक्ला और बाबा हरदेव सहित नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद राष्ट्रीय लोक दल में शामिल हो गए, कुछ ने अपनी अलग पार्टी बना ली.

पूर्व आईएएस अधिकारी चंद्रपाल ने अपनी आदर्श समाज पार्टी बनाई और पूर्व पीसीएस तपेंद्र प्रसाद ने सम्यक पार्टी बनाई. दोनों ही ज्यादा राजनीति नहीं कर सके.

अधिकारियों के भी इस राजनीति प्रेम के अपने तर्क हैं उनका कहना है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों के लोग राजनीति में जा सकते हैं तो नौकरशाह क्यों नहीं। सेवा में रहते हुए उनका वास्ता तो जनता से ही पड़ता है और वे सेवा करने के लिए ही नौकरियों में आते हैं यदि रिटायर होने के बाद राजनीति में आकर पुनः वे सेवा करना चाहते हैं तो क्या बुरा है.

नौकरशाहों की कौन कहे, अब तो न्यायाधीश भी रिटायर होेकर लोकसभा, राज्यसभा पहुंचना चाहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगाई बिना किसी पार्टी में शामिल हुए रिटायर होते ही राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा नामित कर दिए गए. जबकि न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा ने लंबा समय व्यतीत करने के बाद कांग्रेस में शामिल होकर राज्यसभा के सांसद बने.

जहां तक नौकरशाहों के राजनीतिक प्रेम का प्रश्न है कोई भी व्यक्ति अपनी विचारधारा से किसी पद पर रहकर उससे मुक्त नहीं हो सकता है उसका प्रभाव उसके कार्यो पर परोक्ष या अपरोक्ष तरीके से पड़ता ही है.

ऐसे में जब वह किसी पार्टी का हिस्सा हो जाता है तब प्रथमदृष्टया यही लगता है कि जरूर उसने सेवावधि में निष्पक्ष रहकर अपने कार्यो को अंजाम नहीं दिया होगा.

नौकरशाह हमेशा अपने को राजनेताओं की अपेक्षा सर्वोच्च समझता है. सेवा की लंबी पारी का उनका अनुभव अवश्य होता है लेकिन अब तक जो लोग सेवा के बाद राजनीति में आए, उससे कोई भी आमूलचूल परिवर्तन नहीं कर सके.

इससे यही लगता है कि सेवा में रहते हुए वे राजनीतिक स्वार्थो से मुक्त नहीं रहते हैं और किन्हीं भावी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कार्य कर रहे होते हैं.

आईपीएस-आईएएस जो एक लंबी अवधि तक सेवा कर चुके होते हैं, जो काम वे अपने इतनी लंबी सेवा अवधि में जनसेवा में नहीं कर पाए, जब उनके पास असीमित अधिकार थे, क्योंकि राजनेता के कार्यो को अंजाम देने का कार्य नौकरशाह के रूप में वहीं कर रहे होते हैं, उसे करने के वादे अक्सर दिखावा-सा लगते हैं.

जिस प्रकार न्यायाधीशों के लिए नियम है कि रिटायर होने के बाद वे उन अदालतों में वकील के रूप में प्रैक्टिस नहीं कर सकते, उसी प्रकार रिटायर होने के तत्काल बाद नौकरशाह राजनीतिक पारी में शामिल न हो सके, इसके लिए उन्हें पांच या दस वर्षो के लिए रोका जाना चाहिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और अयोध्या से प्रकाशित जनमोर्चा अख़बार से जुड़ी हैं.)