राजनीति

कर्नाटक सरकार के आदेश के बाद अदालतों ने सांप्रदायिक हिंसा के 21 मामले वापस ले लिए थे

कर्नाटक की विभिन्न अदालतों का यह फ़ैसला राज्य की भाजपा सरकार के 31 अगस्त 2020 के आदेश पर आधारित है. सरकार के क़दम से मैसूर से भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा, हिंदुत्ववादी संगठनों के 206 सदस्यों और 106 मुस्लिमों को राहत मिली है.

बीएस येदियुरप्पा. (फोटो: पीटीआई).

बीएस येदियुरप्पा. (फोटो: पीटीआई).

नई दिल्लीः कर्नाटक की विभिन्न अदालतों ने सांप्रदायिक हिंसा और गोरक्षा से जुड़ी हिंसा के संबंध में 21 मामलों को अक्टूबर से दिसंबर 2020 के दौरान वापस ले लिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालतों का यह फैसला राज्य की भाजपा सरकार के 31 अगस्त 2020 के आदेश पर आधारित है. इस कदम से मैसूर से भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा, हिंदू संगठनों के 206 सदस्यों और 106 मुस्लिमों को राहत मिली है.

ये आपराधिक मामले कर्नाटक हाईकोर्ट के 21 दिसंबर 2020 के आदेश से पहले वापस लिए गए, जिसमें राज्य सरकार से इन मामलों की कार्यवाही नहीं रोकने को कहा गया था.

दरअसल यह आदेश मानवाधिकार संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की याचिका पर आया था.

हाईकोर्ट ने 21 दिसंबर 2020 के अपने आदेश में कहा था, ‘31 अगस्त 2020 के आदेश के आधार पर कोई कदम नहीं उठाया जाएगा.’

हालांकि, 2014 से 2019 के बीच सांप्रदायिक घटनाओं से जुड़े 21 मामलों के अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि कर्नाटक सरकार ने 31 अगस्त, 2020 का आदेश जारी करने के तुरंत बाद ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और इन मामलों को वापस लेने की मांग की थी. इसके बाद अदालतों द्वारा 10 अक्टूबर से 10 दिसंबर 2020 के दौरान ये 21 मामले वापस लिए गए.

दरअसल इन मामलों को वापस लेने का अनुरोध पूर्व कानून मंत्री जेसी मधुस्वामी (अब लघु सिंचाई मंत्री), भटकल से भाजपा विधायक सुनील नाईक और पशुपालन मंत्री प्रभु चव्हाण ने किया था.

हर मामले में राज्य पुलिस, अभियोजन पक्ष और कानूनी विभागों की लिखित आपत्ति के बावजूद ये मामले वापस लिए गए.

तत्कालीन कानून मंत्री मधुस्वामी ने मैसूर जिले के हुनसूर इलाके में 2015 से 2018 के बीच हुईं 13 सांप्रदायिक घटनाओं को वापस लिए जाने की मांग की थी.

इनमें से एक घटना दिसंबर 2017 की है, जिस दौरान मैसूर से सांसद सिम्हा ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील हुनसूर इलाके में हनुमान जयंती के मौके पर जुलूस के दौरान पुलिस द्वारा रोके जाने के बावूजद कथित तौर पर पुलिस बैरीकेडिंग को तोड़ते हुए अपनी जीप आगे बढ़ा दी थी.

पुलिस ने सिम्हा पर सार्वजनिक आदेश की अवहेलना करने, लापरवाही से गाड़ी चलाने, सरकारी कर्मचारी को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने और जान-बूझकर लोकसेवक को चोट पहुंचाने का आरोपी पाया था.

हुनसूर की अदालत ने 31 अगस्त 2020 के आदेश के आधार पर 10 अक्टूबर 2020 को मामला वापस लेते हुए कहा था कि राज्य सरकार ने आरोपी के खिलाफ मामला वापस ले लिया है और आरोपी से सीआरपीसी की धारा 321(ए) हटा ली गई है और मामला वापस ले लिया गया है.

हुनसूर में सांप्रदायिक हिंसा के अन्य मामले भी पिछले साल 26 नवंबर को वापस ले लिए गए. इनमें से अधिकतर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हुई झड़पों के थे और मुख्य रूप से ये हनुमान जयंती समारोह या बैनर एवं पोस्टर लगाने के विरोध पर हुए थे.

कुल मिलाकर हुनसूर में 142 हिंदू युवाओं और 40 मुस्लिम युवाओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस ले लिया गया.

2018 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर कन्नड़ जिले के होन्नावर इलाके में सांप्रदायिक हिंसा की पांच घटनाएं हुईं, जिन्हें भटकल से भाजपा विधायक सुनील नाईक के आग्रह पर वापस ले लिया गया.

रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2017 में होन्नावर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान 19 वर्षीय परेश मेस्टा की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई थी. भाजपा ने इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी, जिसे मंजूर कर ली गई और तब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मेस्टा के घर गए थे.

राज्य सरकार के 31 अगस्त 2020 के आदेश के आधार पर उत्तर कन्नड़ जिले में अदालतों द्वारा पांच मामलों में आरोपी 110 लोगों को बरी कर दिया गया. इनमें से कुछ मामले होन्नावर में हनुमान मंदिर के पास मुस्लिमों के वार्षिक जुलूस के दौरान मार्ग को लेकर स्थानीय प्रशासन द्वारा बुलाई गई शांति बैठक के दौरान हुई हिंसा से जुड़े हुए थे.

इसके कुछ दिनों बाद दोनों समूहों के बीच झड़प हुई थी, जिसमें परेश मेस्टा का शव संदिग्ध परिस्थितियों में तालाब से बरामद किया गया था.

होन्नावर से जुड़े मामले 13 अक्टूबर 2020 को वापस लिए गए और इस दौरान राज्य सरकार के 31 अगस्त के आदेश का हवाला देते हुए जज और न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कहा कि सरकार ने आरोपियों के खिलाफ मामलों को वापस लेने का फैसला किया है, इसलिए इस मामले को खारिज किया जाता है.

पशुपालन मंत्री प्रभु चव्हाण के अनुरोध के आधार पर वापस लिए गए अन्य सांप्रदायिक मामलों में से दो बीदर शहर से हैं.

गाय ले जा रहे लोगों पर हमले के एक आरोपी को सरकार के 31 अगस्त 2020 के आदेश के बाद बरी कर दिया गया, जबकि ऐसे ही एक अन्य मामले में मवेशी ले जा रहे लोगों को निशाना बना रहे छह लोगों को इसका लाभ नहीं मिला. ये अनुरोध चव्हाण द्वारा किए गए थे.

बीदर में साल 2018 में एक लड़की के साथ बलात्कार और हत्या के बाद हुए सांप्रदायिक तनाव के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपी आठ हिंदू युवकों के खिलाफ चव्हाण के अनुरोध के बाद केस बंद कर दिया गया था.

एक अन्य सांप्रदायिक मामला 2015 में धारवाड़ का है, जिसमें 10 लोगों को आरोपी बनाया गया था, इस मामले को भी राज्य सरकार के आग्रह के बाद 28 अक्टूबर 2020 को वापस ले लिया गया. वह भी तब जब आरोप पहले ही तय किए जा चुके थे.

धारवाड़ से भाजपा विधायक अमृता देसाई के अनुरोध पर यह मामला वापस लिया गया.

रिपोर्ट के अनुसार, सांप्रदायिक तनाव के ये 21 मामले जिन्हें बंद कर दिया गया है, ये उन 62 मामलों में से एक हैं, जिन्हें 31 अगस्त 2020 के आदेश के बाद कर्नाटक की भाजपा सरकार निर्वाचित प्रतिनिधियों और अन्य के अनुरोध पर बंद करने का फैसला लिया था.

मालूम हो कि मंत्रियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के अनुरोध के आधार पर अदालतों द्वारा इन मामलों को वापस लिए जाने का विरोध करते हुए पीयूसीएल ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया था.

हाईकोर्ट ने एक दिसंबर 2020 को कहा था, ‘सरकारी वकील किसी पोस्ट बॉक्स या फिर राज्य सरकार के आदेश पर काम नहीं कर सकता. उसे निष्पक्ष रूप से काम करना होगा, क्योंकि वह अदालत का अधिकारी है.’

हाईकोर्ट ने कहा था, ‘कोई भी अदालत इस तरह के फैसलों के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य नहीं है. यहां तक कि अगर आवेदक सीआरपीसी की धारा 321 के तहत अपील करता है तो अदालतें यह पता करने के लिए बाध्य हैं कि क्या प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं और अदालत के पास इस तरह के अनुरोधों को खारिज करने की शक्ति है.’

21 दिसंबर 2020 को राज्य द्वारा अनुपालन रिपोर्ट नहीं दाखिल किए जाने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश पर रोक लगा दी थी.