भारत

किसानों के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाएं और स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिश लागू करें: साईनाथ

वरिष्ठ पत्रकार और कृषि मामलों के जानकार पी. साईनाथ ने कहा कि जब कॉरपोरेट की ज़रूरतों के लिए जीएसटी का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है तो किसानों के लिए संसद का विशेष सत्र क्यों नहीं बुलाया जा सकता है, जहां कृषि संकट से समाधान के लिए चर्चा की जा सके.

p-sainath-wikimedia commons

पी. साईनाथ. (फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे देशव्यापी आंदोलन के बीच वरिष्ठ पत्रकार और कृषि मामलों के जानकार पी. साईनाथ ने कहा है कि किसानों के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुलाया जाना चाहिए और इसमें चर्चा कर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएं.

उन्होंने कहा कि दशकों से चले आ रहे कृषि का संकट का यही समाधान है. साईनाथ ने कहा कि सरकार द्वारा ऐसे कदम उठाए जाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि पिछले कई सालों में पहली बार इस तरह का कृषि आंदोलन देश में हो रहा है. 

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, अहमदाबाद स्थिति पीपुल्स कलेक्टिव ‘उल्गुलान’ और ‘गुजरात खेदूत समाज’ द्वारा कृषि संकट पर आयोजित एक कार्यक्रम में पी. साईनाथ ने ये बातें कहीं.

उन्होंने कहा कि दशकों बाद भारत का कृषि समाज सीधे कॉरपोरेट ताकतों के खिलाफ खड़ा हुआ है और यह ऐतिहासिक कदम है. तीनों कानूनों को तत्काल रद्द करने की जरूरत है, क्योंकि इससे न सिर्फ किसानों पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि सभी नागरिक इससे प्रभावित होंगे.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार ने यह भी कहा कि कृषि में व्याप्त समस्याओं को दूर करने के लिए इन तीनों कानूनों को रद्द करना ही पर्याप्त नहीं होगा.

इस कानूनों पर विचार-विमर्श के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में पी. साईनाथ का भी नाम सुझाया था, हालांकि साईनाथ ने कहा कि उन्होंने इस समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया था, क्योंकि ये महज तामाशा के अलावा और कुछ नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट समितियों का गठन कर रही है जबकि उनका प्रमुख काम कानूनों की संवैधानिकता को जांचना है.’ साईनाथ ने कहा कि हमें अतिरिक्त कमेटियों की क्या जरूरत है, जब स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अभी तक लागू नहीं किया गया है.

साईनाथ ने केरल में ‘कुदुम्बश्री आंदोलन’ का भी उल्लेख किया, जहां महिला किसान खाद्य सुरक्षा या खाद्य संप्रभुता की मांग नहीं करती हैं, बल्कि ‘खाद्य न्याय’ के सिद्धांत पर काम करती हैं.

उन्होंने कहा, ‘इस सिद्धांत का ये मतलब है कि मान लीजिए 10 महिलाएं मिलकर 500 क्विंटल धान का उत्पादन करती हैं, लेकिन इसमें से एक किलो की भी बिक्री तब तक नहीं हो सकती है जब तक उन 10 परिवारों की जरूरतें पूरी नहीं हो जाती हैं. एमएस स्वामीनाथन ने कहा था कि कृषि वृद्धि को सिर्फ उत्पादन के नजरिये से न देखा जाए, बल्कि इसे किसानों की आय में बढ़ोतरी की नजर से देखा जाना चाहिए.’

साईनाथ ने कहा कि ये कानून इसलिए भी समस्यात्मक हैं, क्योंकि इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर काफी प्रभाव पड़ने की संभावना है.

साल 2007 के रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पी. साईनाथ ने कहा, ‘एमएसपी बढ़ाने का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि इस पर खरीद सुनिश्चित न किया जाए. विलासराव देशमुख (दिवंगत महाराष्ट्र मुख्यमंत्री) के इस ड्रामे से मैंने सीखा है, जहां वे एमएसपी बढ़ाने का वादा करते थे, लेकिन खरीद नहीं बढ़ती थी. इसके चलते किसान प्राइवेट खरीददारों के पास जाने के लिए मजबूर थे.’

साईनाथ ने कहा कि जब कॉरपोरेट की जरूरतों के अनुसार जीएसटी का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है तो किसानों के लिए संसद का विशेष सत्र क्यों नहीं बुलाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि ऐसे सत्र के बाद ही कृषि संकट के समाधान का रास्ता निकाला जा सकेगा.