भारत

भाजपा सरकार ‘जनता’ और सरकार की सहकारी हिंसा का मॉडल स्थापित कर चुकी है

हिंसा का एकाधिकार सरकार के पास होता है और उसे नियंत्रित रखने के लिए संवैधानिक सीमाएं हैं. लेकिन सरकार इनका अतिक्रमण करती रहती है. उसकी अनधिकार हिंसा पर कोई सवाल न उठे, इसलिए वह जनता के एक हिस्से को यह बताती है कि वह उसकी तरफ से हिंसा का प्रयोग कर रही है.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर लगे कंटीले तार. (फोटो: पीटीआई)

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर लगे कंटीले तार. (फोटो: पीटीआई)

क्या सरकार दिल्ली की सरहदों पर बैठे किसानों को दीवारों में चिनवा देना चाहती है? सिंघू और टिकरी की सीमाओं पर जो दीवारें खड़ी की जा रही हैं जिनके पीछे अपने हक और इंसाफ की मांग करते किसान छिपते जा रहे हैं.

उन्हें देखते हुए ‘मुगले आज़म’ का वह दृश्य याद आ जाता है जिसमें शहंशाह अकबर अनारकली को दीवारों में चिनवा देता है. वे किस्से भी सुनते हुए हम बड़े हुए जिनमें बादशाह अपने विरोधियों को दीवार में चिनवा दिया करते थे या हाथियों के पैरों के नीचे कुचल देते थे.

लेकिन ये किस्से उन जमानों के थे! उनके जिन्हें हम पार कर आए. हमारा ख्याल था कि अब हम राजा की मर्जी या सनक और या उसके प्रसाद के युग से आगे निकलकर क़ानून के राज में आ चुके हैं. कानून जो जितना जनता पर लागू होगा उतना ही राज करने वाले पर या सरकार पर भी.

आपने दिल्ली की सरहदों पर खड़ी की जा रही ये दीवारें 4 फीट ऊंची हैं. सरहद के करीब सड़क में बड़ी बड़ी कीलें या सलाखें ठोंक दी गई हैं. यह सरहद तक या सरहद से जाने वाली गाड़ियों के टायर फाड़ देने के लिए किया गया है.

इन सड़क में जमा दी गई इन कीलों और सीमेंट से सड़क पर उठाई जा रही दीवारों में आपको पुरानी बादशाही सनक दिखलाई देगी जो बागी रियाया को सबक सिखाने के लिए जो मर्जी कर सकता है.

बेचारा निजाम चूंकि यह कर नहीं पा रहा तो वह अपनी ताकत का इस्तेमाल जिस हद तक कर सकता है, कर रहा है. किसानों का पानी रोक दिया गया है. वहां एम्बुलेंस भी नहीं पहुंच सकती.

पुलिस हर कोशिश कर रही है कि आंदोलनकारियों का वहां बने रहना दूभर हो जाए. वे शौचालय का इस्तेमाल भी न कर पाएं, इसकी तरकीब लगाई जा रही है.

दिल्ली के पुलिस प्रमुख से जब इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने ठसक से जवाब दिया कि हम यह सुरक्षा के लिए कर रहे हैं. जब हम पर हिंसा हुई तो किसी ने कुछ नहीं कहा फिर अभी जब हम हिफाजत के लिए ये उपाय कर रहे हैं तो हमसे क्यों सवाल किया जा रहा है?

हमने स्टील की छड़ों से लैस पुलिस की तस्वीर भी देखी. लोगों को यह स्वाभाविक ही लग रहा होगा. लेकिन यह उचित था या नहीं?

पुलिस प्रमुख से उनकी आपत्ति के बावजूद ये सवाल किए जाएंगे. मसलन, सड़क पर स्थायी दीवार किस अधिकार से पुलिस ने खड़ी की?

सड़क, राजमार्ग उनकी संपत्ति नहीं है. क्या यह राजमार्ग प्राधिकरण का आदेश था? क्या स्थायी रुकावट, वह भी दीवार खड़ी की जा सकती है?

अलावा इसके, इसके लिए रकम की इजाजत किसने दी? इतनी रकम पुलिस आंदोलन को दबाने के लिए खर्च कर सकती है लेकिन उमर खालिद, देवांगना को चार्जशीट नहीं दे सकती इस बहाने से कि उसके पास पैसा नहीं? और उसकी वजह से वह मुकदमा अंतहीन खिंचता जा सकता है!

वह किस अधिकार से किसानों को पानी और स्वास्थ्य की सुविधा से वंचित कर रही है? क्या पुलिस हिफाजत के नाम पर नागरिकों के जीवन के अधिकार को सीमित कर सकती है?

ये सारे प्रश्न किए जाने चाहिए. उनके द्वारा भी जो इस आंदोलन के आलोचक हैं. वह इस कारण कि सरकारों में या राज करने वालों में बादशाही हनक छिपी हुई रहती है. अगर अवाम जागरूक न रही तो सरकार उसे प्रजा में बदल देने की हर तरकीब अपनाती है.

सत्ता में कुछ है कि निरंकुश होना उसके लिए सबसे सहज है. इसीलिए जनतंत्र में सत्ता को पाबंद करने के लिए भी क़ानून में प्रावधान हैं.

लेकिन हम सब जानते हैं कि सत्ता, जो सैन्य बल, अर्धसैन्य बल और पुलिस से सुसज्जित और सुरक्षित है, बल का प्रयोग कानून की किताबों में पाबंदियों के रहते और उनके बावजूद करती है, वह जब अपनी मर्यादा का उल्लंघन करे तो आप अदालत के पास जा सकते हैं. लेकिन उसके पहले उसकी ताकत का जनता पर वार हो चुका होता है.

जनता सरकार के अधीन नहीं होती. सरकार की नहीं होती. सरकार जनता की होती है. दोनों ही संविधान और कानून के पाबंद होते हैं. सरकार अस्थायी है. जनता उसे बनाती है और वही उसे बदल भी सकती है.

सरकार पथभ्रष्ट हो तो जनता उसकी तम्बीह कर सकती है. सरकार के पास हिंसा के सारे साधन हैं. दूसरी तरफ जनशक्ति है. जनता को हिंसा का प्रयोग करने की इजाजत नहीं, हिंसा के साधन वह कानूनन इस्तेमाल नहीं कर सकती.

हिंसा का एकाधिकार सरकार के पास हुआ करता है. चूंकि सरकार के पास हिंसा का अधिकार है इसीलिए जनतंत्र में उसे नियंत्रित रखने के लिए संवैधानिक सीमाएं खींची गई हैं. लेकिन सरकार इनकी अनदेखी या इनका अतिक्रमण करती रहती है.

वह ऐसा कर पाए और उसके अनधिकार हिंसा के प्रयोग पर कोई सवाल न उठे, इसके लिए वह करती यह है कि जनता के एक हिस्से को यह बताए कि वह उसकी तरफ से हिंसा का प्रयोग कर रही है.

जनता को विभाजित करके और एक हिस्से की पक्षधर का स्वांग भरकर सत्ता अपनी निरंकुशता का लाइसेंस जनता से लेती है. ऐसा करते वक्त वह जनता के अपने हिस्से को हिंसा का अधिकार दे देती है.

तब जनता के इस हिस्से में गुमान पैदा हो जाता है कि वह सत्ता का अंग है. वह सत्ता के साथ मिलकर जनता के दूसरे हिस्से पर शासन का सुख उठाती है.

‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं,’ ‘मोदीजी तुम लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं,’ पिछले दो वर्षों में हमलावर गिरोहों को इन नारों के साथ हिंसा करते हुए हम सबने देखा है. जनता का यह हिस्सा किसके ऊपर लट्ठ चलाने का आह्वान पुलिस से कर रहा है?

पिछले साल मुसलमानों पर लट्ठ चलाने के लिए पुलिस की हौसलाअफजाई की जा रही थी. इस साल किसानों के खिलाफ पर्याप्त हिंसा न कर पाने के लिए पुलिस के साथ सहानुभूति जाहिर की जा रही है.

इसी तरह बिहार सरकार ने यह फैसला किया है कि अगर किसी ने आंदोलन में इस तरह भाग लिया हो, जो सरकार को नागवार गुजरा हो तो वह सरकारी काम और नौकरी के योग्यता खो बैठेगा.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने किसानों को लाखों रुपये का बॉन्ड भरने का हुक्म दिया ताकि वे आंदोलन में हिस्सा न लें. क्या नागरिक के आंदोलन के अधिकार को सरकार नियंत्रित कर सकती है? अगर ऐसा होने दिया जाए तो क्या फिर नागरिक का क्या बचा रह जाता है?

जैसा पहले कहा, सरकार में यह प्रवृत्ति होती है. लेकिन जब वह जनता के एक हिस्से की प्रतिनिधि और उनके हितों की प्रवक्ता होने का भ्रम उस हिस्से को दे सके तो उसके लिए मनमानी हिंसा करना संभव हो जाता है. क्योंकि उसकी वकालत के लिए वह जनता ही उठ खड़ी होती है.

भारत की सरकार ‘हिंदुओं’ को सत्ता की हिंसा में हिस्सा देकर उन्हें अपना वकील बना रही है. वह कहती है देखो, साम दाम दंड भेद से हमने बाबरी मस्जिद की ज़मीन तुम्हारे लिए हड़प ली, देखो मुसलमान मर्दों को सबक सिखलाने को तीन तलाक का कानून ले आए, तुम्हारी औरतों को बचाने के लिए कानून ले आए, तुम्हें हम मंदिर के लिए चंदा इकठ्ठा करने के नाम पर या तिरंगा यात्रा के नाम पर मुसलमानों के साथ मारपीट, उन पर हमला करने की छूट दे रहे हैं, वे विरोध करें तो उन्हीं को दंडित कर रहे हैं, हम जब तुम्हें यह ताकत दे रहे है तो बदले में क्या तुम हमारे लिए बेलगाम ताकत के अधिकार की मांग तक न करोगे?

जनता को हिंसा का अधिकार देकर सरकार उस पर भी अपनी गिरफ्त सख्त कर सकती है. अगर आज म्यांमार में सेना ने अगर सत्ता पर दोबारा कब्जा कर लिया है तो शायद इस यकीन से कि बौद्धों को रोहिंग्या जन के खिलाफ हिंसा की जो छूट उसने दी है उसके बदले वे उसके सत्ता के अपहरण का विरोध नहीं करेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप ने श्वेत जनता को यही विश्वास दिलाया था. राष्ट्रपति के उकसावे से कैपिटल हिल पर हुआ हमला श्वेत जनता के लिए इस आश्वासन की जांच थी.

उसी तरह हमने यह देखा कि टिकरी और सिंघू के धरनारत किसानों पर पुलिस की सरपरस्ती में हमला किया जा सका. इस हमले को पुलिस जनता के असंतोष की जायज़ अभिव्यक्ति बतला रही है.

पुलिस या उसके माध्यम से सरकार वही कर रही है जो पिछले साल उसने मुसलमानों के साथ किया था. ‘जनता’ और सरकार की सहकारी हिंसा का आदर्श यह सरकार गढ़कर स्थापित कर चुकी है.

यह मॉडल नया नहीं है. चीन में भी माओ ने जनता के एक हिस्से को अपनी हिंसा में शरीक किया था. हिटलर ने भी यहूदियों के खिलाफ हिंसा में जर्मनों को शामिल करके जर्मनी पर कब्जा कर लिया था.

अभी किसानों को दीवारों से घेरकर और उनके और दिल्ली के बीच के रास्ते पर कील ठोंककर इसी की जांच की जा रही है कि उसकी हिंसा में जनता कितनी दूर तक शामिल हो सकती है!

लेकिन भारत में सारी कमियों के बावजूद जनता जनता बनी हुई है. उसे 70 साल का नहीं उसके पहले ब्रिटिश हुकूमत की मुखालिफत के दौरान भी जनतांत्रिक रवैये का अभ्यास बना हुआ है.

इसीलिए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के भाजपा के प्रभाव क्षेत्र की जनता भी उसकी सरकार के खिलाफ उठ खड़ी हुई है. क्योंकि इस बार वह यह समझ पाई है कि सरकार ने उसे अपना गुलाम मान लिया है.

इस क्षेत्र में इस सदमे के कारण ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब लोग यह भी समझ रहे हैं कि इस पार्टी के साथ मिलकर अपने पड़ोसी मुसलमानों पर जिस हिंसा में उन्होंने हिस्सा लिया था, वह गलत थी.

समाज में विभाजन करके सरकार ने उनकी ताकत भी छीन ली है यह वे कुछ कुछ समझ पाए हैं… अब वे अपनी, यानी जनता की संप्रभुता वापस हासिल करने की जंग लड़ रहे हैं.

पहले उसने जो किया हो, जनता की अपनी संप्रभुता बहाल करने का इस बार का संघर्ष व्यर्थ नहीं जाना चाहिए. उसका तरीका यही है कि इस संघर्ष में जनता के बाकी सभी तबके शामिल हों.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)