राजनीति

संसदीय समिति ने डीएनए डेटाबेस बनाने पर चिंता जताई, कहा- कुछ ख़ास लोगों को निशाना बनाया जाएगा

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसद की स्थायी समिति ने आशंका जाहिर की है कि डीएनए डेटा बैंक के ज़रिये धर्म, जाति या राजनीतिक विचार के आधार पर लोगों को निशाना बनाने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा सकता है.

New Delhi: Parliament House during the Budget Session of the Parliament, in New Delhi, Monday, Feb. 1, 2021. Finance Minister Nirmala Sitharaman replaced the 'bahi khata' and switched to a tablet, with the Union Budget set to be delivered in paperless form for the first time. (PTI Photo/Manvender Vashist)(PTI02_01_2021_000044B)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: संसद की एक समिति ने डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग एवं अनुप्रयोग) विधेयक 2019 के तहत अपराध स्थल डीएनए प्रोफाइल का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का प्रस्ताव देने पर चिंता व्यक्त की है.

यह विधेयक राष्ट्रीय डीएनए डेटा बैंक और क्षेत्रीय डीएनए डेटा बैंक स्थापित करने का प्रावधान करता है, जिसमें डीएनए प्रोफाइल रखी जाएंगी.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसद की स्थायी समिति से संबंधित 32 सदस्यीय विभाग ने अपनी रिपोर्ट बीते बुधवार को राज्यसभा के पटल पर रखी.

समिति के दो सदस्यों, तेलंगाना से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी तथा केरल से राज्यसभा सदस्य बिनॉय विश्वम ने असहमति नोट दिया है.

पैनल ने डीएनए डेटा बैंक बनाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अपराध स्थल डीएनए प्रोफाइल के राष्ट्रीय डेटा बैंक में सभी का डीएनए शामिल हो सकता है, क्योंकि अपराध से पहले और बाद में वारदात स्थल पर कई लोगों का डीएनए मिल सकता है, जिनका मामले से कुछ लेना देना न हो.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक समिति ने कहा, ‘ये डर पूरी तरह से निराधार नहीं हैं और सरकार एवं संसद द्वारा इसका समाधान निकाला जाना चाहिए. समिति का मानना है कि डीएनए प्रोफाइलिंग सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसा सक्षम तंत्र जल्द ही बनाया जाए, जो पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और संविधान की भावना के अनुरूप हो.’

पहली बार साल 2003 में इस तरह के विधेयक का प्रस्ताव रखा गया था. इसमें कई बार जैव प्रौद्योगिकी विभाग और कानून मंत्रालय द्वारा संशोधन किया गया है. अक्टूबर 2019 में इसे संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया था.

समिति के सदस्यों और इसके सामने पेश हुए कई सांसदों ने इस बात की आशंका जाहिर की है कि धर्म, जाति या राजनीतिक विचार के आधार पर लोगों को निशाना बनाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है.

संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘कमेटी इस बात से अवगत है कि यह विधेयक बहुत ही टेक्निकल, जटिल एवं संवेदनशील है. कई सदस्यों ने डीएनए तकनीक के इस्तेमाल- इसके दुरुपयोग को लेकर चिंता जाहिर की है. ये डर पूरी तरह से निराधार नहीं हैं और इसका निराकरण किया जाना चाहिए.’

वैसे तो विधेयक में स्थानीय डेटा बैंक बनाने का प्रावधान किया गया है, हालांकि संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि एक राष्ट्रीय डेटा बैंक बनाया जाना चाहिए, ताकि डेटा के दुरुपयोग को कम किया जा सके.

समिति ने यह भी कहा, ‘वे इस तरह के कानून बनाने की जरूरत से इनकार नहीं कर रहे हैं, खासतौर पर जब डीएनए तकनीक पहले से ही प्रयोग में है. वास्तव में हाल के महीनों में इसके प्रयोग से एक फर्जी मुठभेड़ का खुलासा हुआ है, जिसमें निर्दोष मारे गए थे, ये उस दावे के बिल्कुल विपरीत था, जिसमें ये कहा गया था कि मृतक आतंकी थे.’

समिति के दो सदस्य असदुद्दीन ओवैसी और बिनॉय विश्वम ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इससे निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा.

विश्वाम ने कहा कि बिना पर्याप्त कानूनी सुरक्षा के यह कानून हाशिये पर पड़े लोगों विशेषकर दलितों, आदिवासी एवं अल्पसंख्यकों के लिए समस्यात्मक होगा. ओवैसी ने जातिगत डेटा के साथ-साथ ‘विशिष्ट समूहों के साथ भेदभाव के लिए’ जानकारी इकट्ठा करने की संभावना पर चिंता जताई.

डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक का उद्देश्य ‘विशेष श्रेणी के व्यक्तियों’ जैसे कि अपराध के शिकार लोगों, लापता व्यक्तियों और बच्चों, अज्ञात शवों के साथ अपराधियों, संदिग्धों और मामलों में विचाराधीन लोगों का एक डेटाबेस स्थापित करना है.

विधेयक के मुताबिक, ऐसा डेटाबेस डीएनए प्रोफाइलिंग के माध्यम से बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को दोहराने वाले व्यक्तियों का पता लगाने में मदद करेगा.

(समाचार एजेंसी पीटीआई से इनपुट के साथ)