राजनीति

व्यापमं घोटाले में शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

व्यापमं मामले और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से बातचीत.

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (पीटीआई)

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (पीटीआई)

मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाला मामले को लेकर कांग्रेस महासचिव व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ी है. हाल में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 634 छात्रों का एमबीबीएस में दाखिला रद्द कर दिया गया है. इसके अलावा अभी एक लाख अवैध भर्तियों का मामला लंबित है, जिसे अब सीबीआई ने अपने हाथ में ले लिया है. द वायर ने व्यापमं घोटाला और दूसरे तमाम मसलों पर दिग्विजय सिंह से बात की.

व्यापमं घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आप किस रूप में देखते हैं?

मैं सुप्रीम कोर्ट का आभारी हूं और उसके फैसले की प्रशंसा करता हूं. अदालत के फैसले ने साबित कर दिया कि जितने लोगों को व्यापमं के तहत दाखिला मिला था वो सभी गैरकानूनी थे.

मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के लिए जिन्होंने रिश्वत दी थी, उन सभी लोगों को जेल जाना पड़ा. उनके पैसे भी डूब गए साथ ही मेडिकल कॉलेज की सीट भी हाथ से निकल गयी. व्यापमं में क्या सिर्फ यही लोग शामिल थे? उनका क्या जिन्होंने पैसे लेकर दाखिला दिलवाया और धोखा किया? वे लोग अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुए? ये सारी बातें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाक के नीचे हुई और उनको कैसे जानकारी नहीं हुई?

व्यापमं घोटाले के जिम्मेदार और मामले में आरोपी लक्ष्मीकांत शर्मा दो साल के लिए जेल भी जा चुके हैं. मुख्यमंत्री और उनके दफ्तर के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

आदरणीय सुप्रीम कोर्ट को तुरंत एक निगरानी बेंच की नियुक्ति करना चाहिए और इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए.

घोटाले की भयावहता को देखते हुए क्या बहुत देर हो गई है?

मैं मानता हूं कि भारत में न्यायिक प्रक्रिया धीमी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट और खास तौर पर मुख्य न्यायाधीश को इसका श्रेय देना चाहता हूं कि उन्होंने बेहद सटीक फैसला लिया है.

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद आप व्यापमं मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख को किस तरह से देखते हैं जबकि विपक्ष लगातार इस मसले को संसद में उठाता रहा है और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग भी करता रहा है?

मोदी अपने डायलॉग के लिए जाने जाते है ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा.’ मोदी 12 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. क्या मोदी के कार्यकाल में गुजरात भ्रष्टाचार मुक्त था? क्या उनके ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगे थे? उनका जो नारा है ‘ न खाऊंगा न खाने दूंगा इसका असली मतलब है केवल मैं और बीजेपी के लोग खाएंगे दूसरों को न खाने दूंगा.’

प्रधानमंत्री ने अभी तक लोकपाल का गठन नहीं किया हैं. जब मोदी मुख्यमंत्री थे, उन्होंने लोकायुक्त तक नियुक्त नही किया.

ईमानदार अफसरों द्वारा भ्रष्टाचार को उजागर किया गया जिसमे आईपीएस कुलदीप शर्मा जैसे ईमानदार अफसर को निशाना बनाया गया. खुफिया विभाग के आईजी के रूप में शर्मा ने गुजरात सहकारी बैंक के बड़े घोटाले को सब के सामने लाए, उस समय उसके चेयरमैन अमित शाह थे. इस काम के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पडी थी.

मोदी प्रशासन सिर्फ उन तक, उनके चहेते नेताओं और चहेते उद्योगपतियों तक ही सीमित है. जिसने भी ईमानदारी से काम किया उसने अपनी बर्बादी को दावत दे दी. मैं गुजरात में ऐसे 10 मामले गिनवा सकता हूं, जो वहां के नौकरशाही में और पुलिस में है.

मध्य प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव में कांग्रेस की क्या रणनीति है? अब कांग्रेस को 14 साल हो गये सत्ता से बाहर रहते हुए.

कांग्रेस पार्टी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों को भ्रष्टाचार का लगातार खुलासा करती रहेगी. मैं आपको अवैध बालू खनन का एक उदाहरण दे रहा हूं. बालू खनन के अधिकतर ठेके मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों को दिए गए है.

मुख्यमंत्री के बड़े भाई कथित तौर पर 25 लाख की रिश्वत लेते पकड़े गए थे. लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. मुख्यमंत्री के भतीजे कथित तौर पर अवैध खनन में पकडे गए थे पर उन पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. पूरे राज्य में बालू खनन गैर कानूनी तरीके से हो रहा है.

गैर कानूनी तरीके से बालू खनन के कारण बालू की कीमत 2003 के मुकाबले 20 गुना ज्यादा बढ़ गई है.

मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में बालू के खनन का ठेका ग्राम पंचायत को दिया जाता था, जो उसे नीलाम करती थी. भाजपा के सत्ता में आते ही यह नियम खत्म कर दिया गया.

क्या व्यापमं घोटाला ही कांग्रेस के पास आगामी चुनाव के लिए प्रमुख मुद्दा है?

व्यापमं घोटाला सभी प्रमुख मुद्दों में से एक है.

क्या आप सुप्रीम कोर्ट से व्यापमं की शीघ्र जांच करने की मांग करेंगे?

हम पहले इस मामले का अच्छे से अध्ययन कर लें, उसके बाद फैसला करेंगे आगे क्या करना है.

सुनील गटाडे वरिष्ठ पत्रकार हैं.