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आंचल संभालते हाथों में थमी वीरता की कटार का नाम है सुभद्रा कुमारी चौहान

वीडियो: 16 अगस्त, 1904 को इलाहाबाद के निकट निहालपुर गांव में जन्मीं सुभद्रा कुमारी चौहान ने महज़ नौ साल की उम्र में अपनी पहली प्रकाशित कविता लिखी थी. वह स्वतंत्रता आंदोलन में भी शामिल रही हैं. स्वतंत्रता से पूर्व स्त्री अधिकारों पर लिखने वाली वह देश की पहली महिला लेखक थीं.

सुभद्रा कुमारी चौहान की पढ़ाई अभी आठवीं तक ही पूरी हो पाई थी कि शादी हो गई. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद ही अपने पति के साथ स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल हुईं.

उन्होंने अपने जीवन के कई अनमोल वर्ष इन आंदोलनों में अर्पित कर दिए. इस दौरान वह कई बार जेल भी गईं, लेकिन इससे उनके हौसले पस्त नहीं हुए.

उन्होंने निरंतर सामाजिक और राजनीतिक रूप से अपनी सक्रियता बनाए रखी. वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अनुयायी थीं. स्वयं का साधारण, लेकिन तेजोमय व्यक्तित्व सुभद्रा कुमारी चौहान की एक बड़ी शक्ति था.

सो महिलाओं के बीच जब वे पर्दा प्रथा उन्मूलन, जाति प्रथा के विरोध, नारी उत्थान, स्वदेशी अपनाने और सामाजिक- राजनीतिक जागरण की बात करतीं तो उसका प्रभाव गहरा पड़ता था और महिलाओं के समूह के समूह इन आंदोलनों में सहभागिता के लिए निकल पड़ते.

1922 के जबलपुर के झंडा सत्याग्रह से वे देश की प्रखर महिला सत्याग्रही भी बनीं. स्वतंत्रता से पूर्व स्त्री अधिकारों पर लिखने वाली वह देश की पहली महिला लेखक थीं.

यूं तो उन्होंने इतनी कविताएं लिखीं, जो कि दो कविता संग्रह- मुकुल और त्रिधारा में संकलित हैं और इतनी कहानियां लिखीं, जो तीन कथा संग्रह- बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे-सीधे चित्र में संकलित हैं.

बावजूद इसके काल के पन्नों में अमर कर देने के लिए उनकी वे दो रचनाएं ही काफ़ी हैं, झांसी की रानी और जलियांवाला बाग़ में वसंत. उनकी बाल कविताओं तक में देशभक्ति की बातें होती थीं और उनकी कहानियां सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर केंद्रित.

वे साहित्य और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में सक्रिय रहीं. उनकी कहानियों के पात्र महिलाएं, दलित, उपेक्षित अपने वर्ग का प्रमुखता से प्रतिनिधित्व करते थे.