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चौरी-चौरा शताब्दी समारोह मना रही यूपी सरकार शहीद स्मारक पर दर्ज ग़लत इतिहास की सुध कब लेगी

1922 में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ हुई चौरी-चौरा की घटना के सौ साल पूरे होने पर यूपी सरकार ने साल भर तक चलने वाला शताब्दी महोत्सव आयोजित किया है. हालांकि लंबे समय से इतिहासकारों और लेखकों के ध्यान दिलाए जाने के बावजूद शहीद स्मारक पर दर्ज ग़लत जानकारियों को इस बार भी सुधारा नहीं गया है.

शहीद स्मारक संग्रहालय. (सभी फोटो: मनोज सिंह)

शहीद स्मारक संग्रहालय. (सभी फोटो: मनोज सिंह)

चौरी-चौरा विद्रोह के  शताब्दी वर्ष पर उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे वर्ष चलने वाले आयोजन की घोषणा की है. चौरी-चौरा विद्रोह की बरसी पर चार फरवरी को चौरी-चौरा शहीद स्मारक पर भव्य आयोजन भी किया गया जो कई दिन तक चलता रहा लेकिन शहीद स्मारक पर दर्ज गलत इतिहास का दुरुस्त करने की कोई कोशिश नहीं की गई.

यही नहीं प्रदेश के राजकीय अभिलेखागार की ओर से शताब्दी वर्ष के आयोजन के सिलसिले में शहीद स्मारक पर लगाए गए ऐतिहासिक अभिलेख प्रदर्शनी में चौरी-चौरा विद्रोह की तिथि को लेकर एक बार फिर गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की.

शहीद स्मारक के संग्रहालय में चौरी-चौरा विद्रोह के शहीदों का नाम, पता तक ठीक से नहीं लिखा गया है. इसे लेकर इतिहासकार, लेखक सरकार पर सवाल कर रहे हैं कि आखिर शहीद स्मारक पर दर्ज चौरी-चौरा विद्रोह के गलत तथ्यों को ठीक क्यों नहीं किया जा रहा है जबकि इसकी मांग पिछले पांच वर्षों से की जा रही है.

चौरी-चौरा विद्रोह के शहीदों की याद में वर्ष 1993 में शहीद स्मारक बना. इसका शिलान्यास 6 फरवरी 1982 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चौरी-चौरा विद्रोह की 60वीं वर्षगांठ पर किया था.

शहीद स्मारक के बनने में 11 वर्ष लग गए और 19 जुलाई 1993 को इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने किया. पांच वर्ष बाद 1998 में शहीद स्मारक में संग्रहालय का निर्माण हुआ, जिसमें चौरी-चौरा विद्रोह के शहीदों की मूर्तियां स्थापित की गई.

इसी स्थान पर कई अन्य लोगों की मूर्तियां भी स्थापित की गईं. संग्रहालय के भूमि तल में पुस्तकालय की स्थापना हुई. उचित देखरेख के अभाव में संग्रहालय की हालत काफी खराब हो गई और कई मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो गई.

चौरी-चौरा विद्रोह की शताब्दी वर्ष के मौके पर संग्रहालय को दुरूस्त किया गया है लेकिन यहां लगी शहीदों की मूर्तियों पर उनका नाम आधा-अधूरा और भ्रामक है. य

ही नहीं शहीद स्मारक के मुख्य द्वारा के बाएं तरफ ग्रेनाइट पत्थर पर ‘चौरी-चौरा के शहीदों के इतिहास’ के बारे में दी गई जानकारी में कई गलत तथ्य दर्ज किए गए हैं.

इस तरफ तब ध्यान गया, जब चौरी-चौरा विद्रोह पर पेंगुइन बुक्स द्वारा कथाकार-लेखक सुभाष कुशवाहा की किताब ‘ चौरी-चौरा विद्रोह और स्वाधीनता संग्राम ’ वर्ष 2014 में प्रकाशित हुई. इस पुस्तक में लेखक सुभाष कुशवाहा ने शहीद स्मारक पर दर्ज गलत इतिहास का उल्लेख किया.

ग्रेनाइट पत्थर पर लिखा गया है कि ‘मार्च 1919 में महात्मा गांधी ने अहिंसक राज्य क्रांति का शंखनाद किया था. सन 1920 में बाले के मैदान में विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि विदेशी वस्त्रों व अंग्रेजी पढ़ाई का बहिष्कार किया जाए और चरखा कातकर कपड़े बनाकर पहनना शुरू किया जाए, तो अंग्रेजों को यह देश छोड़ने में देर नहीं लगेगी.’

अभिलेखों के अनुसार गांधी जी की गोरखपुर में सभा आठ फरवरी 1921 को हुई थी.

इसी तरह ग्रेनाइट पत्थर के दूसरे पैरा के तीसरी लाइन में लिखा है, ‘4 फरवरी 1922 को तीसरा शनिवार पड़ा था. उस दिन बड़ी तैयारी के साथ जत्थे निकले थे और यह भी निश्चय कर लिया गया था कि चाहे कितना ही अत्याचार हो पीछे नहीं हटा जाएगा. उसी दिन एकत्रित लगभग 400 स्वयं सेवकों को अलग-अलग जत्थे में बांटा गया. लोगों ने ब्रह्मपुर में स्थापित कांग्रेस कार्यालय से चौरी-चौरा की ओर प्रस्थान किया.’

सुभाष कुशवाहा की किताब में ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से लिखा गया है कि स्वयंसेवकों का जुलूस ब्रह्मपुर से नहीं डुमरी खुर्द गांव से चला था जो चौरी-चौरा से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर पर स्थित है.

उनकी किताब में चार फरवरी 1922 को डुमरी खुर्द से जुलूस के चौरी-चौरा थाने तक जाने का विस्तार से जिक्र किया गया है. उनके किताब में ये तथ्य द ब्रिटिश लाइब्रेरी, राष्ट्रीय संग्रहालय, उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार, ब्रिटिश सरकार की पत्रावलियों, अभिलेखों, सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट में चले मुकदमे के अभिलेख से लिए गए हैं.

ग्रेनाइट पत्थर पर तीसरे पैरा की आखिरी लाइन में लिखा गया है- ’19 व्यक्तियों को 2 जुलाई 1923 को फांसी पर लटका दिया गया.’

चौरी-चौरा विद्रोह के 19 क्रांतिकारियों को एक साथ दो जुलाई 1923 को फांसी नहीं हुई थी. जिला एवं सत्र न्यायालय गोरखपुर के अभिलेखागार के रिकॉर्ड के मुताबिक विद्रोहियों को दो जुलाई 1923 से 11 जुलाई 1923 तक बाराबंकी, अलीगढ़, मेरठ, जौनपुर, गाजीपुर, रायबरेली, बरेली, आगरा, फतेहगढ़, कानपुर, उन्नाव, प्रतापगढ़, झांसी, इटावा आदि जेलों में फांसी दी गई थी.

कुशवाहा ने वर्ष 2015 में गोरखपुर के जिला प्रशासन को पत्र लिखकर शहीद स्मारक पर दर्ज इतिहास को ठीक किए जाने की मांग की थी लेकिन यह कार्य अभी तक नहीं हुआ.

गोरखपुर न्यूजलाइन वेबसाइट पर 4 फरवरी 2017 को इस बारे में एक खबर प्रकाशित हुई. कुशवाहा की किताब आने के बाद कई लोगों ने इस बारे में लिखा लेकिन फिर भी चौरी-चौरा विद्रोह के इतिहास को ठीक नहीं किया गया.

अब जबकि चौरी-चौरा विद्रोह की शताब्दी वर्ष पर बड़े-बड़े सरकारी आयोजन हो रहे हैं, इस तरफ किसी की नजर नहीं हैं.

शहीद स्मारक पर लिखा चौरी चौरा विद्रोह का इतिहास.

शहीद स्मारक पर लिखा चौरी चौरा विद्रोह का इतिहास.

यही नहीं शताब्दी समारोह के मौके पर संस्कृति विभाग और उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार द्वारा लोगों को चौरी-चौरा विद्रोह के बारे में जानकारी देने के लिए मुख्य द्वार के पास ऐतिहासिक अभिलेख प्रदर्शनी लगाई गई है.

इस अभिलेख प्रदर्शनी ‘चौरी-चौरा: 4 फरवरी 1922 ‘ में चौरी-चौरा विद्रोह के बारे में लोगों को कई गलत जानकारी प्रसारित हो रही है. इसमें गांधी जी की गोरखपुर में सभा की सही तिथि तो दी गई है लेकिन चौरी-चौरा विद्रोह की घटना को 5 फरवरी को बता दिया गया है.

इसमें कहा गया है- ‘4 फरवरी 1922 को जिला मुख्यालय से 15 मील पूर्व डुमरी नामक स्थान पर बड़ी संख्या में स्वयंसेवक इकट्ठा हुए और स्थानीय नेताओं के संबोधन के साथ ही चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन की तरफ बढ़ चले. 5 फरवरी को बड़ी संख्या में चौरी-चौरा पहुंचकर स्वयंसेवक थाने के सामने जा रुके और पुलिस द्वारा किए गए अपराध के लिए स्पष्टीकरण मांगने लगे.’

चौरी-चौरा के आस-पास डुमरी नाम के दो गांव हैं. एक गांव हैं डुमरी खुर्द (छुटकी डुमरी ) जबकि दूसरा गांव है डुमरी जिसे डुमरी खास, डुमरी कला या बड़की डुमरी भी कहा जाता है.

डुमरी खुर्द गांव चौरी-चौरा थाने से पश्चिम करीब डेढ़ किलोमीटर है जबकि डुमरी खास साढ़े सात किमी दूर है. दोनों गांवों के बीच करीब छह किलोमीटर का फासला है. ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार चार फरवरी 1992 की सुबह डुमरी खुर्द में स्वयंसेवकों की सभा हुई थी और वहां से जुलूस थाने की तरफ चला था.

सुभाष कुशवाहा ने अपनी किताब में डुमरी खुर्द गांव को चौरी-चौरा विद्रोह का उद्गम स्थल कहा है. उन्होंने लिखा है- ‘चौरी-चौरा विद्रोह के केंद्र में डुमरी खुर्द या छोटकी डुमरी है, जो मूलतः दलितो का गांव था. इस गांव ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की न केवल दिशा बदली है बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्वकारी शक्तियों, उनके कुलीनतावाद और किसानों का हितैषी दिखने के छद्म को बेनकाब किया है. इस गांव ने जहां सबसे अधिक तबाही झेली, कुर्बानी दी, जहां से सबसे अधिक अभियुक्त बनाए गए.’

डुमरी खुर्द गांव के नजर अली और विक्रम अहीर को चौरी-चौरा विद्रोह में फांसी हुई थी. इसके अलावा 30 से अधिक लोगों को सजा मिली थी. इस गांव के लोगों को पता है कि किस जगह 4 फरवरी 1922 को सभा हुई और फिर स्वयंसेवकों का जुलूस चौरी-चौरा थाने की ओर रवाना हुआ. चौरी-चौरा की घटना के बाद अंग्रेजी सरकार के जुल्म का गवाह भी यह गांव है.

शहीद नजर अली के प्रपौत्र सरवर नशीं और बिक्रम अहीर के प्रपौत्र शारदानंद यादव ने कहा कि शहीद स्मारक पर दर्ज चौरी-चौरा विद्रोह के इतिहास से डुमरी खुर्द गांव को ‘गायब’ कर दिया गया है.

यहां उल्लेखनीय है कि डुमरी खास या डुमरी कलां गांव उस समय सिख जागीरदारी में था और जागीरदार के प्रबंधक सरदार हरचरन सिंह ने अदालत में चौरी-चौरा के क्रांतिकारियों के खिलाफ गवाही दी थी.

नब्बे के दशक में चौरी-चौरा विद्रोह की तिथि को लेकर विवाद हुआ था लेकिन कई लेखकों ने ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्रमाणित किया कि चौरी-चौरा विद्रोह की तिथि चार फरवरी 1922 ही है.

इसके बावजूद संस्कृति विभाग और राजकीय अभिलेखागार द्वारा चौरी-चौरा शहीद स्मारक पर इस गलती को दोहराया जा रहा है.

शहीद स्मारक संग्रहालय में अब दो दर्जन से अधिक मूर्तियां स्थापित हो चुकी है. इसमें चौरी-चौरा विद्रोह के 19 शहीदों के अलावा कई अन्य मूर्तियां हैं. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, शहीद स्मारक चौरी-चौरा के संस्थापक अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक श्रीनिवास मणि उर्फ श्रीबाबू की भी मूर्ति है.

इसके अलावा कुछ ऐसे लोगों की भी मूर्तियां स्थापित है जिनको न तो चौरा विद्रोह में फांसी हुई थी और न कारावास की सजा हुई थी. यही नहीं कई शहीदों के नाम, उनके गांव के नाम भी ठीक से नहीं लिखे गए हैं.

चौरी-चौरा विद्रोह के शहीद लाल मोहम्मद का नाम लाल अहमद पुत्र हाकिम कोता लिखा हुआ है जबकि लाल मोहम्मद के पिता का नाम हाकिम शाह था.

संग्रहालय में शहीद लाल मोहम्मद का नाम लाल अहमद लिखा हुआ है, साथ ही पिता के नाम में भी गलती है.

संग्रहालय में शहीद लाल मोहम्मद का नाम लाल अहमद लिखा हुआ है, साथ ही पिता के नाम में भी गलती है.

संग्रहालय में एक मूर्ति ‘शहीद रामपति पुत्र मोहर’ के नाम से स्थापित है. इस नाम के किसी व्यक्ति को चौरी-चौरा विद्रोह में फांसी नहीं हुई थी. सेशन कोर्ट द्वारा जिन 225 क्रांतिकारियों के खिलाफ केस चला उसमें भी भी रामपति पुत्र मोहर नाम का कोई व्यक्ति नहीं है.

इसी तरह एक मूर्ति पर शहीद बलदेव प्रसाद दुबे चौरी-चौरा, 2 जुलाई 1923 लिखी हुई. इस नाम के किसी भी व्यक्ति को चौरी-चौरा विद्रोह में फांसी नहीं हुई थी.

शहीद लवटू पुत्र शिवनंदन का नाम उनकी मूर्ति पर लौटू पुत्र शिवचरण लिखा हुआ है.

‘चौरी-चौरा विद्रोह और स्वाधीनता संग्राम’ किताब के लेखक सुभाष कुशवाहा ने शहीद स्मारक और संग्रहालय में इतिहास की अनदेखी किए जाने पर रोष जताते हुए फेसबुक पर 5 फरवरी को एक पोस्ट लिखी.

उन्होंने इसमें इतिहास के साथ की गई छेड़छाड़ पर सवाल उठाया है. उन्होंने लिखा है कि ‘चार फरवरी को चौरी-चौरा विद्रोह की शताब्दी वर्ष की शुरुआत हुई और शहीद स्मारक संग्रहालय, चौरी-चौरा पर आज जाने का मौका मिला. सोचा शहीदों को नमन कर लूं. जहां यह जानकर थोड़ी तसल्ली हुई कि टूटी मूर्तियां आबाद हो चुकी हैं वहीं एकाएक दिमाग झन्ना गया. 19 शहीदों की जगह 50 मूर्तियां स्थापित हो चुकी हैं. 1857 के के शहीद बन्धु सिंह से लेकर अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मूर्तियां भी बीच-बीच में स्थापित कर दी गई हैं. क्या यह बेहतर न होता कि चौरी-चौरा के शहीदों की मूर्तियों को एक ओर और बाकी शहीदों को दूसरी ओर स्थापित कर स्थिति स्पष्ट कर दी जाती. ’

इस पोस्ट में ग्रेनाइट पत्थर पर लिखे चौरी-चौरा के इतिहास, संग्राहलय में स्थापित मूर्तियों को लेकर इतिहास की अनदेखी का विस्तार से जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘मुझे लगता है कि गम्भीर मसला है और उच्च अधिकारी इस पर जरूर विचार करेंगे. ऐसी त्रुटि अकारण नहीं हो सकती. त्रुटि करने वाले को दंडित करेंगे. आखिर शताब्दी वर्ष का मान, सम्मान और शहीदों के बलिदान का मामला है.’

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)