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दिशा रवि की गिरफ़्तारी हम सबके मुंह पर इस सत्ता का बूट है…

दूसरे देश होंगे जहां ग्रेटा सितारा है, हम अपनी ग्रेटा- दिशा रवि को जेल में रखते हैं. वह कोई और ज़माना होगा और कोई और देश, जहां स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रकृति की चिंता करने वाले की अभ्यर्थना होती है. यहां उसे कारागार मिलता है.

हिरासत में दिशा रवि. (फोटो साभार: ट्विटर)

हिरासत में दिशा रवि. (फोटो साभार: ट्विटर)

दिशा रवि की गिरफ्तारी हम सबके मुंह पर इस सत्ता का बूट है. हमें बतलाया जा रहा है कि इस मुल्क में किसी की कोई कीमत नहीं, किसी का लिहाज नहीं, कोई हद नहीं जो यह सत्ता लांघने में हिचक महसूस करे.

यह सत्ता अपने समर्थकों को रोज़ एक मांस का टुकड़ा फेंक रही है. उनके मुंह में खून जो लग गया है! आज वह दिशा रवि है, कल मुनव्वर फ़ारूकी था, कल कोई और होगा.

खून की प्यास जगा दी गई है. और ताज़ा, खिच्चा मांस चाहिए. जितने ज़हीन, दर्दमंद दिमाग हों सबको इस भीड़ के हवाले किया जाना होगा.

और रोज़-रोज़ ऐसा नया शिकार खोजने में देश के बेहतरीन विश्वविद्यालयों से पढ़े, देश के सबसे तीव्र बुद्धि माने जाने वाले हमारे आपके परिवेश के ही सदस्य उच्च पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी अपनी खोजी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं.

वे हमारे आपके पैसे से पढ़कर यहां तक पहुंचे थे. जब उन्होंने ये प्रशासनिक परीक्षाएं पास की होंगी, उनकी तस्वीरें उनकी मेधा के किस्सों के साथ छपी होंगी. आज वे इस हुकूमत के लिए शिकार खोजने का काम कर रहे हैं.

यह खून की प्यासी भीड़ कल किशोरी ग्रेटा थनबर्ग की तस्वीर जला रही थी. इस तरफ वह ग्रेटा को जलाने का सुख हासिल कर रही थी. लेकिन बेहतर होता अगर वे ग्रेटा को हथकड़ी लगा पाते.

वह मुमकिन नहीं था. दिशा रवि को उसके बदले राष्ट्रवादी रक्तपिपासा के शमन के लिए पेश किया जा सकता था. दूसरे देश होंगे जहां ग्रेटा सितारा है. हम अपनी ग्रेटा, दिशा रवि को जेल में रखते हैं.

वह कोई और ज़माना होगा और कोई और देश जहां स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रकृति की चिंता करने वाले की अभ्यर्थना होती है. यहां उसे कारागार मिलता है.

21 साल की दिशा रवि को घेरे हुए पुलिसवालों को देखिए. उसके पीछे कैमरा लेकर दौड़ते हुए पत्रकारों को देखिए. ‘आप कुछ कहना चाहती हैं?’ उस युवा छात्रा के पीछे भागते इस सवाल को सुनिए. ‘आप रो क्यों रही हैं?’ एक आवाज़ आती है.

दिशा को घेरे हुए लंबे चौड़े बहादुर पुलिसवालों का गिरोह एक दिशा से दूसरी दिशा में उसे जैसे भगाता हुआ चलता है.

वह क्यों रो पड़ी? उसने पूछा अदालत से कि उसने टूलकिट माने सिर्फ दो पंक्तियों का संपादन किया था.वह देश के किसानों की हिमायत कर रही थी. क्या यह जुर्म है?

कितना बड़ा शिकार किया है दिल्ली के हुक्मरान ने! उनके लिए दिल्ली पुलिस ने. और उस अदालत ने भी कितनी खतरनाक साजिश करने वाली देशद्रोही को दिल्ली पुलिस के हवाले किया है कि वह मामले की तह तक पहुंचे.

दिल्ली पुलिस बहुत गंभीर है. उसने पता किया है और उसका दावा है कि दिशा रवि ने वह ‘टूलकिट’ तैयार किया था और संपादित किया था जिसका इस्तेमाल करके ग्रेटा थनबर्ग ने भारत के किसान आंदोलन के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जगाकर भारत के खिलाफ काम किया है.

पुलिस को कोई शक नहीं कि दिशा इस साजिश में शामिल है. क्या हुआ जो दिशा को अकेली मां ने पाला है! क्या हुआ कि वह सिर्फ 21 साल की है!

क्या यह सब कुछ एक देश के खिलाफ साजिश करने वाली, उसे दुनिया की निगाह में बदनाम करने वाली को छूट देने की दलील हो सकती है! क्या आप राष्ट्रवादी पाषाण हृदय में दया जगाने का प्रयास कर रहे हैं?

उसी बंगलुरू में अमूल्या भी गिरफ्तार हुई थी! उस आधुनिक, विश्वग्राम का स्वांग भरने वाले शहर में ही. वह जो कहना चाहती थी कि जिंदाबाद का नारा हर मुल्क के लिए, हर अवाम के लिए, वह हिंदुस्तान हो, पाकिस्तान या बांग्लादेश!

लेकिन इस तंगदिल मुल्क के कानों को पूरी दुनिया के लिए मोहब्बत की बात ज़हर है. सो, अमूल्या को जेल में डाला गया.

ताज़ा, ज़िंदा खून चाहिए. जितने कम उम्र लोग पकड़े जाएंगे, खौफ़ उतना ही गहरा मन में बैठाया जा सकेगा. इसीलिए दिल्ली की जेलों में पिछले एक साल में जिन्हें ठूंसा गया, वे सब 30 या उसके नीचे की सिन के हैं.

दिशा रवि की गिरफ्तारी पर रोष की लहर उठनी चाहिए. लानतें भेजी जानी चाहिए इस सरकार और इस पुलिस को. उस सत्ता को जो हमारे सबसे बेहतरीन दिल और दिमागों को दहशत में कैद कर देना चाहती है.

नहीं, हमें दिशा की बहादुरी का गाना गाना नहीं शुरू कर देना चाहिए. दिशा रवि की जगह जेल नहीं है. उसे देश और राष्ट्र की सीमाओं से आगे कुदरत की आज़ादी के लिए काम करने को आज़ाद रहना चाहिए.

दिशा का पुलिस की हिरासत में एक-एक दिन इस देश के लिए, इस देश की राजनीति के लिए, प्रशासन और साजिशों की कहानी गढ़ने वाली पुलिस के लिए, न्याय व्यवस्था की बेहिसी और इस समाज की चुप्पी पर लानत है.

अगर इस क्षण छात्र नहीं उठ खड़े होते, अध्यापक नहीं बोलते, वैज्ञानिक और विद्वान नहीं बोलते, अगर अभी भी अदालतें नहीं हिलतीं तो मान लेना चाहिए कि इस मुल्क में नौजवान आवाजों की जगह नहीं है.

मैं लिख रहा हूं और क्रोध और लाचारी से मेरी उंगलियां कांप रही हैं. लग रहा है इस मुल्क की छाती पर चढ़कर एक भीड़ कूद रही है और ठहाके लगा रही है. क्या हम यह तमाशा यूं ही देखते रहेंगे?

क्या दिशा की आंखों से गिरा आंसू का कतरा बेकार जाएगा? क्या वह इंसाफ की बाढ़ बनकर इस जुल्म के निजाम को बहा नहीं ले जाएगा? आह!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)