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दिल्ली दंगा: पिंजड़ा तोड़ सदस्यों की याचिका पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और पुलिस से जवाब मांगा

बीते जनवरी में दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में जेएनयू छात्राओं- देवांगना कलीता और नताशा नरवाल पर यूएपीए के तहत दर्ज मामले में निचली अदालत ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी थी. इसके ख़िलाफ़ दायर उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने पुलिस और सरकार को दस मार्च तक जवाब देने को कहा है.

नताशा नरवाल और देवांगना कलीता. (फोटो साभार: ट्विटर)

नताशा नरवाल और देवांगना कलीता. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में पिंजड़ा तोड़ सदस्य और जेएनयू छात्रा नताशा नरवाल और देवांगना कलीता की जमानत याचिकाएं एक निचली अदालत द्वारा खारिज किए जाने के खिलाफ की गई उनकी अपील पर आप सरकार और दिल्ली पुलिस से शुक्रवार को जवाब तलब किया है.

नरवाल और कलीता के खिलाफ यह मामला गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत दर्ज किया गया था.

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस एजे भंभानी की पीठ ने दिल्ली सरकार और पुलिस को नोटिस जारी किया तथा दोनों अपीलों पर सुनवाई की अगली तारीख 10 मार्च तक जवाब देने का निर्देश दिया.

दोनों छात्राओं के अधिवक्ता अदित एस. पुजारी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि इस मामले की जांच में गड़बड़ी हुई है.

नरवाल और कलीता पिंजड़ा तोड़ समूह की सदस्य हैं. उन्हें उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के सिलसिले में पिछले साल मई में गिरफ्तार किया गया था और वे फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं.

उन्हें दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया था और उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था. उन पर दंगा करने, गैर कानूनी रूप से एकत्र होने और हत्या का प्रयास करने के आरोप हैं.

उन पर पिछले साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक मामले में गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) (यूएपीए) कानून के तहत भी मामला भी दर्ज है. दंगों की साजिश का कथित तौर पर हिस्सा रहने को लेकर यह मामला दर्ज किया गया था.

कलीता के खिलाफ कुल चार मामले दर्ज हैं, जिनमें दिसंबर 2019 के दौरान पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को लेकर दर्ज मामला भी शामिल है. वहीं, नरवाल के खिलाफ तीन मामले दर्ज हैं.

दोनों को यूएपीए के तहत दर्ज एक मामले को छोड़कर अन्य मामलों में जमानत मिल चुकी है. निचली अदालत ने यूएपीए मामले में उनकी जमानत याचिकाएं 28 जनवरी को खारिज कर दी थी.

अदालत का कहना था कि प्रथम दृष्टया दोनों के खिलाफ लगे आरोप सच मालूम देते हैं और उन पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज करना सही है.

इससे पहले एक सितंबर 2020 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के मामले में कलीता को जमानत देते हुए कहा था कि पुलिस ऐसे रिकॉर्ड पेश करने में नाकाम रही कि उन्होंने खास समुदाय की महिलाओं को भड़काया या नफरत फैलाने वाले भाषण दिए.

अदालत ने कहा था कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से किए जाने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जो उनका मौलिक अधिकार है.

अदालत ने कहा था कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मौजूदगी में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध लंबे समय से चल रहा था. इसके अलावा पुलिस विभाग के कैमरे भी वहां लगे थे, लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कलीता की वजह से कथित अपराध हुआ.

उच्च न्यायालय ने कलीता को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही रकम जमानत राशि देने पर रिहा करने का आदेश दिया था.

सितंबर में ही नताशा नरवाल की ज़मानत मंज़ूर करते हुए सत्र अदालत ने कहा था कि पुलिस ओर से दिखाए गए वीडियो में वह नजर तो आ रही हैं, लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है, जो यह संकेत देता हो कि वह हिंसा में शामिल थीं या उन्होंने हिंसा भड़काई हो.

मालूम हो कि देवांगना कलीता और ‘पिंजड़ा तोड़’ की एक अन्य सदस्य नताशा नरवाल को मई महीने में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा द्वारा गिरफ्तार किया गया था और उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

छात्रावासों और पीजी आवासीय सुविधाओं को छात्राओं के लिए कम प्रतिबंधित बनाने के उद्देश्य से 2015 में ‘पिंजड़ा तोड़‘ समूह का गठन किया गया था. जेएनयू के सेंटर फॉर वूमेन स्टडीज़ की एमफिल की छात्रा देवांगना कलीता और ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र की पीएचडी की छात्रा नताशा नरवाल इसकी संस्थापक सदस्य हैं.

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और इसका विरोध कर रहे लोगों के बीच हिंसक झड़प होने के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मृत्यु हो गई थी और करीब 200 अन्य जख्मी हुए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)