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हिमंता बिस्वा शर्मा के बयान पर आसू ने कहा- असम समझौते के खंड 6 से कोई समझौता नहीं होगा

असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने बुधवार को असम समझौते के खंड 6 को लेकर बनी केंद्रीय समिति की रिपोर्ट को लेकर कहा था कि सरकार इस समिति की सिफ़ारिशें लागू नहीं कर सकती क्योंकि वे क़ानूनी वास्तविकता से परे हैं. आसू ने इसे लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है.

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन. (फोटो: पीटीआई)

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन. (फोटो: पीटीआई)

गुवाहाटी: ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने गुरुवार को कहा कि असम समझौते के खंड-6 से कोई समझौता नहीं होगा.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, आसू का यह बयान असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा द्वारा बुधवार को असम समझौते के खंड 6 को लेकर बनी केंद्रीय समिति की रिपोर्ट की सिफारिशें लागू न करने को लेकर आई टिप्पणी के बाद आया है.

बयान जारी करते हुए आसू के अध्यक्ष दीपंकर कुमार नाथ और महासचिव शंकरज्योति बरुआ ने मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली असम सरकार के रुख की कड़ी आलोचना की.

इसमें कहा गया, ‘सोनोवाल ने खुद का बचाव करते हुए रिपोर्ट का अपमान करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त किया. यह उनकी ज्ञान की कमी, अक्षमता और पलायनवादी मानसिकता को दर्शाता है. हम सोनोवाल को उनके रुख के लिए कभी माफ नहीं करेंगे.’

आसू नेताओं ने दावा किया, कमेटी की रिपोर्ट के बारे में बुधवार को एक मंत्री की टिप्पणी सोनोवाल के ‘गैर जिम्मेदाराना स्वभाव’ को दर्शाती है, जिन्होंने सुझावों को पढ़ा भी नहीं है.

आसू ने सोनोवाल की इस बात के लिए भी आलोचना की कि केंद्र को तत्काल रिपोर्ट भेजने की बात कहने के बाद भी उन्होंने ऐसा नहीं किया.

बयान में कहा गया, ‘केंद्रीय गृह मंत्री ने इसकी प्राप्ति के एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू करने का वादा किया था. लेकिन कल की टिप्पणी से यह साबित होता है कि सब कुछ दिखावा था.’

बता दें कि असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने बुधवार को कहा था कि सरकार असम समझौते के खंड-छह के बारे में केंद्रीय समिति की सिफारिशों को लागू नहीं कर सकती क्योंकि वे कानूनी वास्तविकता से परे हैं.

सरकार की ओर से इस समिति की रिपोर्ट पर पहली बार कुछ कहा गया है. इस रिपोर्ट को पिछले साल 25 फरवरी को असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष पेश किया जाना था.

असम के राज्यपाल जगदीश मुखी ने 11 फरवरी को विधानसभा में कहा था कि राज्य अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय की जस्टिस विप्लब कुमार शर्मा के नेतृत्व वाली उच्चस्तरीय समिति (एचएलसी) द्वारा तैयार की गई खंड-छह रिपोर्ट की जांच कर रहा है और इसे विचार के लिए केंद्र सरकार के पास नहीं भेजा गया है.

सर्बानंद सोनोवाल की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने असम में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के लिए दिसंबर 2019 में खंड 6 के त्वरित कार्यान्वयन का वादा किया था.

हालांकि, फरवरी 2020 में केंद्र द्वारा नियुक्त पैनल ने अपनी सिफारिशें केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी थीं, इसलिए सरकार इस मामले पर चुप रही.

मालूम हो कि 1985 में हुए असम समझौते के अनुच्छेद छह में कहा गया है कि असमिया समाज के लोगों की संस्कृति, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय, जो भी उपयुक्त हों किए जाएंगे.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जनवरी 2019 में सेवानिवृत्त केंद्रीय सचिव एमपी बेजबरुआ की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, लेकिन नौ सदस्यों में से छह ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था.

उसके बाद 16 जुलाई, 2019 को समिति का पुनर्गठन किया गया, जिसमें जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीके शर्मा अध्यक्ष बनाए गए और 14 अन्य सदस्य रखे गए.

फरवरी 2019 में 14 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी. इस पर कोई अमल न होने का आरोप लगाते हुए अगस्त 2020 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के तीन और समिति के एक अन्य सदस्य अरुणाचल प्रदेश के महाधिवक्ता निलय दत्ता ने इसकी रिपोर्ट को मीडिया में लीक कर दी थी.

वहीं, शर्मा की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने जानना चाहा कि शाह और सोनोवाल ने रिपोर्ट के बारे में कुछ नहीं कहा.

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता बबीता शर्मा ने पीटीआई को बताया, ‘मुख्यमंत्री या केंद्रीय गृह मंत्री ने कुछ क्यों नहीं कहा है? इस पर कोई आधिकारिक सूचना क्यों नहीं दी गई है.’