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किसान संगठन ने कहा, सत्ता के शीर्ष पर बैठे पीएम मोदी एमएसपी पर सफेद झूठ बोल रहे हैं

अखिल भारतीय किसान सभा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये दावा बिल्कुल झूठा है कि उनकी सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसार किसानों को लाभकारी मूल्य दे रही है. सभा का कहना है कि भले ही भाजपा ने इन सिफ़ारिशों को लागू करने का वादा किया था, लेकिन इसे अमल में लाने के लिए उसकी सरकार ने कुछ नहीं किया.

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दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में अखिल भारतीय किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता. (फोटो: पावनजोत कौर)

नई दिल्ली: केंद्र द्वारा लाए गए तीन विवादित कानूनों के खिलाफ रेल रोको प्रदर्शन के एक दिन बाद किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के सहयोगी संगठन अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बोले जा रहे ‘झूठ’ की ओर ध्यान दिलाया.

संगठन के सदस्य और इन कानूनों पर सरकार के साथ बातचीत के प्रमुख वार्ताकारों में से एक हन्नान मोल्ला ने कहा, ‘लोकतंत्र की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठकर वो व्यक्ति सफेद झूठ बोलता है, देश की जनता को गुमराह करता है और उन्हें किसानों के खिलाफ कर रहा है.

अखिल भारतीय किसान सभा वामपंथी पार्टी माकपा की किसान इकाई है.

बीते आठ फरवरी को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘एमएसपी था, एमएसपी है और एमएसपी रहेगा.’

मोल्ला ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री तथ्यों को छिपा रहे हैं और झूठ बोल रहे हैं, जिसके चलते लोग किसानों के खिलाफ अपनी राय बना रहे हैं.

मोल्ला ने कहा, ‘इससे पहले प्रधानमंत्री ने ये भी कहा था कि सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार किसानों को लाभकारी मूल्य दे रही है.’ उन्होंने इस दावे को झूठा बताते हुए कहा कि भले ही भाजपा ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था, लेकिन इसे अमल में लाने के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया.

बीते 19 फरवरी को दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान नेता ने कहा कि मौजूदा एमएसपी लाभकारी नहीं है और यह सिर्फ छह फीसदी किसानों को ही मिलती है. इस एमएसपी में सभी प्रकार की उत्पादन लागत- जैसे कि भूमि का किराया इत्यादि को नहीं जोड़ा जाता है. जबकि स्वामीनाथन आयोग ने सभी तरह की लागत को शामिल करते हुए इस पर लागत का 50 फीसदी राशि जोड़कर एमएसपी तय करने की बात कही थी.

उन्होंने कहा, ‘वर्तमान में भारत के किसानों को प्रधानमंत्री के दावे की तुलना में 20 फीसदी कम राशि मिलती है. वो तथ्यों को छिपा रहे हैं. फिलहाल केवल छह फीसदी किसानों को एमएसपी मिलती है और वो भी सिर्फ दो फसलों को लिए.’

यह बताते हुए कि किस तरह नए कानून एपीएमसी मंडी व्यवस्था को खत्म कर देंगे, एआईकेएस के किसान नेता ने कहा कि एमएसपी को कानूनी मान्यता देने वाला कानून जरूर लाया जाना चाहिए, ताकि देश के किसानों को बचाया जा सके.

मोल्ला ने कहा कि केंद्र के साथ बैठक के दौरान किसान नेताओं ने सरकार को समझाया कि आखिर क्यों एमएसपी व्यवस्था के तहत सरकारी खरीद जरूरी है. उन्होंने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले किसान नेताओं ने केंद्र सरकार को विस्तार से बताया कि किस तरह ये कानून किसानों के लिए डेथ वारंट हैं.

हन्नान मोल्ला ने कहा, ‘लेकिन मोदी सरकार अपने कॉरपोरेट दोस्तों के विरोध में नहीं जा सकती है, इसलिए वे कृषि कानूनों को रद्द न करने पर अड़े हुए हैं.’

किसान नेता ने कहा, ‘सरकार ने हमसे कहा कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे एमएसपी पर खरीदी कर पाएं, लेकिन हमने पूरा प्लान तैयार करके उन्हें दिया कि किस तरह वे ये कार्य कर सकते हैं.’

मीडिया को संबोधित करते हुए एआईकेएस के अध्यक्ष अशोक धावले ने जोर देकर कहा कि इस कानून का प्रमुख मुद्दा कॉरपोरेट अनुकूल कानून और किसानों को लाभकारी मूल्य देना है, लेकिन सरकार किसानों एवं जनता का ध्यान इससे भटकाने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने कहा कि किसानों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की गिरफ्तारी और उन्हें डराने-धमकाने की घटनाएं दर्शाती हैं कि सरकार हर उस व्यक्ति के आवाज को दबाना चाह रही है जो उनकी आलोचना करते हैं. धावले ने कहा कि 26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा करना मोदी सरकार की साजिश थी और उन्होंने जानबूझकर इसे सांप्रदायिक रंग दिया.

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