नॉर्थ ईस्ट

असम सरकार ने और छह महीने के लिए आफ्सपा का विस्तार किया

असम सरकार द्वारा जारी एक बयान में कहा है कि सैन्य बल (विशेष अधिकार) क़ानून, 1958 की धारा तीन के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए असम के राज्यपाल ने समूचे असम राज्य को 27 फरवरी से अगले छह महीने के लिए ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

गुवाहाटी: असम सरकार ने सैन्य बल (विशेष अधिकार) कानून (आफ्सपा) के तहत राज्य की मौजूदा ‘अशांत क्षेत्र’ स्थिति को 27 फरवरी से छह और महीने के लिए बढ़ाने का फैसला किया है.

बीते 24 फरवरी को जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, ‘सैन्य बल (विशेष अधिकार) कानून, 1958 की धारा तीन के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए असम के राज्यपाल ने समूचे असम राज्य को 27 फरवरी से अगले छह महीने के लिए ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया है.’

विज्ञप्ति में कोई खास कारण नहीं बताया गया है लेकिन सूत्रों ने कहा कि अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव और राज्य के कुछ हिस्से में गोला-बारूद की बरामदगी के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है.

इंडिया टुडे के मुताबिक, असम सरकार के गृह विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, ‘कुछ चरमपंथी समूह अभी भी असम के कुछ हिस्सों और पड़ोसी राज्यों के अंतर-राज्य सीमा में सक्रिय हैं. पिछले छह महीनों में राज्य के विभिन्न हिस्सों से कई लावारिस अवैध हथियार और गोला-बारूद बरामद किए गए हैं.’

बीते 23 फरवरी को असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की मौजूदगी में गुवाहाटी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पांच अलग-अलग चरमपंथी संगठनों के कुल 1,040 विद्रोहियों ने अपने हथियार डाल दिए और मुख्यधारा में आ गए.

आत्मसमर्पण करने वालों का मुख्यधारा में स्वागत करते हुए, सोनोवाल ने कहा कि उनकी सरकार असम को आतंक-मुक्त राज्य बनाने के लिए काम कर रही है.

असम में अफ्सपा नवंबर 1990 में लागू हुआ था और राज्य सरकार द्वारा समीक्षा के बाद प्रत्येक छह महीने पर इसका विस्तार किया जाता रहा है.

पूर्वोत्तर में आफ्सपा असम, नगालैंड, मणिपुर (इंफाल नगर परिषद इलाके को छोड़कर), अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लोंगडिंग और तिरप जिलों तथा असम की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के आठ थाना क्षेत्र वाले इलाकों में लागू है.

पूर्वोत्तर के साथ ही जम्मू कश्मीर से विभिन्न संगठनों की ओर से लंबे समय से विवादास्पद आफ्सपा को निरस्त करने की मांग होती रही है. उनका कहना है कि यह सुरक्षा बलों को ‘व्यापक अधिकार’ देता है. उनका दावा है कि इस कानून की वजह से सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)