भारत

प्रदर्शनकारियों से नुकसान की वसूली के लिए उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भी विधेयक पारित

लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक के तहत यदि कोई भी प्रदर्शनकारी सरकारी या निजी संपत्ति को क्षति पहुंचाने का दोषी पाया जाता है तो उसे एक साल की सज़ा या 5,000 रुपये से एक लाख तक के जुर्माने का सामना करना होगा.

योगी आदित्यनाथ. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

योगी आदित्यनाथ. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: जुलूस एवं धरना प्रदर्शन के दौरान निजी तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से जुर्माना वसूली के प्रावधान वाला लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक बीते मंगलवार को राज्य विधान परिषद में भी पारित कर दिया गया.

भोजनावकाश के बाद सभापति कुंवर मानवेंद्र सिंह की अगुवाई में शुरू हुई कार्यवाही के दौरान उत्तर प्रदेश लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक और उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक को सदन के पटल पर रखा गया.

सभापति ने इनमें से उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक को प्रवर समिति के पास भेज दिया जबकि लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक को ध्वनिमत से पारित घोषित कर दिया. इस विधेयक को विधानसभा में बीते सोमवार को ही पारित कर दिया गया था.

सपा सदस्यों ने परिषद में विधेयक पारित कराए जाने के तरीके का विरोध किया और वे सदन के बीचोबीच आ गए. सभापति ने उन्हें अपने-अपने स्थान पर जाने को कहा, मगर हंगामा थमता न देख उन्होंने सदन की कार्यवाही 15 मिनट के लिए स्थगित कर दी.

स्थगन अवधि गुजरने के बाद अधिष्ठाता सुरेश कुमार त्रिपाठी के सभापतित्व में कार्यवाही फिर शुरू हुई. मगर सपा सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा. इस पर अधिष्ठाता ने सदन की कार्यवाही बुधवार 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश लोक एवं निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक में किसी आंदोलन के दौरान राज्य की संपत्तियों को नष्ट करने, तोड़फोड़ करने, बसों को जलाने या किसी भी तरह की क्षति पहुंचाने के दोषी लोगों से जुर्माना वसूले जाने का प्रावधान है.

इसके तहत यदि कोई भी प्रदर्शनकारी सरकारी या निजी संपत्ति को क्षति पहुंचाने का दोषी पाया जाता है तो उसे एक साल की सजा या 5,000 रुपये से एक लाख तक के जुर्माने का सामना करना होगा.

विपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी ने कहा कि राज्य सरकार हमें समय में पीछे ले जाने के लिए इस तरह का विधेयक पारित कर रही है.

उन्होंने कहा, ‘आजादी के समय से ही प्रतिरोध की आवाज बुलंद करने का चलन रहा है. यदि इसे प्रतिबंधित किया जाता है तो किस तरह राजनीतिक पार्टियां अपनी राय व्यक्त करेंगी. यदि कोई असामाजिक तत्व या उपद्रवी प्रदर्शन में शामिल होता है और किसी चीज को क्षति पहुंचाता है, ऐसे में सरकार राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं से वसूली करेगी, जो कि सही नहीं है.’

समाजवादी पार्टी के नेता उज्ज्वल रमन सिंह ने मांग की कि इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजा जाना चाहिए, क्योंकि सरकारें कई बार जल्दबाजी में बिल लाती हैं और बाद में उसे वापस ले लेती हैं. बसपा नेता लालजी वर्मा ने भी इस मांग का समर्थन किया.

उन्होंने कहा, ‘लोकतांत्रिक आंदोलनों का दमन करने के लिए ये विधेयक लाया गया है और इस पर गहन विचार के बाद ही इसे पेश किया जाना चाहिए.’

मालूम हो कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस विधेयक का वकालत करते हुए कहा था कि राजनीतिक प्रदर्शनों और आंदोलनों के दौरान कई सरकारी और प्राइवेट संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता है, ऐसे में ये कानून इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाएगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)